बॉम्बे हाई कोर्ट ने छह किलो से ज्यादा कोकीन के साथ गिरफ्तार एक महिला को मानवीय आधार पर जमानत दी है. हालांकि, यह जमानत सिर्फ आठ महीने के लिए है. कोर्ट ने महिला को उसके बच्चे की देखबाल के लिए आठ महीने की जमानत दी है. लेकिन इसके बाद महिला को जेल में सरेंडर करना होगा.
पालघर की रहने वाली 40 वर्षीय पूजा लवप्रीत लाल को डायरेक्टरेट ऑफ़ रेवेन्यू इंटेलिजेंस (DRI) ने मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर गिरफ़्तार किया था. महिला बिस्कुट और चॉकलेट के बीच 300 कैप्सूल में छिपाकर 62 करोड़ रुपये की कोकीन की तस्करी कर रही थी. वह दोहा से आई थी. DRI अधिकारियों का मानना है कि वह एक इंटरनेशनल ड्रग माफ़िया का हिस्सा है.
इस मामले में जस्टिस मिलिंद जाधव की बेंच ने देखा कि उसका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है. लेकिन कोर्ट में इस बात पर भी ध्यान दिलाया गया कि उसे पहले भी बच्चे को जन्म देने के लिए तीन महीने की ज़मानत दी गई थी. उसके बच्चे का जन्म 9 जनवरी, 2026 को हुआ था. हालांकि, वह अपने बच्चे के साथ वापस जेल चली गई थी.
बेंच ने कहा, "यह कोर्ट मेडिकल मामलों का एक्सपर्ट नहीं है, लेकिन रिपोर्ट को पहली नज़र में देखने से साफ़ पता चलता है कि पैदा हुए बच्चे को सांस लेने में तकलीफ (रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस) और ब्रोंकोनिमोनिया की समस्या रही है, जिसके लिए उसे लंबे समय तक NICU में इलाज की ज़रूरत है. बच्चे का इलाज किया गया था लेकिन तीन महीने बाद महिला बच्चे के साथ जेल चली गई और तब से वह अपने बच्चे के साथ जेल में ही है."
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हालांकि, इस मामले में अभियोजन पक्ष की तरफ से पेश वकील ऋषिकेश मुंडे ने जमानत अर्जी का विरोध करते हुए इस मामले को मानवीय आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए.
ऋषिकेश मुंडे ने कहा कि हर हफ्ते महिला और उसके बच्चे को इलाज के लिए अस्पताल भेजा जाता था और अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद ऐसी हालिया मेडिकल रिपोर्ट नहीं है जिससे पता चले कि बीमारी लगातार बनी हुई है, जिसके आधार पर उसरी जमानत अर्जी पर विचार किया जा सके. मुंडे ने कहा कि भले ही रिकॉर्ड में कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, लेकिन ऐसे बयान हैं जिनसे पता चलता है कि वह सिंडिकेट की बहुत भरोसेमंद सदस्य रही है और ड्रग तस्करी में माहिर रही है.
बेंच ने देखा कि बच्चे को लोअर रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन हुआ था, जिसके लिए लगातार दवा और नेबुलाइज़ेशन की जरूरत थी, जबकि मां को भी मेडिकल देखभाल और अतिरिक्त पौष्टिक आहार की ज़रूरत थी. कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट में बच्चे की मेडिकल स्थिति को देखते हुए उसे सुरक्षा और सही देखभाल की जरूरत है.
कोर्ट ने कहा कि जेल में बंद बच्चों को मेडिकल सुविधाएं मिलनी चाहिए लेकिन सिर्फ इस आधार पर जमानत का अधिकार नहीं बनता, खासकर NDPS एक्ट की धारा 37 की शक्त शर्तों को देखते हुए. बेंच ने कहा कि हर मामले में बच्चे और हालात को अलग-अलग देखकर फैसला किया जाना चाहिए. बेंच ने कहा कि इस मामले में नवजात की सेहत गंभीर है.
ऐसे में बच्चे की परवरिश जेल के बजाय घर के माहौल और अस्पताल की उचित देखभाल में होना बेहतर है, क्योंकि उसे बार-बार मेडिकल जांच और इलाज की जरूरत है. इसी आधार पर कोर्ट ने महिला को आठ महीने के लिए तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है. इस अवधि के बाद उन्हें दोबारा जेल में सरेंडर करना होगा.
विद्या