दिल्ली के जंतर-मंतर पर 36 दिनों तक चले आंदोलन के बाद जब केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे की खबर आई, तो इसे आंदोलन की बड़ी जीत माना गया. लेकिन इस जीत के पीछे एक ऐसा परिवार भी था, जिसने पूरे संघर्ष के दौरान डर, चिंता और भावनात्मक तनाव का सामना किया. छत्रपति संभाजीनगर के रहने वाले अभिजीत दिपके ने कॉकरोच जनता पार्टी बनाकर आंदोलन शुरू किया और आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा. देश के राजनीतिक इतिहास में 12 साल बाद पहली बार किसी केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे की बात सामने आई. आंदोलन सफल रहा, लेकिन इन 36 दिनों में अभिजीत के माता-पिता जिस मानसिक स्थिति से गुजरे, वह बेहद भावुक कर देने वाली रही.
जब अभिजीत ने विदेश की नौकरी छोड़कर राजनीति में आने और अपनी पार्टी बनाने का फैसला किया, तब परिवार को लगा कि वह शायद कुछ समय बाद वापस अपनी नौकरी पर लौट जाएंगे. उनकी मां ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि पढ़ाई पूरी हो चुकी है और अब विदेश जाकर नौकरी करना ही बेहतर रहेगा. पिता को भी चिंता थी कि उनका बेटा बहुत सीधा और ईमानदार है. उनका मानना था कि अभिजीत को झूठ बिल्कुल पसंद नहीं है, जबकि राजनीति में कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. जब आंदोलन संभाजीनगर से निकलकर नागपुर, जयपुर और बेंगलुरु तक पहुंचा, तो परिवार की चिंता भी बढ़ गई. जयपुर में अभिजीत पर हुए हमले की खबर ने उनकी मां को पूरी तरह तोड़ दिया. उन्होंने कई बार बेटे से आंदोलन छोड़ने की अपील की, लेकिन अभिजीत ने साफ कहा कि जब तक मंत्री इस्तीफा नहीं देंगे, वह पीछे नहीं हटेंगे.
बेटे की सुरक्षा के लिए 16 दिन तक बंद रखा मोबाइल
आंदोलन के दौरान अभिजीत को सोशल मीडिया और यूट्यूब पर लगातार धमकियां मिलने लगीं. सुरक्षा को देखते हुए उन्होंने अपने माता-पिता को सतर्क रहने की सलाह दी और कुछ वीडियो भेजकर घर छोड़ने के लिए कहा. बेटे की बात मानकर उनके माता-पिता 21 मई से 7 जून तक घर से बाहर रहे. इस दौरान उन्होंने करीब 16 दिनों तक अपने मोबाइल फोन भी बंद रखे, ताकि किसी तरह की परेशानी या दबाव का सामना न करना पड़े.
परिवार के लिए सबसे कठिन समय वह था, जब जंतर-मंतर पर छात्रों पर लाठीचार्ज की खबरें सामने आईं. टीवी और मोबाइल पर लाठीचार्ज के दृश्य देखकर अभिजीत की मां पूरी तरह टूट गईं. उन्होंने बताया कि अपनी जिंदगी में उन्होंने ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा था. वह दिन-रात बेटे की चिंता में रोती रहीं और उन्होंने खाना-पीना तक छोड़ दिया. रिश्तेदारों और सहेलियों से भी उन्होंने बात करना बंद कर दिया था.
जब मां को लगा बेटा नहीं बचेगा
आंदोलन के दौरान एक दिन जंतर-मंतर पर डीसीपी संदीप लाम्बा ने अभिजीत के हाथ से माइक खींचने और उन्हें नीचे उतारने की कोशिश की. यह दृश्य देखकर उनकी मां घबरा गईं. उन्हें लगा कि अब उनका बेटा शायद जिंदा नहीं बचेगा. उस समय वहां मौजूद अन्य छात्रों ने अभिजीत को संभाला और उन्हें नीचे गिरने से बचाया. इस घटना ने पूरे परिवार को अंदर तक झकझोर दिया. आंदोलन के 36वें दिन दोपहर करीब ढाई बजे अभिजीत के पिता को एक दोस्त का फोन आया. फोन पर बताया गया कि मंत्री ने इस्तीफा दे दिया है. यह खबर सुनते ही पूरे परिवार ने राहत की सांस ली. पिता ने कहा कि उनका बेटा पूरी ईमानदारी और बिना किसी निजी स्वार्थ के छात्रों के भविष्य के लिए यह लड़ाई लड़ रहा था. उनका कहना था कि अभिजीत ने सिर्फ अपने सिद्धांतों के लिए संघर्ष किया.
घर लौटे बेटे का मां ने किया भावुक स्वागत
आंदोलन खत्म होने के बाद जब अभिजीत अपने घर लौटे, तो उनकी मां की आंखों में खुशी के आंसू थे. 36 दिनों तक लगातार संघर्ष करने और माइग्रेन की परेशानी झेलने के बाद घर पहुंचे बेटे के लिए मां ने सबसे पहले उनकी पसंदीदा दाल-खिचड़ी बनाई. पिता ने भी बेटे की सफलता पर गर्व जताया. परिवार का कहना है कि यह जीत केवल अभिजीत की नहीं, बल्कि उन सभी लोगों की है जो इस पूरे संघर्ष के दौरान उनके साथ खड़े रहे. अभिजीत की मौसी और पड़ोसियों का भी कहना है कि जिस काम को देश की बड़ी-बड़ी विपक्षी पार्टियां 12 साल में नहीं कर सकीं, उसे अभिजीत ने अपनी जिद, ईमानदारी और संघर्ष के दम पर पूरा कर दिखाया.
अभिजीत करंडे