RTI पर महाराष्ट्र सरकार का U-टर्न... अन्ना हजारे के विरोध के बाद सीएम फडणवीस ने नए नियम लिए वापस

महाराष्ट्र सरकार ने सूचना का अधिकार (RTI) नियम 2026 के अमल पर फिलहाल रोक लगा दी है। नए नियमों में आवेदन शुल्क बढ़ाने, पहचान पत्र अनिवार्य करने और एक आवेदन में केवल एक विषय रखने जैसे प्रावधान शामिल थे।

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अन्ना हजारे के विरोध के बाद महाराष्ट्र सरकार ने RTI पर बने नए नियमों को वापस लेने का आदेश दिया है अन्ना हजारे के विरोध के बाद महाराष्ट्र सरकार ने RTI पर बने नए नियमों को वापस लेने का आदेश दिया है

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 02 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 7:03 PM IST

महाराष्ट्र सरकार ने विवादों में घिरे सूचना का अधिकार (RTI) नियम, 2026 के अमल पर फिलहाल रोक लगा दी है. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के निर्देश के बाद राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त ने नए नियमों पर रोक की प्रक्रिया शुरू कर 
दी है. 

इन नियमों में RTI आवेदन शुल्क बढ़ाने, पहचान पत्र अनिवार्य करने, एक आवेदन में केवल एक विषय रखने जैसी कई अहम व्यवस्थाएं शामिल थीं. सोशल एक्टिविस्ट अन्ना हजारे ने इन नियमों का कड़ा विरोध करते हुए 5 जुलाई से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की चेतावनी दी थी. इसके बाद सरकार ने फिलहाल इन नियमों पर रोक लगाने का फैसला किया.

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सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री फडणवीस ने गुरुवार को मुख्य सूचना आयुक्त को इन नियमों पर रोक के आदेश दिए थे. इससे पहले राज्य के General Administration Department ने 12 जून को राजपत्र (गजट) में अधिसूचना प्रकाशित कर इन नियमों को तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया था.

क्या थे नए नियम, जिन पर मचा बवाल?

नए नियमों के तहत सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत आवेदन करने के लिए 30 रुपये का आवेदन शुल्क तय किया गया था. सूचना उपलब्ध कराने के लिए प्रति ए4 पेज 5 रुपये और डिजिटल या स्कैन की गई प्रति के लिए भी 5 रुपये प्रति पेज शुल्क निर्धारित किया गया था. 

रिकॉर्ड का निरीक्षण पहले एक घंटे तक निःशुल्क रखा गया था, लेकिन उसके बाद 50 रुपये प्रति घंटा शुल्क देना होता. गरीबी रेखा (बीपीएल) से नीचे रहने वाले आवेदकों को आवेदन शुल्क से छूट दी गई थी, हालांकि 50 पन्नों से अधिक की सूचना लेने पर उन्हें भी निर्धारित शुल्क देना पड़ता.

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इन नियमों में यह भी प्रावधान किया गया था कि एक आरटीआई आवेदन सामान्यतः केवल एक ही विषय से संबंधित होगा और उसकी लंबाई 150 शब्दों से अधिक नहीं होनी चाहिए. अगर किसी आवेदन में कई विषय शामिल होते, तो लोक सूचना अधिकारी (PIO) केवल पहले विषय पर कार्रवाई करता और बाकी विषयों के लिए अलग-अलग आवेदन दाखिल करने की सलाह देता.

किस हिस्से पर था ज्यादा विवाद?

सबसे अधिक विवाद जिस प्रावधान को लेकर हुआ, वह था भारतीय नागरिकता का प्रमाण देना अनिवार्य करना. नए नियमों के अनुसार, प्रत्येक आरटीआई अप्लीकेशन के साथ भारतीय नागरिक होने का प्रमाण देने वाला Self-attested फोटो पहचान पत्र लगाना जरूरी था. अगर आवेदन के साथ पहचान संबंधी दस्तावेज नहीं लगाए जाते, तो आवेदन वापस भी किया जा सकता था.

नियमों में यह सिस्टम भी जोड़ा गया था कि अगर मांगी गई जानकारी पहले से ही संबंधित सरकारी विभाग या सार्वजनिक प्राधिकरण की ऑफिशियल वेबसाइट पर मौजूद है, तो लोक सूचना अधिकारी आवेदक को ऑनलाइन जानकारी देखने का निर्देश दे सकता है और उसकी अलग से प्रतियां उपलब्ध कराने की बाध्यता नहीं होगी.

इसके अलावा, नियमों में स्पष्ट किया गया था कि ऐसी व्यक्तिगत जानकारी, जिसका किसी सार्वजनिक गतिविधि या सार्वजनिक हित से संबंध नहीं है, सामान्यतः सार्वजनिक नहीं की जाएगी, जब तक कि उसे सामने लाने के पक्ष में कोई बड़ा जनहित साबित न हो.

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अपील प्रक्रिया में भी बदलाव का प्रस्ताव था. नए नियमों के अनुसार पहली अपील दाखिल करने के लिए 50 रुपये और महाराष्ट्र राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील दाखिल करने के लिए 100 रुपये शुल्क देना अनिवार्य किया गया था. अपील के साथ जरूरी डॉक्यूमेंट
भी जमा करने होते. सुनवाई भौतिक रूप से या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये कराए जाने का भी प्रावधान रखा गया था.

नियमों में सार्वजनिक प्राधिकरणों के प्रमुखों की जिम्मेदारी भी तय की गई थी. उन्हें सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4 के तहत अधिकतम सूचनाओं का स्वतः प्रकटीकरण (Proactive Disclosure) तय करने को कहा गया था. ऐसा नहीं करने पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सेवा नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई थी.

अन्ना हजारे लगातार कर रहे थे विरोध

इन नियमों का सबसे मुखर विरोध सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने किया. उन्होंने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को भेजे ज्ञापन में आरोप लगाया कि नए नियम सूचना के अधिकार कानून की मूल भावना को कमजोर करते हैं और आम नागरिकों के लिए सूचना प्राप्त करना पहले की तुलना में अधिक कठिन बना देंगे. हजारे का कहना था कि आवेदन शुल्क बढ़ाने, पहचान पत्र अनिवार्य करने, आवेदन को एक विषय तक सीमित करने और अपील प्रक्रिया में अतिरिक्त शुल्क लगाने जैसे प्रावधान पारदर्शिता और जवाबदेही की भावना के खिलाफ हैं.

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उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार ने इन नियमों को बनाने से पहले किसी प्रकार का सार्वजनिक परामर्श नहीं किया. हजारे ने मांग की कि सरकार इन नियमों को पूरी तरह वापस ले और नए नियम तैयार करने से पहले आरटीआई विशेषज्ञों, सूचना आयुक्तों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, पत्रकारों और आम नागरिकों से व्यापक चर्चा करे. इसी मांग को लेकर उन्होंने 5 जुलाई से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू करने की चेतावनी दी थी.

हजारे के विरोध और बढ़ते राजनीतिक व सामाजिक दबाव के बीच राज्य सरकार ने फिलहाल नए नियमों के अमल पर रोक लगाने का फैसला किया है. अब माना जा रहा है कि सरकार इन नियमों की दोबारा समीक्षा कर सकती है और विभिन्न पक्षों से चर्चा के बाद आगे का निर्णय लिया जाएगा.

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