बृजभूषण सिंह हुए बरी, जानिए महिला पहलवानों के पास क्या हैं कानूनी विकल्प

महिला पहलवानों के यौन शोषण मामले में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने बृजभूषण शरण सिंह को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है. हालांकि, पीड़ित महिला पहलवान इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दे सकती हैं.

Advertisement
दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया. ( File Photo: PTI) दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया. ( File Photo: PTI)

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 03 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 5:40 PM IST

महिला पहलवानों के यौन शोषण मामले में बृजभूषण शरण सिंह बरी हो गए हैं. कोर्ट ने उन्हें सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है. सोमवार को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने यह अहम फैसला सुनाया. बता दें कि बृजभूषण शरण सिंह 20 जुलाई 2023 से नियमित जमानत पर थे. 10 मई 2024 को अदालत ने दिल्ली पुलिस की चार्जशीट के आधार पर आरोप तय किए थे, जिसके बाद ट्रायल शुरू हुआ था.

Advertisement

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट से भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह को बरी किए जाने के बाद पीड़ित महिला पहलवानों के पास अभी भी अपनी कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए कई संवैधानिक और कानूनी रास्ते खुले हुए हैं. भारतीय नागरिक न्याय प्रणाली के तहत वे हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती दे सकती हैं.

आपराधिक मामलों के वकील और कानून विशेषज्ञ असगर खान के मुताबिक, पीड़ित पक्ष इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दायर कर सकता है. कानूनन निचली अदालत के बरी करने के फैसले को चुनौती देने के लिए पीड़ितों के पास अपील करने का अधिकार होता है. आपराधिक मामलों के वकील जेके शर्मा के मुताबिक, राज्य सरकार यानी दिल्ली पुलिस भी इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दायर कर सकती है. यदि राज्य को लगता है कि अदालत ने सबूतों का सही मूल्यांकन नहीं किया है, तो वह बरी किए जाने के आदेश को चुनौती दे सकता है.

Advertisement

किन कानूनी आधारों पर की जा सकती है अपील?

उनका कहना है कि अगर सबूतों की गलत व्याख्या की गई है, तो यह तर्क दिया जा सकता है कि निचली अदालत ने गवाहों के बयानों या दस्तावेजों को समझने में गलती की है. इसके अलावा, यदि ट्रायल के दौरान किसी महत्वपूर्ण कानूनी पहलू या गवाह को नजरअंदाज किया गया हो, तो इस आधार पर भी फैसले को चुनौती दी जा सकती है.

सुप्रीम कोर्ट का रास्ता भी खुला

यदि दिल्ली हाईकोर्ट से भी राहत नहीं मिलती है, तो मामला देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में जा सकता है. वहां विशेष अनुमति याचिका के जरिए इस फैसले को चुनौती दी जा सकती है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »