महाराष्ट्र की सियासत में शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे की नाराजगी सिर्फ बीजेपी और एकनाथ शिंदे से ही नहीं है बल्कि महाविकास अघाड़ी के अपने साथियों से भी है. उद्धव ने अपने 6 सांसदों की बगावत के बाद महाविकास अघाड़ी के विधायकों की बैठक बुलाई थी, जिसमें कांग्रेस और शरद पवार के न पूरे विधायक पहुंचे और न ही बड़े नेता.
महाविकास अघाड़ी के विधायकों की बैठक उद्धव ठाकरे ने पूछा कि हम कहते तो हैं कि साथ हैं, लेकिन क्या हम वकायी में साथ हैं. महाविकास अघाड़ी की एकता सिर्फ बैठकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए बल्कि अगर गठबंधन सच में साथ है तो यह बात सड़क और सदन के भीतर भी दिखनी चाहिए.
उद्धव ठाकर ने जिस तरह महाविकास अघाड़ी की एकजुटता पर संदेह जाहिर किया है, उससे साफ है कि कांग्रेस और शरद पवार की पार्टी एनसीपी (एसपी) के रवैए से खुश नहीं है. उद्धव ठाकरे को लगता है कि उनके संकट के दौर में महाविकास अघाड़ी का कोई साथी उनके साथ खड़ा नजर नहीं आया.
उद्धव की बैठक में MVA के 23 विधायक नहीं पहुंचे
शिवसेना (यूबीटी) के 6 लोकसभा सांसदों की बगावत के बाद उद्धव ठाकरे ने बुधवार देर शाम महाविकास अघाड़ी के विधायकों की बैठक बुलाई थी. उद्धव ने मीटिंग में महाविकास अघाड़ी के साथियों के बड़े नेताओं को बुलाया गया था. इस बैठक में महाविकास अघाड़ी के 60 में से 37 विधायक ही पहुंचे थे और 23 विधायक शामिल नहीं हुए.
महाराष्ट्र विधानसभा के मॉनसून सत्र के बीच उद्धव ठाकरे ने विधायकों की बैठक बुलाई थी, जिसके बाद भी पूरे विधायक नहीं पहुंचे. इसके अलावा गठबंधन के बड़े नेताओं में से भी कोई शरीक नहीं हुआ. एनसीपी (एसपी) के नेता जयंत पाटिल भी नहीं पहुंचे और न ही शरद पवार शामिल हुए.. इसे लेकर उद्धव ठाकरे का अब दर्द छलक गया है और उन्होंने महाविकास अघाड़ी की एकता पर ही सवाल उठा दिया.
उद्धव ठाकरे क्या कांग्रेस-शरद पवार से नाराज हैं?
उद्धव ठाकरे अब जोर दे रहे हैं कि महाविकास अघाड़ी की एकजुटता सिर्फ बैठकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए . अगर हमारा गठबंधन सच में साथ है, तो यह बात सदन के भीतर भी दिखनी चाहिए और राज्यभर में भी. उन्होंने कहा कि महाविकास अघाड़ी के रूप में हम राज्य में एक बड़ी ताकत हैं. हमें आपस में समन्वय बनाए रखना होगा और भविष्य में तीनों पार्टियां मिलकर संयुक्त सभाएं, रैलियां करेंगी.
शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा कि हम कहते हैं कि हम एक साथ हैं, लेकिन क्या हम वास्तव में एक साथ हैं? क्या हम सदन में महाविकास अघाड़ी के रूप में एकजुट हैं? क्या हम एक साथ मिलकर मुद्दे उठाते हैं. एकजुट विपक्ष के रूप में काम करना चाहिए. इसके अलावा पूरे राज्य में होने वाली सभाएं, बैठकें और आंदोलन तीनों पार्टियों को मिलकर करने चाहिए, ताकि पूरे महाराष्ट्र में हमारी एकजुटता का संदेश जाए.
उद्धव ठाकरे की नाराजगी अपने दोनों ही सहयोगी दलों से है, क्योंकि उन्होंने यह सवाल ऐसे वक्त पर उठा है, जब उनके गुट के 6 सांसद अलग हो चुके हैं. विधानसभा सत्र के बीच बैठक में महाविकास अघाड़ी के 23 विधायक नहीं पहुंचे. इसलिए उन्हें लगता है कि महाविकास अघाड़ी सिर्फ एकजुटता की बात करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर एकता नहीं है. उनके छलका दर्द ने शरद पवार की एनसीपी (एसपी) के मतभेदों को सतह पर ला दिया है.
