दिल्ली की सड़कों पर बीते कुछ हफ्तों से जो कुछ हो रहा है, उसे सिर्फ "छात्र आंदोलन" कहकर निपटा देना नाइंसाफी होगी. NEET पेपर लीक के मुद्दे पर जो गुस्सा मई में कांग्रेस और विपक्ष की गलियों में सुलग रहा था, वो जुलाई आते-आते कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के हाथों में चला गया, और इस ट्रांसफर के पीछे जितनी कहानी सड़क पर दिखती है, उससे कहीं ज्यादा कहानी पर्दे के पीछे है.
सवाल सीधा है. क्या CJP सच में एक "ऑर्गैनिक" और गुस्साए छात्रों का आंदोलन है, या यह वो प्रेशर वाल्व है जिसने कांग्रेस और बाकी विपक्षी दलों को रेस से बाहर कर दिया? और इस सबके बीच आम आदमी पार्टी किस तरफ खड़ी है, और क्यों?
कहानी की शुरुआत 12 मई से होती है, जब नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने बिहार और गुजरात में हुई गड़बड़ियों के चलते NEET-UG 2026 परीक्षा रद्द की. उसी दिन कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI ने दिल्ली में प्रदर्शन शुरू कर दिए. अगले ही दिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केसी वेणुगोपाल ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफे की मांग कर दी.
21 मई को राहुल गांधी ने खुद कांग्रेस के मार्च को रीट्वीट करते हुए एक्स पर लिखा कि जब तक धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते और देश में पेपर लीक रोकने का मजबूत सिस्टम नहीं बनता, तब तक वे नहीं रुकेंगे.
लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि 14-15 मई को कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों, सपा, लेफ्ट ने रणनीति बदल दी. सड़क पर बड़े जमावड़े की जगह उन्होंने प्रेस बयानों और संसद में चर्चा की मांग को तरजीह दी. 16 मई को इंडियन यूथ कांग्रेस ने तीन मूर्ति सर्किल से शिक्षा मंत्री के आवास तक मार्च निकाला, जिसमें उनके नेताओं को हिरासत में लिया गया. यानी विपक्ष सड़क पर था, लेकिन उतनी तेजी और मास मोबिलाइजेशन के साथ नहीं, जितना मुद्दे की गंभीरता मांग रही थी. ठीक इसी खालीपन में एक नया किरदार दाखिल हुआ - कॉकरोच जनता पार्टी.
कॉकरोच जनता पार्टी कैसे बनी?
सुप्रीम कोर्ट में 16 मई को ही पेपर लीक से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान बेरोजगार छात्र आंदोलनकारियों की तुलना "कॉकरोच" और "परजीवियों" से करने वाली एक टिप्पणी सामने आई. अभिजीत दिपके ने इसी टिप्पणी को लपक लिया और एक व्यंग्यात्मक राजनीतिक मोर्चे 'कॉकरोच जनता पार्टी' का गठन कर दिया. देखते ही देखते लाखों युवा इस पार्टी से जुड़ गए.
इंस्टाग्राम से शुरू हुआ ये मूवमेंट सोशल मीडिया पर छा गया. 17 मई से 5 जून तक यूथ कांग्रेस सड़क पर मौजूद रही, लेकिन CJP इस दौरान डिजिटल मोबिलाइजेशन पर फोकस करती रही. सोशल मीडिया के जरिए देशभर के नाराज NEET छात्र इससे जुडते चले गए. 6 जून को दिपके दिल्ली के जंतर मंतर पहुंचे और CJP ने पहला बड़ा प्रदर्शन शुरू किया, जिसकी इकलौती और गैर-समझौते वाली मांग थी - धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा.
एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक भी 28 जून को इस आंदोलन से जुड़ गए और अनशन पर बैठ गए. 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस ने दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश का हवाला देते हुए उन्हें जबरन उठाकर अस्पताल में भर्ती करा दिया. ताजा हालात ये हैं कि 26 दिनों के अनशन के बाद सोनम वांगचुक ने अपना भूख हड़ताल खत्म कर दिया है. इस बीच कॉकरोच जनता पार्टी और सरकार के बीच बातचीत का दौर भी शुरू हो गया.
20 जुलाई का 'संसद चलो' मार्च और पुलिस एक्शन
मॉनसून सत्र के पहले ही दिन, 20 जुलाई को, CJP के हजारों छात्र समर्थकों ने "संसद चलो" मार्च निकाला. मांगें साफ थीं, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और शिक्षा-परीक्षा में सुधार. लेकिन दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट कर दिया था कि इस मार्च के लिए न इजाजत मांगी गई थी, न दी गई, और नई दिल्ली इलाके में BNSS की धारा 163 लागू थी.
