पत्नी को मानसिक बीमार बताकर मांगा तलाक, झारखंड HC ने कहा- शादी मुश्किल वक्त में साथ निभाने का नाम

झारखंड हाईकोर्ट ने पति की पत्नी पर मानसिक बीमारी और क्रूरता के आरोपों पर तलाक की याचिका खारिज कर दी है. अदालत ने कहा कि शादी का मतलब सुख-दुख में साथ निभाना है और बिना ठोस सबूत के तलाक नहीं दिया जा सकता.

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झारखंड HC ने शादी की अहमियत बताई है. (Photo- ITG) झारखंड HC ने शादी की अहमियत बताई है. (Photo- ITG)

सत्यजीत कुमार

  • रांची,
  • 04 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 6:48 PM IST

झारखंड हाईकोर्ट ने पत्नी पर मानसिक बीमारी और क्रूरता का आरोप लगाकर तलाक मांगने वाले एक शख्स की याचिका को खारिज कर दिया है. अदालत ने कहा कि शादी का मतलब सिर्फ अच्छे दिनों में साथ निभाना नहीं है, बल्कि सुख हो या दुख, हर हाल में एक-दूसरे का हाथ थामे रहना है.

हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय समाज में शादी का एक खास और पवित्र महत्व होता है. जिंदगी में आने वाली मुश्किलों या किसी स्वास्थ्य समस्या का हवाला देकर अपने साथी का साथ छोड़ देना कानून और न्याय की नजर में बिल्कुल ठीक नहीं है.

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ये सुनवाई हाईकोर्ट के जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच में हुई. पति ने फैमिली कोर्ट, चतरा के 7 सितंबर 2024 के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) और 13(1)(iii) के तहत तलाक की मांग की थी, जिसे हाईकोर्ट ने सबूतों की कमी के चलते खारिज कर दिया.

झारखंड हाईकोर्ट ने ने चतरा फैमिली कोर्ट के पुराने फैसले को पूरी तरह से बरकरार रखा.

क्या था पूरा मामला?

चतरा के रहने वाले इस जोड़े की शादी 31 जनवरी 2016 को हुई थी और उनका एक बेटा भी है. पति सेंट्रल इंडस्ट्रीज सिक्योरिटी फोर्स (CISF) में कार्यरत था और उसकी पोस्टिंग राजस्थान के कोटा में थी. पति ने आरोप लगाया था कि शादी के शुरुआती दिनों से ही उसकी पत्नी का बर्ताव असामान्य और आक्रामक रहता था. उसका दावा था कि वो बिना वजह हंसती थी, खुद से बातें करती थी और रिश्तेदारों के सामने भी असहज स्थिति पैदा करती थी.

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पति का ये भी आरोप था कि शादी से पहले पत्नी की मानसिक स्थिति से जुड़ी बातें उससे छिपाई गई थीं. वहीं, दूसरी ओर पत्नी ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उल्टा पति पर दहेज के रूप में पांच लाख रुपये की मांग को लेकर प्रताड़ित करने का आरोप लगाया था. जानकारी के मुताबिक, पत्नी साल 2021 से अपने मायके में ही रह रही है.

मानसिक बीमारी और मेडिकल रिपोर्ट पर कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि पति या उसका कोई भी गवाह ये साबित नहीं कर पाया कि पत्नी ने कभी कोई शारीरिक हिंसा की हो या किसी तरह की गाली-गलौज की हो. कोर्ट ने ये भी गौर किया कि पति का परिवार शादी से पहले से ही लड़की को जानता था, इसलिए ये दावा करना गलत है कि कोई बात छिपाई गई थी.

पति ने डॉ. एम. जलील की एक मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए पत्नी को स्किजोफ्रेनिया से ग्रसित बताया था. हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि उस रिपोर्ट में न तो बीमारी की पुष्टि थी और न ही उसे लाइलाज बताया गया था. इसके उलट, रांची स्थित 'रिनपास' के मेडिकल बोर्ड ने दोनों पक्षों की मौजूदगी में पत्नी की जांच की थी और कहा था कि उसमें मानसिक बीमारी का कोई लक्षण नहीं है.

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अदालत ने ये भी देखा कि सुनवाई के दौरान पत्नी ने सभी सवालों के बड़े सामान्य और सधे हुए जवाब दिए. वो अपने बेटे की अच्छी तरह देखभाल कर रही है और उसने अपने पति के साथ दोबारा घर बसाने की इच्छा भी जताई. इसके उलट, पति ने ये स्वीकार किया कि उसने पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण के लिए कोई आर्थिक मदद नहीं दी थी.

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

मामले की सुनवाई करते हुए डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के कई अहम फैसलों का जिक्र किया. अदालत ने कहा कि वैवाहिक जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. कई बार गंभीर बीमारियां और मुश्किल हालात भी सामने आ जाते हैं, लेकिन पति-पत्नी को मिलकर उन चुनौतियों का सामना करना चाहिए. सिर्फ कुछ असामान्य व्यवहार या बिना ठोस सबूत के लगाए गए आरोपों के आधार पर शादी के पवित्र बंधन को तोड़ा नहीं जा सकता.

यह भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- दो से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानूनों की प्रासंगिकता खत्म, बड़ी बेंच करेगी समीक्षा

पति की ओर से इस मामले में एडवोकेट ज्योति नयन ने पक्ष रखा था. तमाम दलीलों और सबूतों की बारीकी से जांच करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि पति अपनी पत्नी के खिलाफ न तो क्रूरता के आरोप साबित कर सका और न ही कानूनन मान्य कोई ऐसी मानसिक बीमारी का पुख्ता सबूत दे पाया जो तलाक का आधार बन सके. इसी के साथ हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए पति की अपील खारिज कर दी.

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