बीजेपी के वरिष्ठ नेता और केरल बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष केएस राधाकृष्णन ने केरल की राजनीति में कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका को लेकर बड़ा दावा किया है. इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ 2026 में बोलते हुए उन्होंने कहा कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी CPM ने लंबे समय तक केरल में प्रमुख हिंदू राजनीतिक ताकत के रूप में काम किया और यही एक वजह है कि बीजेपी राज्य में अपेक्षित राजनीतिक विस्तार नहीं कर पाई.
राधाकृष्णन ने केरल की राजनीति को उदार-वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष परंपरा के रूप में पेश किए जाने की धारणा को खारिज किया. उन्होंने कहा कि यह एक ऐसा कथानक है जिसे कुछ लेखकों, बुद्धिजीवियों, नेताओं और कार्यकर्ताओं ने बनाया है. उनके मुताबिक, इसे तथ्यों के आधार पर सही नहीं माना जा सकता.
1957 में कम्युनिस्ट सरकार बनने का दिया हवाला
राधाकृष्णन ने केरल में कम्युनिस्ट आंदोलन की राजनीतिक सफलता को 1957 में बनी पहली कम्युनिस्ट सरकार से जोड़ते हुए कहा कि उस समय पार्टी ने 60 सीटें जीती थीं और सरकार बनाई थी. हालांकि, उन्होंने कहा कि इस सफलता को केवल कम्युनिस्ट या वामपंथी विचारधारा की लोकप्रियता के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए.
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उन्होंने मालाबार में 1921 के विद्रोह के बाद पैदा हुए सामाजिक और राजनीतिक हालात का जिक्र किया. राधाकृष्णन के मुताबिक, उस दौर में कुछ हिंदू समुदायों में कांग्रेस के प्रति दूरी बनी और इसी राजनीतिक स्थिति ने कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए जगह बनाई.
उन्होंने 1950 के सबरीमाला आगजनी मामले का भी जिक्र किया और दावा किया कि इस घटना का बाद की राजनीतिक परिस्थितियों पर असर पड़ा. राधाकृष्णन ने कम्युनिस्ट आंदोलन के शुरुआती नेतृत्व और सामाजिक संरचना का हवाला देते हुए कहा कि इसे केवल धर्मनिरपेक्ष-वामपंथी राजनीतिक ताकत के रूप में देखना सही नहीं है.
उन्होंने ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व का उल्लेख किया और कहा कि शुरुआती दौर में एनएसएस से जुड़े एमएन गोविंदन नायर और एसएनडीपी से जुड़े आर. सुगथन, टीके रामकृष्णन और पी. गंगाधरन जैसे नेता भी कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े थे. राधाकृष्णन ने दावा किया कि पार्टी के संगठन में अलग-अलग हिंदू समुदायों से जुड़े नेताओं की भागीदारी थी. उन्होंने यह भी कहा कि ईएमएस के भाषणों में पिछड़े वर्गों से कम्युनिस्टों को समर्थन देने की अपील की जाती थी.
बीजेपी के केरल में सीमित विस्तार पर क्या बोले?
राधाकृष्णन ने बीजेपी के केरल में सीमित चुनावी विस्तार के पीछे भी कम्युनिस्ट पार्टी के लंबे राजनीतिक प्रभाव को एक कारण बताया. उन्होंने कहा कि बीजेपी जब हिंदू मतदाताओं के बीच अपना आधार बनाने की कोशिश करती है, तो वह किसी खाली राजनीतिक जगह में प्रवेश नहीं कर रही है. उनके मुताबिक, उस राजनीतिक क्षेत्र में पहले से ही कम्युनिस्ट आंदोलन का प्रभाव रहा है.
उन्होंने कहा कि हिंदू मतदाताओं के बीच मजबूत राजनीतिक आधार रखने वाली एक पार्टी के मौजूद होने के कारण बीजेपी को अपना समर्थन आधार बनाने के लिए उसके साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है.
मुस्लिम और ईसाई मतदाताओं का भी किया जिक्र
राधाकृष्णन ने कहा कि बीजेपी को मुस्लिम और ईसाई समुदायों से पर्याप्त समर्थन नहीं मिलना भी केरल में पार्टी के सीमित विस्तार का एक कारण है. उनके मुताबिक, इन समुदायों के मतदाताओं का पारंपरिक रूप से कांग्रेस की ओर झुकाव रहा है.
उन्होंने कहा कि बीजेपी के सामने राज्य में राजनीतिक आधार बढ़ाने की चुनौती बनी हुई है. हालांकि, राधाकृष्णन ने यह भी कहा कि आने वाले समय में मतदाताओं की सोच में बदलाव के साथ बीजेपी के लिए केरल में एक प्रमुख राजनीतिक ताकत बनने की संभावना है.
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