बेटा पहाड़ पर खड़ा था... मां फफक रही थी... बाप बेबस था... एक परिवार के आखिरी तीन घंटे की कहानी

छत्रपति संभाजीनगर के पहाड़ पर सुबह करीब 10 बजे एक परिवार अपने 18 साल के बेटे को बचाने पहुंचा था. तीन घंटे तक उसे समझाने की कोशिश होती रही. मां रोती रही, गांव के लोग और सरपंच उसे मनाते रहे, पुलिस और फायर ब्रिगेड भी पहुंची. लेकिन दोपहर करीब 1 बजे एक ऐसी घटना हुई, जिसने पूरे परिवार को खत्म कर दिया.

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बेटे को बचाने की कोशिश में मां-पिता की भी मौत. (Photo: Screengrab) बेटे को बचाने की कोशिश में मां-पिता की भी मौत. (Photo: Screengrab)

इसरारउद्दीन चिश्ती

  • संभाजीनगर,
  • 22 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 12:49 PM IST

ये दर्दनाक कहानी महाराष्ट्र की है. सुबह के करीब 10 बज रहे थे. छत्रपति संभाजीनगर के तिसगांव इलाके में खवड्या पहाड़ के पास एक युवक पहुंचा था. उम्र करीब 18 साल. सामने गहरी खाई थी और नीचे खड़े थे उसके अपने लोग. मां उसे समझा रही थी. गांव के लोग उसे आवाज दे रहे थे. कुछ देर बाद पुलिस और फायर ब्रिगेड भी पहुंच गई. लेकिन लड़का नीचे आने को तैयार नहीं था. इसके बाद जो हुआ, उसने एक पूरे परिवार को खत्म कर दिया.

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पुलिस के मुताबिक, कुणाल चांदवडे किसी बात को लेकर परेशान था. वह खवड्या पहाड़ पर पहुंचा था. शुरुआती जानकारी में मोबाइल फोन को लेकर परिवार के साथ हुए विवाद की बात सामने आई है. जब घरवालों को पता चला कि कुणाल पहाड़ पर पहुंच गया है, तो उसके माता-पिता भी वहां पहुंच गए. मां संगीता सामने खड़ी थीं. बेटा ऊपर था. मां उसे नीचे आने के लिए कह रही थी. लेकिन कुणाल अपनी जगह से नहीं हटा.

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खवड्या पहाड़ कोई सामान्य जगह नहीं है. यहां नुकीले और कटे हुए पत्थरों के बीच गहरी खाई है. ऐसे में वहां खड़े व्यक्ति को सुरक्षित नीचे लाना अपने आप में बेहद मुश्किल था. यहां वो तीन घंटे की कोशिश शुरू हुई, जिसके आखिर में किसी के पास कुछ नहीं बचना था. कुणाल को मनाने के लिए आसपास के लोग भी जुटने लगे. नजदीकी गांव के सरपंच वहां पहुंचे. उन्होंने भी उससे बात की. उसे समझाने की कोशिश की. मां का रो-रोकर बुरा हाल था.

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एक मां अपने बच्चे को सामने देखकर उससे सिर्फ नीचे आने की गुहार लगा रही थी. मां की आंखों के सामने उसका बेटा खड़ा था. वह उसे बार-बार नीचे आने के लिए कह रही थी. समझाने की कोशिश कर रही थी. शायद मां को उम्मीद थी कि बेटा उसकी आवाज सुनेगा, उसकी तरफ देखेगा और वापस लौट आएगा. सरपंच ने कुणाल को समझाते हुए मोबाइल फोन दिलाने की बात तक कही, लेकिन वह नीचे आने के लिए तैयार नहीं हुआ. एक तरफ परिवार उसे जिंदगी की तरफ वापस खींच रहा था. दूसरी तरफ कुणाल पहाड़ पर खड़ा था.

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जब मामला संभलता नहीं दिखा तो पुलिस और फायर ब्रिगेड की टीम भी मौके पर पहुंच गई. अब वहां सिर्फ परिवार नहीं था. गांव के लोग थे. पुलिस थी. फायर ब्रिगेड थी. सबकी कोशिश एक ही थी- कुणाल को सुरक्षित नीचे लाना. लेकिन वक्त निकलता जा रहा था. सुबह के 10 बज चुके थे. फिर 11 बजे. दोपहर करीब आने लगी. मां की कोशिशें जारी थीं. बेटे को समझाने की हर मुमकिन कोशिश की जा रही थी. लेकिन हालात जस के तस थे.