बीजेपी और शिंदे से उद्धव ठाकरे की नाराजगी
महाराष्ट्र की राजनीति में उद्धव ठाकरे बीजेपी और एकनाथ शिंदे से नाराज है. यह नाराजगी समझ में आती है कि एकनाथ शिंदे ने उनसे सत्ता छीनने के साथ शिवसेना भी छीन ली. उद्धव ठाकरे के 40 विधायकों को शिंदे ने 2022 में अपने साथ मिला लिया था, उसके बाद अब दोबारा से शिवसेना (यूबीटी) के छह लोकसभा सांसदों ने बगावत कर शिंदे का दामन थाम लिया है. इस तरह शिंदे ने दो बार उद्धव ठाकरे को सियासी झटका ही नहीं दिया बल्कि उनकी राजनीति को हिलाकर रख दिया है.
उद्धव ठाकरे को लगता है कि उनकी पार्टी में हुई बगावत के पीछ बीजेपी का हाथ है. बीजेपी के मदद से ही एकनाथ शिंदे ने उनकी सत्ता छीनी और पार्टी तोड़ने का काम किया. इसी वजह से उद्धव की नाराजगी बीजेपी और शिंदे से है, जो साफ जाहिर होती है, लेकिन अब जिस तरह से उन्होंने महाविकास अघाड़ी को लेकर सवाल खड़े किए हैं, उसकी वजह क्या है?
कांग्रेस-शरद पवार से क्या उद्धव ठाकरे नाराज
शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी के साथ अपना 25 साल पुराना गठबंधन तोड़कर कांग्रेस और एनसीपी के साथ हाथ मिलाया था. उद्धव ने वैचारिक मतभेद के बाद भी कांग्रेस और एनसीपी से मिलकर सरकार बनाई, लेकिन जब उनकी पार्टी में बगावत हुई तो महाविकास अघाड़ी साथ नहीं खड़ी हुई.
एकनाथ शिंदे के बागवत के समय उद्धव ठाकरे अकेले पड़ गए थे, कांग्रेस और शरद पवार नहीं दिखे. शिवेसना (यूबीटी) के दोबारा लोकसभा सांसदों ने बगावत करके शिंदे के साथ गए तो कांग्रेस और शरद पवार बचाव करते हुए उद्धव के साथ नहीं दिखे. शिवसेना (यूबीटी) के भीतर यह भावना ह कि उनकी पार्टी के राजनीतिक हितों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है.
उद्धव ठाकरे की सियासी बेचैनी क्या है?
उद्धव ठाकरे गुट का तर्क है कि कि बीजेपी के खिलाफ सबसे मुखर लड़ाई कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) लड़ रही हैं. उद्धव ठाकरे खेमे की दूसरी बड़ी चिंता भरोसे को लेकर है. शिवसेना (यूबीटी) के कई नेताओं को आशंका है कि भविष्य में महाराष्ट्र की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं.
पार्टी के भीतर यह चर्चा भी रही कि एनसीपी (एसपी) को लेकर लगातार ऐसी अटकलें लगती रही हैं कि वह राजनीतिक परिस्थितियों के हिसाब से अलग रुख अपना सकती है. ऐसे में उद्धव की बैठक में शरद पवार और उनकी पार्टी के नेताओं का न पहुंचना नाराजगी की वजह बनी.
यह नाराजगी इसलिए भी अहम हो जाती है क्योंकि उद्धव ठाकरे पहले से ही कई मोर्चों पर दबाव झेल रहे हैं. एक तरफ एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना में टूट का असर अब भी दिखाई दे रहा है, तो दूसरी तरफ पार्टी के कुछ सांसदों के बगावती तेवरों ने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. उद्धव ठाकरे की लड़ाई अब सिर्फ बीजेपी या शिंदे गुट से नहीं है, बल्कि उन्हें अपने सहयोगियों के बीच भी राजनीतिक स्पेस और सम्मान बनाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.
कुबूल अहमद