देशभर में SIR को लेकर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां की टिप्पणी ने इस मुद्दे को और बड़ा बना दिया है. एक दिन पहले जस्टिस भुइयां ने वोट देने के अधिकार को लेकर कहा था कि भारतीय नागरिक की नागरिकता और उसका वोटिंग अधिकार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं.
उन्होंने कहा कि किसी भारतीय नागरिक को वोट देने के अधिकार से वंचित करना उसे अपने ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने जैसा होगा. उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 326 के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती और संविधान से ऊपर कोई नहीं है. रविवार को एक कार्यक्रम में की गई अपनी इस टिप्पणी के बाद से जस्टिस उज्जल भुइयां चर्चा में हैं.
बता दे कि ये पहला मौका नहीं है, जब जस्टिस भुइयां की टिप्पणियों से सुर्खियां बटोरी हैं. सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां अलग-अलग मौकों पर लोकतंत्र, पुलिस की भूमिका, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, पर्यावरण और सामाजिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर अहम टिप्पणियां कर चुके हैं. हाल के महीनों में उनके कई बयान चर्चा में रहे हैं. उन्होंने लोकतांत्रिक असहमति के लिए कम होती जगह पर चिंता जताने से लेकर न्यायपालिका की विश्वसनीयता बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया है.
प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कार्रवाई पर उठाए सवाल
4 सितंबर को दिल्ली में पूर्व सुरक्षा सचिव यशोवर्धन आजाद की किताब 'पुलिसिंग द रिपब्लिक' के विमोचन कार्यक्रम में जस्टिस भुइयां ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस की मारपीट पर चिंता जताई थी. उन्होंने कहा कि युवा IPS अधिकारियों को खुद प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट करते देखना 'बेहद परेशान करने वाला' है.
उन्होंने सवाल किया कि क्या पुलिस द्वारा गिरफ्तार होते ही कोई नागरिक अपने मौलिक अधिकार खो देता है? उन्होंने कहा कि आम आदमी के लिए सड़क पर मौजूद पुलिसकर्मी राज्य की शक्ति और अधिकार को रिप्रेजेंट करता है. इसलिए पुलिस के लिए अपनी क्रेडिबिलिटी बनाए रखना बेहद जरूरी है और यह संविधान का पालन, निष्पक्षता, ईमानदारी और धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों पर चलते हुए ही संभव है.
'पर्यावरण नेताओं की प्राथमिकता नहीं'
8 अगस्त को गुवाहाटी के विवेकानंद केंद्र में 'विकास और स्थिरता के बीच संतुलन' विषय पर बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि पर्यावरण और पर्यावरणीय क्षरण ऐसे मुद्दे नहीं हैं, जिनसे सब्सिडी, नौकरियों या पहचान की राजनीति की तरह राजनीतिक लाभ हासिल किया जा सके. उन्होंने कहा कि पर्यावरण से कोई बड़ा वोट बैंक नहीं जुड़ा है, इसलिए यह राजनीतिक दलों और सरकारों की प्राथमिकता नहीं है. ऐसे में नागरिकों और अदालतों को पर्यावरण से जुड़े मुद्दे उठाने होंगे.
जजों की नियुक्ति में को लेकर भी की टिप्पणी
1 अगस्त को दिल्ली में 'द ज्यूडिशियल ट्रांसपेरेंसी इंडेक्स' रिपोर्ट के विमोचन के दौरान जस्टिस भुइयां ने न्यायिक नियुक्तियों में ज्यादा पारदर्शिता को लेकर टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा कि पारदर्शिता की कमी ऐसे लोगों को न्यायपालिका में आने का मौका दे सकती है, जो बाद में लोगों के किसी समूह को 'चींटियां' जैसे शब्दों से संबोधित करें. उन्होंने ऐसी टिप्पणी को 'पूरी तरह असंवैधानिक' बताया और संभावित जजों को लेकर सार्वजनिक चर्चा की जरूरत बताई.
लोकतांत्रिक असहमति की जगह कम होने पर चिंता
25 जुलाई को भोपाल में एक कार्यक्रम के दौरान जस्टिस भुइयां ने कहा था कि भारत में लोकतांत्रिक असहमति के लिए जगह कम हो रही है. उन्होंने कहा कि विरोध और अपने विचार व्यक्त करने के मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल करने वाले छात्रों, कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई बढ़ रही है. उनके मुताबिक शांतिपूर्ण बहस और असहमति लोकतंत्र का सार हैं, लेकिन इसके जवाब में गिरफ्तारी, लंबे समय तक जेल और जमानत की कड़ी शर्तें देखने को मिल रही हैं.
मुस्लिम और दलित से भेदभाव का दिया उदाहरण
21 फरवरी को हैदराबाद में जस्टिस भुइयां ने संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक वास्तविकताओं के बीच अंतर की बात कही. उन्होंने एक मुस्लिम पीएचडी छात्रा को दिल्ली में नाम के कारण आवास नहीं मिलने और ओडिशा में दलित महिला के हाथ का बना खाना बच्चों को खिलाने से अभिभावकों के इनकार की घटनाओं का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि अदालतों का कर्तव्य लोकप्रिय जनमत के बजाय संवैधानिक मूल्यों के आधार पर मामलों का फैसला करना है.
इससे पहले 24 जनवरी को जस्टिस भुइयां ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को संविधान की मूल विशेषता और इससे समझौता न किए जाने वाला सिद्धांत बताया था. उन्होंने कहा था कि अगर न्यायपालिका अपनी विश्वसनीयता खो देती है तो अदालतें और जज तो मौजूद रहेंगे, लेकिन उसकी 'आत्मा' खत्म हो जाएगी.
बिकाश कुमार सिंह