भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण FSSAI ने हाल ही में कुछ खास तरह की शराब की बिक्री पर रोक लगा दी थी. इस बैन के खिलाफ कई बड़ी शराब बनाने वाली कंपनियां बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंच गई हैं. अब इस मामले पर सोमवार को हाईकोर्ट में अहम सुनवाई होगी कि क्या कंपनियां अपनी इन शराब की बोतलों को दोबारा बेच पाएंगी या नहीं.
मशहूर 'मैकडॉवल नंबर-1' बनाने वाली कंपनी यूनाइटेड स्पिरिट्स और 'ओल्ड मॉन्क' की कंपनी मोहन मेकिन समेत कई बड़े नाम इस कानूनी लड़ाई में आमने-सामने आ गए हैं. FSSAI का आरोप है कि कुछ विदेशी और भारतीय शराब IMFL कंपनियां गलत लेबल लगाकर और बिना इजाजत के फ्लेवर मिलाकर शराब बेच रही हैं.
इस मामले की सुनवाई एक्टिंग चीफ जस्टिस रविंद्र घुगे और जज गौतम अंखड की बेंच कर रही है. कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि रातों-रात पूरी इंडस्ट्री को बंद नहीं किया जा सकता है. ऐसा करने से बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है.
हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि शराब कैसे बननी चाहिए, उसकी जांच कैसे हो और उसकी मार्केटिंग का तरीका क्या हो, यह तय करना जजों का काम नहीं है. अदालत ने केंद्र सरकार के वकील और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह को अगली सुनवाई में FSSAI से बात करके पूरी जानकारी के साथ कोर्ट में पेश होने को कहा है.
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असली विवाद क्या है? FSSAI की क्या आपत्तियां हैं?
FSSAI का कहना है कि कई कंपनियां रम और व्हिसकी जैसे ड्रिंक्स में आर्टिफिशियल या मिलते-जुलते फ्लेवर मिला देती हैं, लेकिन उन्हें सीधा 'रम' या 'व्हिसकी' के नाम से बेचती हैं. विभाग का कहना है कि अगर इसमें अलग से फ्लेवर मिला है, तो लेबल पर साफ-साफ 'रम-फ्लेवरेड स्पिरिट' लिखा होना चाहिए, न कि सिर्फ 'रम'.
कई बोतलों पर लिखा होता है कि यह शराब 'कैस्क में पुरानी और परिपक्व' है. लेकिन जांच में सामने आया है कि उसमें ज्यादातर हिस्सा नई और सामान्य अल्कोहल का होता हैय FSSAI का नियम है कि बोतल पर उम्र का दावा करते समय ब्लेंड की सबसे कम उम्र वाली स्पिरिट का ध्यान रखना चाहिए.
कोर्ट में यूनाइटेड स्पिरिट्स के वकील बीरेंद्र सराफ ने अपनी बात रखते हुए कहा कि FSSAI के इस अचानक आए आदेश से शराब उद्योग को भारी नुकसान होगा. उन्होंने बताया कि ये कंपनियां पिछले कई दशकों से इसी तरीके से शराब बनाती आ रही हैं.
वकील ने कहा कि रम बनाने के लिए पुरानी रम के कंसंट्रेट में न्यूट्रल स्पिरिट मिलाई जाती है और स्वाद एक जैसा रखने के लिए थोड़ा फ्लेवर जोड़ना पड़ता है. कंपनियों का यह भी कहना है कि वे रातों-रात अपनी बोतलों के लेबल नहीं बदल सकतीं, क्योंकि इसके लिए पहले राज्य के आबकारी विभाग से इजाजत लेनी पड़ती है.
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दूसरी तरफ, FSSAI ने कोर्ट को भरोसा दिलाया है कि वे शराब की बिक्री रोकने के खिलाफ नहीं हैं, बस कंपनियां सही और सच लेबलों का इस्तेमाल करें. FSSAI का मानना है कि ग्राहकों को गुमराह करके सामान्य शराब को फ्लेवर मिलाकर नहीं बेचा जाना चाहिए. इस पूरे मामले पर सोमवार को हाई कोर्ट में सुनवाई होगी.
विद्या