बीमारी खत्म करने के लिए खुद से लेते हैं एंटीबायोटिक दवा? भारतीयों के बन रही जानलेवा, इलाज का खर्च भी बढ़ा

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की स्टडी में पता चला है कि भारत में ड्रग रेजिस्टेंट बैक्टीरियल संक्रमण मरीजों की मौत का कारण बन रहा है. 2022-2025 के आंकड़ों के अनुसार, 61.1% मरीज कार्बेपनेम-रेजिस्टेंट थे. यानी इन मरीजों पर कई तरह की एंटीबायोटिक दवाओं का असर नहीं हो रहा है.

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खुद से दवा लेना खतरनाक खुद से दवा लेना खतरनाक

आजतक हेल्थ डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 01 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 8:06 PM IST

किसी इंफेक्शन को खत्म करने के लिए एंटीबायोटिक दवाएं ली जाती हैं, लेकिन अब इनका असर नहीं हो रहा है. इससे मरीजों की मौत तक हो रही है. ये सुनने में भले ही अजीब लग रहा है, लेकिन ऐसा हो रहा है. मेडिकल साइंस में इसको ड्रग रेसिस्टेंस कहा जाता है. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की नई स्टडी कहती है कि ड्रग रेजिस्टेंट बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से न सिर्फ मौत का खतरा बढ़ रहा है, बल्कि इलाज भी महंगा हो रहा है. इसको लेकर एक स्टडी हुई है जिसमें यह जानकारी सामने आई है. 

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ये रिसर्च द लेंसेट रीजनल हेल्थ-साउथेस्ट एशिया में पब्लिश हुई है. इसके आंकड़े 2022 से 2025 के बीच के हैं जिसमें करीब 1.6 लाख मरीजों पर रिसर्च की गई है. इस स्टडी के हिसाब से इन्फेक्शन्स में 61.1 फीसदी मरीज कार्बेपनेम-रेजिस्टेंट थे.यानी इन मरीजों पर कार्बेपनेम एंटीबायोटिक्स का असर ही नहीं हो रहा रहा था.  ऐसे बिना वजह एंटीबायोटिक खाने और इस वजह से होने वाले ड्रग रेजिस्टेंट से हो रहा था. एंटीबायोटिक का शरीर पर असर न होने से  इलाज के लिए सही एंटीबायोटिक चुनना चुनौती बनता जा रहा है.जब दवाएं असर नहीं कर रही है तो दूसरी दवाएं देनी पड़ रही है जो काफी महंगी है. कुछ मामलों में  एंटीबायोटिक का असर न होना मौत का कारण भी  बन रहा है.

ड्रग रेजिस्टेंस क्या होता है

ICMR की सीनियर साइंटिस्ट और स्टडी की राइटर डॉ. कामिनी वालिया के मुताबिक ड्रग रेजिस्टेंस  भारत में लोगों की जान ले रहा है. उनका कहना है कि बिना वजह एंटीबायोकि लेने इसका एक बड़ा कारण है. जब व्यक्ति ज्यादा एंटीबायोटिक लेता है तो बैक्टीरिया उनको पहचान लेते हैं और इनके खिलाफ ताकतवर हो जाते हैं. ऐसे में दवा लेने के बाद भी बैक्टीरिया पर उनका असर नहीं होता है. ऐसे में इलाज मुश्किल हो जाता है और कुछ मामलों में मौत भी हो सकती है. इसका सॉल्यूशन सही टाइम पर जांच और एंटीबायोटिक का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना है.

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ड्रग-रेजिस्टेंट संक्रमण में मौत का खतरा कितना ज्यादा?

Klebsiella pneumoniae इंफेक्शन में ड्रग रेजिस्टेंस से होने वाली मरीजों की मृत्यु दर 31.2 फीसदी थी, जबकि सेंसिटिव इंफेक्शन वाले मरीजों में यह 23.5 फीसदी थी. ड्रग-रेजिस्टेंट इंफेक्शन का असर सिर्फ मरीज पर नहीं बल्कि उसकी जेब भी पड़ रहा है. स्टडी कहती है कि इस कंडीशन में पहुंचने वाले पेशेंट को दोगुना पैसे खर्च करने पड़ते हैं. रेजिस्टेंट संक्रमणों में एंटीबायोटिक इलाज की लागत 1.1 से 2 गुना तक ज्यादा रही है. 

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ये बहुत बड़ी समस्या क्यों है

इस बारे में दिल्ली के जीटीबी अस्पताल में मेडिसन विभग में डॉ कुलदीप सिंह ने बताया है. वह कहते हैं कि ड्रग-रेजिस्टेंट की वजह से  इंफेक्शन का इलाज मुश्किल हो जाता है और पेशेंट को लंबे सयत तक ट्रीटमेंट की जरूरत पड़ सकती है. घरों में भी कई गलतियां की जा रही हैं. लोग दवा को खुद से खाना शुरू कर देते हैं, कुछ मामलों में बिना जरूरत या फिर वायरल इंफेक्शन में भी एंटीबायोटिक खाते हैं, वहीं कुछ लोग कोर्स को पूरा किए बिना बंद कर देते हैं. ये सब ही ड्रग रजिस्टेंस का कारण बन रहे हैं. 

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