'20-25 साल में मास्क पहनकर घूमना होगा मजबूरी!', पूर्व SC जज जस्टिस ओका की चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय ओका ने ठाणे में कहा कि पर्यावरण को बचाने के लिए जल्द कदम नहीं उठाए गए, तो 20 से 25 साल में बड़े शहरों में लोगों को मास्क पहनना पड़ सकता है, भले ही कोई महामारी न हो. उन्होंने कहा कि इंसान धरती का मालिक नहीं है और पेड़ कटाई, पटाखे, प्रदूषण और नदी, झील, समुद्र की गंदगी रोकनी होगी.

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पूर्व SC जज अभय ओका ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर दी बड़ी चेतावनी (File Photo: PTI) पूर्व SC जज अभय ओका ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर दी बड़ी चेतावनी (File Photo: PTI)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 05 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 5:10 AM IST

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय ओका ने चेतावनी दी कि अगर पर्यावरण को बचाने के लिए जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो अगले 20 से 25 साल में बड़े शहरों के लोगों को मास्क पहनने पर मजबूर होना पड़ सकता है. ठाणे के एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पर्यावरण की रक्षा होगी. उन्होंने छात्रों को एआई इस्तेमाल और युवाओं को कानून पढ़ने की सलाह भी दी.

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जस्टिस ओका ने कहा कि आज शासकों और आम लोगों, दोनों के बीच एक बड़ी गलतफहमी फैल गई है. लोग मान बैठे हैं कि धरती के मालिक इंसान हैं. इसी सोच से एक खतरनाक होड़ शुरू हो गई है, जिसमें बेहिसाब पेड़ काटे जा रहे हैं, पटाखों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है, ध्वनि और वायु प्रदूषण बढ़ रहा है और नदियों, झीलों और समुद्रों को गंदा किया जा रहा है. यह सब कई बार धर्म और समाज के नाम पर किया जाता है.

उन्होंने साफ कहा कि इंसान प्रकृति माँ का मालिक नहीं है. अगर हमने पर्यावरण और इकोसिस्टम को नहीं बचाया, तो दो से ढाई दशक के अंदर बड़े शहरी इलाकों में मास्क पहनना जरूरी हो जाएगा. ऐसा तब होगा जब कोई महामारी भी नहीं होगी. उनके मुताबिक पर्यावरण की रक्षा करना कोई विकल्प नहीं है. यह संविधान में बताया गया मौलिक कर्तव्य है, जिसे हर व्यक्ति को निभाना चाहिए, ताकि ऐसा नुकसान न हो जिसकी भरपाई न हो सके.

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छात्रों को सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि वे रिसर्च और डेटा जुटाने के लिए एआई की मदद ले सकते हैं. लेकिन अपनी सोच और अपने विचारों को शब्दों में ढालने का काम उन्हें खुद ही करना चाहिए.

उन्होंने युवाओं को कानून की पढ़ाई के लिए प्रेरित किया, ताकि देश का लोकतांत्रिक ढांचा और मजबूत हो सके. उन्होंने बताया कि देश के 27 नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी यानी एनएलयू में 55 से 60 फीसदी दाखिले लड़कियों के होते हैं. मॉक ट्रायल, बहस और फैसले लिखने की प्रतियोगिताओं में भी छात्राएं आगे रहती हैं. न्यायिक नियुक्तियों में भी महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ रही है.

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