'जान चली जाए, पीछे नहीं हटेंगे', जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल

लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा, छठी अनुसूची का दर्जा और अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग को लेकर क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी है. उन्होंने कहा कि सरकार ने अपने वादे पूरे नहीं किए और बातचीत की प्रक्रिया भी ठप हो गई है. वांगचुक ने कहा कि जरूरत पड़ी तो जान चली जाए, लेकिन वह पीछे नहीं हटेंगे.

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वांगचुक ने सभी राजनीतिक दलों से समर्थन की अपील की. Photo PTI वांगचुक ने सभी राजनीतिक दलों से समर्थन की अपील की. Photo PTI

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 29 जून 2026,
  • अपडेटेड 4:56 PM IST

लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा की मांग को लेकर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे क्लाइमेट एक्टिविस्ट और शिक्षाविद सोनम वांगचुक ने जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी. उन्होंने कहा कि वह फिर से आंदोलन करने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन सरकार द्वारा किए गए वादे पूरे नहीं होने और बातचीत की प्रक्रिया ठप पड़ जाने के कारण उन्हें यह कदम उठाना पड़ा.

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न्यूज एजेंसी से बातचीत में वांगचुक ने कहा कि वह खुशी से अनशन पर नहीं बैठे हैं, बल्कि मजबूरी में ऐसा कर रहे हैं. उन्होंने कहा, 'मुझे उम्मीद थी कि दोबारा धरने पर बैठने की जरूरत नहीं पड़ेगी. मैं दुखी हूं कि फिर से अनशन करना पड़ रहा है. यह आसान नहीं है. जरूरत पड़ी तो मेरी जान भी चली जाए, लेकिन मैं पीछे नहीं हटूंगा.'

वांगचुक ने कहा कि उनका आंदोलन लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा, राज्य का दर्जा और केंद्र शासित प्रदेश के लिए अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसी मांगों को लेकर है. उन्होंने कहा कि इन मुद्दों पर केंद्र सरकार से बातचीत आगे नहीं बढ़ पाई है.

उन्होंने बताया कि सितंबर 2025 में लद्दाख आंदोलन के दौरान उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत गिरफ्तार गया था और फरवरी 2026 में रिहा किया गया. उनके अनुसार, 4 फरवरी और 22 मई को केंद्र के साथ बैठकें हुईं. मई की बैठक से उन्हें उम्मीद जगी थी कि भरोसा बहाल होगा, लेकिन उस बैठक में बनी सहमति को लिखित रूप नहीं दिया गया.

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'सरकार एक कदम आगे बढ़ाकर दो कदम पीछे हट रही है'
वांगचुक ने आरोप लगाया कि सरकार एक कदम आगे बढ़ाकर दो कदम पीछे हट रही है, जिससे लोगों का भरोसा टूट रहा है. उन्होंने कहा कि 2013-14 में भी सरकार ने छठी अनुसूची को लेकर वादे किए थे, लेकिन बाद में उनसे पीछे हट गई.

हालांकि उन्होंने कहा कि उनका विश्वास अभी भी बातचीत में बना हुआ है. उन्होंने कहा, 'अगर उम्मीद नहीं होती तो मैं यहां नहीं होता. मुझे विश्वास है कि सरकार की अंतरात्मा जागेगी और वह अपने वादे पूरे करेगी.' लोकतंत्र का हवाला देते हुए वांगचुक ने कहा कि सरकार को जनता की आवाज को खतरे के रूप में नहीं देखना चाहिए. उन्होंने कहा कि यदि भारत लोकतंत्र है तो लोगों की चिंताओं को संवेदनशीलता के साथ सुना जाना चाहिए.

उन्होंने मांग की कि लद्दाख के मुद्दे पर संसद के आगामी सत्र में चर्चा हो और सरकार जवाबदेही तय करे. उनका कहना था कि सिर्फ इस्तीफे से समाधान नहीं निकलेगा, बल्कि संसद में गंभीर बहस होनी चाहिए.

राजनीतिक दलों से आंदोलन का समर्थन की अपील
वांगचुक ने सभी राजनीतिक दलों से आंदोलन का समर्थन करने की अपील करते हुए कहा कि उन्हें राजनीति से ऊपर उठकर आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के बारे में सोचना चाहिए. उन्होंने प्रदर्शनकारियों से भी शांति बनाए रखने की अपील की और कहा कि डर या नफरत के बिना अपनी बात रखें, क्योंकि शांतिपूर्ण आंदोलन को देश का समर्थन मिलेगा.

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युवाओं को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि जेल जाने से डरने की जरूरत नहीं है. अपने अनुभव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जेल इंसान को मजबूत बनाती है और न्याय के लिए संघर्ष जारी रखना चाहिए.

वांगचुक ने कहा कि उनके आंदोलन की दो प्रमुख प्राथमिकताएं 'शिक्षा और पर्यावरण' हैं. उन्होंने कहा कि लद्दाख सीमा से लगा अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है और वहां के मुद्दों को लंबे समय तक लंबित रखना देश के हित में नहीं है. उनके अनुसार, इन समस्याओं का जल्द समाधान निकाला जाना चाहिए ताकि क्षेत्र में विश्वास और स्थिरता बनी रहे.

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