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सोचिए, एक मां के लिए वो तीन घंटे कैसे रहे होंगे. सामने उसका बेटा जिंदगी और मौत के बीच खड़ा था. वह उसे आवाज देती रही होगी. शायद कभी प्यार से, कभी गुस्से में, कभी रोते हुए. लेकिन बेटा नीचे नहीं आया.

करीब 1 बजे: पिता बेटे के पास पहुंचे

करीब तीन घंटे की कोशिश के बाद जब समझाने की तमाम कोशिशें काम नहीं आईं तो कुणाल के पिता मुरलीधर खुद पहाड़ पर उसकी तरफ बढ़े. पिता शायद सोच रहे थे कि बेटा किसी और की बात नहीं सुन रहा, लेकिन शायद उनका हाथ पकड़ लेगा. शायद पिता को लगा होगा कि वह अपने बेटे को किसी तरह पकड़कर नीचे ले आएंगे.

वह कुणाल के करीब पहुंचे. उसे समझाने की कोशिश की. फिर उसे पकड़ने की कोशिश की. लेकिन पहाड़ की स्थिति बेहद खतरनाक थी. और फिर... दोनों का संतुलन बिगड़ गया. कुणाल और उसके पिता पहाड़ से नीचे गिर गए. नीचे खड़े लोगों के लिए यह सब कुछ पलक झपकते होने जैसा था. जिस बेटे को बचाने के लिए पिता ऊपर गए थे, अब दोनों नीचे गिर चुके थे.

मां ने पति और बेटे को गिरते देखा

इसके बाद जो हुआ, उसने वहां मौजूद हर शख्स को हिला दिया. संगीता ने अपनी आंखों के सामने अपने पति और बेटे को पहाड़ से गिरते देखा. जिस बेटे को वह सुबह से समझा रही थीं... जिसे बचाने के लिए तीन घंटे से रो रही थीं... वही बेटा अब उनके सामने नीचे गिर चुका था. और पति भी. इसके बाद मां ने भी पहाड़ से छलांग लगा दी. कुछ ही पलों में परिवार के तीनों सदस्य मौत के मुंह में चले गए. कुणाल परिवार का इकलौता बेटा बताया जा रहा है. परिवार की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी. उसके पिता ड्राइवर का काम करते थे.

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जिस परिवार में सुबह तक मां थी, पिता थे और उनका इकलौता बेटा था, दोपहर होते-होते वहां सिर्फ चीख-पुकार और सन्नाटा बचा था. इस घटना ने वहां मौजूद लोगों को भी अंदर तक हिला दिया.

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पुलिस की शुरुआती जानकारी में मोबाइल फोन को लेकर विवाद की बात सामने आई है. लेकिन कुणाल किस मानसिक परेशानी से गुजर रहा था और आखिर उसे ऐसी स्थिति तक पहुंचाने वाली वजहें क्या थीं, पुलिस इन तमाम पहलुओं की जांच कर रही है. किसी चीज की चाहत और जिंदगी खत्म करने के फैसले के बीच बहुत सारी अनकही बातें हो सकती हैं. 

परिवार कुणाल को रोकने के लिए वहां पहुंचा था. मां उसे तीन घंटे तक समझाती रही. गांव वाले उसे मनाते रहे. सरपंच ने समझाया. पुलिस और फायर ब्रिगेड पहुंची. और आखिर में पिता ने खुद आगे बढ़कर बेटे को बचाने की कोशिश की. लेकिन एक पल में सबकुछ बदल गया.

सुबह 10 बजे खवड्या पहाड़ पर एक बेटा खड़ा था. नीचे मां की आंखों में आंसू थे. पिता बेटे को वापस लाने के लिए बेबस थे. तीन घंटे तक जिंदगी को बचाने की कोशिश होती रही. दोपहर करीब 1 बजे वही पहाड़ तीनों की आखिरी मंजिल बन गया. और पीछे रह गई एक ऐसी कहानी, जिसमें एक मां-बाप अपने बेटे को बचाने निकले थे... लेकिन घर लौटने के लिए तीनों में से कोई नहीं बचा.

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