नतीजा वही हुआ जो अक्सर होता है, लाठीचार्ज, आंसू गैस, पथराव के आरोप-प्रत्यारोप, बैरिकेड टूटे, एक पेट्रोल पंप में तोड़फोड़ हुई. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 118 पुलिसकर्मी और करीब 60 प्रदर्शनकारी घायल हुए. प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि पुलिस की लाठियों में नुकीली कीलें लगी थीं और इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क जाम कर दिया गया था.
दिलचस्प यह है कि 6 जून के शुरुआती जंतर मंतर धरने के लिए इजाजत दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचते ही मिनटों में मिल गई थी. यानी जो पार्टी "कभी इजाजत नहीं मांग रही" कहा जा रहा है, उसने शुरुआत में इजाजत ली थी, और वो भी असाधारण रूप से काफी तेजी से.
क्या CJP ने विपक्ष को बेअसर कर दिया?
यहीं वो थ्योरी आती है जो राजनीतिक विश्लेषकों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा में है, "प्रेशर वाल्व" थ्योरी. इसके मुताबिक, जान-बूझकर CJP के साथ नरमी बरती गई, ताकि कांग्रेस की राजनीतिक पूंजी को मंदा किया जा सके. इस थ्योरी के तीन पहलू हैं, और तीनों को समझना जरूरी है.
1. जब एक छात्र-युवा संगठन आंदोलन की अगुवाई करता दिखा, तो पूरा मुद्दा "कांग्रेस बनाम बीजेपी" की लड़ाई से हटकर "छात्र बनाम सिस्टम" बन गया. इससे NEET विवाद सिर्फ किसी एक सरकार की नाकामी नहीं, बल्कि पूरी परीक्षा व्यवस्था की समस्या के रूप में सामने आया. आलोचकों का मानना है कि इससे कांग्रेस को सरकार पर सीधे राजनीतिक हमला करने का उतना फायदा नहीं मिला.
2. आलोचकों का कहना है कि जब राहुल गांधी और कांग्रेस के नेता आंदोलन में शामिल हुए, तब तक CJP पहले से आंदोलन का चेहरा बन चुका था. ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व करता हुआ नहीं, बल्कि पहले से चल रहे आंदोलन के साथ जुड़ता हुआ नजर आया. इसी आधार पर विरोधियों ने इसे राजनीतिक अवसरवाद बताने की कोशिश की. हालांकि, पेपर लीक का विरोध सबसे पहले कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों ने ही किया था.
3. आलोचकों के मुताबिक, CJP की मौजूदगी से आंदोलन में एक अलग मंच तैयार हो गया. AAP समेत कुछ विपक्षी दलों ने कांग्रेस पर देर से सक्रिय होने का आरोप लगाया. इससे विपक्ष के भीतर मतभेद भी सामने आए और यह धारणा बनी कि छात्रों के गुस्से का पूरा राजनीतिक फायदा किसी एक दल को नहीं मिल सका.
आम आदमी पार्टी का कांग्रेस पर निशाना और CJP को समर्थन
आम आदमी पार्टी इस पूरे आंदोलन में एक दोहरी भूमिका निभाती नजर आई. अरविंद केजरीवाल से लेकर संजय सिंह और सौरभ भारद्वाज जैसे वरिष्ठ AAP नेता सीधे जंतर मंतर पहुंचे. देर रात हुई हिंसक झड़पों के दौरान भी मौके पर मौजूद रहे. AAP नेताओं ने पुलिस के लाठीचार्ज, आंसू गैस और पथराव की खुलेआम निंदा की. अरविंद केजरीवाल ने वांगचुक के अनशन को सार्वजनिक समर्थन दिया, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग दोहराई, और मजाकिया अंदाज में यह भी कह डाला कि वांगचुक को देश का अगला शिक्षा मंत्री बना देना चाहिए.
लेकिन इसी सांस में AAP ने कांग्रेस पर तीखा हमला भी बोला. सौरभ भारद्वाज ने खुले तौर पर कहा कि जब राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर अचानक प्रदर्शन किया, तो इससे एक महीने की छात्र कुर्बानी की अनदेखी हुई. AAP का कहना है कि कांग्रेस असल में आंदोलन की मदद नहीं, बल्कि उसे "निगलने" यानी हाईजैक करने की कोशिश कर रही थी.
AAP और CJP का पुराना रिश्ता... क्या यह "प्रॉक्सी" आंदोलन है?
CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके एक राजनीतिक कम्युनिकेशन रणनीतिकार रहे हैं, जिन्होंने 2020 से 2023 के बीच AAP की आधिकारिक सोशल मीडिया टीम के साथ बतौर वॉलंटियर काम किया था. वही मीम-आधारित डिजिटल कैंपेन डिजाइन करते हुए, जिन्होंने अरविंद केजरीवाल को 2020 का दिल्ली विधानसभा चुनाव जिताने में मदद की. दिपके के मनीष सिसोदिया समेत AAP के शीर्ष नेतृत्व से जगजाहिर निजी रिश्ते भी रहे हैं.
यही वजह है कि कांग्रेस ने पर्दे के पीछे बार-बार यह आरोप लगाया कि "व्यंग्यात्मक युवा मोर्चा" असल में AAP की एक प्रॉक्सी डिजिटल मुहिम है, जो छात्रों की सद्भावना हथियाने और राजधानी में पेपर लीक विरोधी नैरेटिव पर एकाधिकार जमाने के लिए बनाई गई. यहां तक कि CJP के भीतर से भी कुछ पूर्व नौकरशाहों और शुरुआती सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया, क्योंकि दिपके यह साफ नहीं कर पाए कि यह "व्यंग्यात्मक पार्टी" एक स्वतंत्र संगठन है या AAP द्वारा कोरियोग्राफ की गई प्रॉक्सी मुहिम.
संसद में गतिरोध और सरकार की सफाई
20 जुलाई को ही मॉनसून सत्र के पहले दिन विपक्ष के भारी हंगामे के चलते संसद में पूरी तरह गतिरोध बना रहा. विपक्ष ने नियम 267 के तहत कामकाज रोककर तुरंत चर्चा की मांग की. राज्यसभा में मल्लिकार्जुन खड़गे ने छात्रों के खिलाफ बल प्रयोग और आंसू गैस की निंदा की, और राहुल गांधी-खड़गे की अगुवाई में विपक्ष ने साफ कर दिया कि प्रधान के इस्तीफे तक वे किसी सामान्य चर्चा में हिस्सा नहीं लेंगे.
दूसरी तरफ संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि सरकार चर्चा को तैयार है, लेकिन विपक्ष के "अड़ियल रुख" के चलते सदन बार-बार स्थगित करना पड़ा. बढ़ते संकट को थामने के लिए 20 जुलाई को ही जेपी नड्डा ने CJP प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका से मुलाकात की.
तो फिर कांग्रेस के प्रदर्शन को "राजनीतिक" कहकर खारिज क्यों किया जाए?
अब आखिरी और शायद सबसे बुनियादी सवाल. जब कांग्रेस या कोई भी विपक्षी दल सड़क पर उतरकर सरकार से जवाबदेही मांगता है, तो उसे फौरन "राजनीतिक ड्रामा" या "अवसरवाद" कहकर खारिज क्यों कर दिया जाता है? आखिर विपक्षी दलों का काम ही राजनीति करना है. सत्ता से सवाल पूछना, जनता के मुद्दों को संसद तक ले जाना, और चुनावी मैदान में उसका हिसाब मांगना, यही तो लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका है.
अगर कांग्रेस ने मई में ही धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग उठाई, संसद में गतिरोध बनाया, और सड़क पर मार्च निकाला, तो यह "राजनीति" कैसे बुरी हो गई, जबकि एक "व्यंग्यात्मक" पार्टी का उदय और उसे मिलने वाली तमाम सहूलियतें (तुरंत प्रदर्शन की इजाजत, सरकार से सीधी बातचीत का न्योता) अचानक "ऑर्गैनिक" और "गैर-राजनीतिक" करार दे दी गईं? जिस दिन एक सुप्रीम कोर्ट टिप्पणी से बनी पार्टी को कुछ ही घंटों में जंतर मंतर पर धरने की इजाजत मिल जाती है, और जिस पार्टी की जड़ें खुद AAP के डिजिटल कैंपेन से जुड़ी निकलती हैं, उसे "गैर-जनीतिक" मान लेना, यही असल विडंबना है.
सच यह है कि CJP भले ही सतह पर एक छात्रों के गुस्से के साथ दिखे, लेकिन उसकी टाइमिंग, उसे मिली सहूलियतें, और उसके नेतृत्व के राजनीतिक रिश्ते बताते हैं कि यह आंदोलन जितना छात्रों का है, उतना ही एक बड़े सत्ता-संतुलन के खेल का हिस्सा भी है, जिसमें कांग्रेस अलग-थलग पड़ी, AAP ने अपना राजनीतिक फायदा तलाशा, और असली मुद्दा NEET पेपर लीक और उसमें मरने वाले छात्रों का इंसाफ - कहीं पीछे छूटता चला गया.
एम. नूरूद्दीन