मध्य प्रदेश सरकार ने विधानसभा में समान नागरिक संहिता अधिनियम 2026 पेश कर दिया है. कल मंगलवार को विधानसभा में इस बिल पर विस्तृत चर्चा होगी. ये विधेयक राज्य में बहुविवाह (पॉलीगेमी), तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और लिव-इन संबंधों जैसे व्यक्तिगत मामलों में समान कानून लागू करने का ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है. बिल में लिव-इन रिलेशनशिप को एक महीने के अंदर रजिस्टर कराना अनिवार्य होगा, ऐसा न करने पर आरोपी को 3 महीने की जेल या 10,000 रुपये जुर्माने का प्रवधान है.
इससे पहले रविवार को मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में भोपाल के पास जगदीशपुर में आयोजित विशेष बैठक में मध्य प्रदेश कैबिनेट ने यूसीसी विधेयक के ड्राफ्ट को मंजूरी दी थी.
प्रस्तावित कानून के अनुसार, लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए साथ रहने की शुरुआत के एक महीने के अंदर रजिस्ट्रार को 'स्टेटमेंट ऑफ लिव-इन रिलेशनशिप' जमा करना अनिवार्य होगा. पार्टनर्स की उम्र कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिए, वो पहले से शादीशुदा न हों और उनकी सहमति स्वैच्छिक होनी चाहिए. बिना रजिस्ट्रेशन एक महीने से अधिक समय तक साथ रहने पर तीन महीने की जेल या 10,000 रुपये जुर्माना हो सकता है. झूठी जानकारी देने पर तीन महीने की जेल और 25,000 रुपये जुर्माना, जबकि नोटिस मिलने के बाद भी विवरण न देने पर छह महीने तक की जेल और 25,000 रुपये के जुर्माने का प्रावधान है.
लिव-इन रिलेशनशिप के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य
विधेयक में लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चों को पूर्ण कानूनी दर्जा देने का प्रावधान किया गया है. यदि पुरुष पार्टनर महिला पार्टनर को छोड़ देता है तो वह एक कानूनी पत्नी की तरह ही सक्षम अदालत के माध्यम से गुजारा भत्ता (भरण-पोषण) का दावा कर सकती है. ये कदम महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है.
विवाग और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य
प्रस्तावित संहिता में सभी धर्मों के लिए विवाह और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है. शहरी क्षेत्रों में ये प्रक्रिया 'एमपी ई-नगरपालिका पोर्टल' के माध्यम से और ग्रामीण क्षेत्रों में एसडीएम, नगरपालिका या पंचायत के माध्यम से पूरी की जाएगी. तलाक के बाद किसी को 'निकाह हलाला' जैसी अपमानजनक स्थितियों से गुजारने या इसके लिए मजबूर करने को दंडनीय अपराध माना जाएगा.
संपत्ति में बेटियों को बराबर का हक
विधेयक के तहत जैविक, गोद लिए गए, सरोगेसी या एआरटी (असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी) के जरिए जन्मे सभी बच्चों को समान कानूनी दर्जा मिलेगा. कस्टडी विवाद में कोर्ट का फैसला बच्चे के सर्वांगीण कल्याण को प्राथमिकता देगा. लैंगिक रूप से तटस्थ उत्तराधिकार कानून के तहत बेटों और बेटियों को वैवाहिक स्थिति की परवाह किए बिना संपत्ति में समान अधिकार दिया जाएगा.
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक सुरक्षा उपायों का सम्मान करते हुए ये कानून संविधान के अनुच्छेद 342 और अनुच्छेद 366 (क्लॉज 25) के तहत आने वाली अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होगा. ये- भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया जैसी जनजातियों और संविधान के भाग XXI के तहत संरक्षण प्राप्त है, उन्हें भी इस संहिता से विशेष रूप से छूट दी गई है.
कई राज्यों के कानून का किया गया अध्ययन
यूसीसी का मसौदा तैयार करने वाली सेवानिवृत्त जस्टिस रंजना देसाई समिति ने पिछले हफ्ते अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपी थी. सीएम ने बताया कि 'मध्य प्रदेश समान नागरिक संहिता, 2026' का ड्राफ्ट उत्तराखंड (2024), गुजरात (2026) और असम (2026) के यूसीसी के गहन अध्ययन और मार्गदर्शन के आधार पर तैयार किया गया है. उन्होंने दावा किया कि ड्राफ्टिंग कमेटी के सामने 80 प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं और 40 प्रतिशत मुस्लिम पुरुषों ने बिल का समर्थन किया था.
सीएम सभी दलों से मांगा समर्थन
सीएम यादव ने कहा कि यूसीसी का मुख्य उद्देश्य पर्सनल लॉ में महिलाओं के खिलाफ चले आ रहे भेदभाव को खत्म करना, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना और उन्हें सशक्त बनाना है. विवाह के लिए पुरुष की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिला की 18 वर्ष तय की गई है. सीएम ने सभी राजनीतिक दलों से राजनीति से ऊपर उठकर इस ऐतिहासिक विधेयक का समर्थन करने की अपील की है.
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