'सतलुज' हटने की वजह है 30 साल पहले 'माचिस' से निकली चिंगारी? चुनाव पर पड़ा था असर, अब भी है ओटीटी पर

दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' को जी5 से अचानक हटाए जाने पर विवाद छिड़ चुका है. पंजाब में उग्रवाद के दौर और पुलिस बर्बरता के मुद्दे पर साल 1996 में गुलजार की फिल्म 'माचिस' भी आई थी. 'सतलुज' के मुकाबले 'माचिस' का तेवर कहीं ज्यादा पॉलिटिकल था, फिर भी वो बिना बड़े विवाद के थिएटर्स में रिलीज हुई थी.

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'सतलुज' से लगी चिंगारी का 'माचिस' कनेक्शन! (Photo: ITGD) 'सतलुज' से लगी चिंगारी का 'माचिस' कनेक्शन! (Photo: ITGD)

सुबोध मिश्रा

  • नई दिल्ली ,
  • 08 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 5:00 PM IST

कई सालों से थिएटर्स में रिलीज की आस में अटकी दिलजीत दोसांझ की फिल्म पंजाब 95 हाल ही में सतलुज नाम से अचानक जी5 पर रिलीज हो गई, लेकिन बिना कटे-छंटे आई डायरेक्टर हनी त्रेहान की ये कहानी 48 घंटों के अंदर ओटीटी प्लेटफॉर्म से हट भी गई.

सतलुज का इस तरह आना और हट जाना बड़े विवाद की वजह बन चुका है. फिल्म के साथ जो कुछ हुआ उसके सही-गलत को लेकर सोशल मीडिया पर तगड़ी बहस छिड़ चुकी है. ये फिल्म पंजाब में उग्रवाद के दौर में पुलिस बर्बरता की कहानी है, मगर सतलुज इस टॉपिक पर बनी पहली बॉलीवुड फिल्म नहीं है.

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उग्रवाद से जूझ रहे पंजाब में पुलिस की हिंसा का मुद्दा 1996 में आई आइकॉनिक फिल्म माचिस भी उठा चुकी है. गुलजार के डायरेक्शन में बनी माचिस का तेवर सतलुज के मुकाबले कहीं ज्यादा पॉलिटिकल था. माचिस पर ऐसा बड़ा विवाद नहीं हुआ था, जबकि उसका उसी साल पंजाब के चुनावों पर भी असर पड़ा था और कमाल ये है कि माचिस अब भी ओटीटी पर अवेलेबल है.

कैसे एक ही मुद्दे के दो पहलू हैं 'सतलुज' और 'माचिस'

सतलुज की कहानी जसवंत सिंह खालड़ा की जिंदगी पर बेस्ड है. फिल्म दिखाती है कि 'आतंकवाद' के आरोप में पंजाब पुलिस बेगुनाह लोगों का भी फेक एनकाउंटर कर रही है और अपना सच छुपाने के लिए उनकी लाशों को 'लावारिस' बताकर, गैर-कानूनी तरीके से श्मशानों में उनका अंतिम संस्कार भी कर देती है.

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फिल्म में जसवंत का किरदार निभा रहे दिलजीत पुलिस के इस काले कारनामे का सच बाहर लाने और अपने 'गुमशुदा' परिजनों को तलाशते लोगों को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ते नजर आते हैं. असल जिंदगी की तरह, जसवंत की लड़ाई को सपोर्ट मिलते देखकर आखिरकार पुलिसवाले उन्हें भी घर के बाहर से उठा लेते हैं और उनकी हत्या कर देते हैं. कहानी का फोकस मोस्टली जसवंत की लड़ाई, उनके साथ पुलिस के बर्ताव और इस पूरे मामले की सीबीआई जांच और कोर्ट की सुनवाई पर है. जबकि माचिस ने पंजाब की इसी कहानी का एक दूसरा पहलू दिखाया था.

गुलजार की माचिस किरपाल उर्फ पाली (चंद्रचूड़ सिंह) की कहानी है, जिसके दोस्त जस्सी (राज ज़ुत्सी) को policeवाले उसके घर से उठा लेते हैं और बुरी तरह टॉर्चर करके छोड़ जाते हैं. अपने दोस्त को न बचा पाने से लाचार महसूस करता पाली, सनातन (ओम पुरी) से टकरा जाता है, जिसे फिल्म पहले ही उग्रवाद में शामिल दिखाती है.

सनातन की मदद से पाली उन दो में से एक पुलिस ऑफिसर की हत्या करने में कामयाब हो जाता है, जो उसके दोस्त के घर आए थे. अब पाली के पास वापसी का कोई रास्ता नहीं है और उसे एक मंत्री की हत्या प्लान कर रहे सनातन का साथ देना ही होगा. इस मिशन पर पाली को मिले बाकी साथी भी किसी न किसी तरह से पुलिस की हिंसा से पीड़ित हैं. आखिरकार पाली की मंगेतर और जस्सी की बहन वीरा (तब्बू) भी इसी मिशन का हिस्सा बन जाती है, क्योंकि पाली के कांड के बाद पुलिस ने जस्सी को ऐसा टॉर्चर किया कि उसने जेल में आत्महत्या कर ली. 

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सतलुज एक तरह से माचिस की कहानी को पूरा कर देती है. माचिस में गुलजार ने दिखाया था कि कैसे उग्रवाद को उखाड़ने में लगी पुलिस का भी उग्र रवैया, असल में और युवाओं को हथियार उठाने की तरफ धकेल देता है. सनातन बताता है कि वो अपने घरवालों को खोने की वजह से इस 'लड़ाई' में उतरा था. घरवालों को खोने पर उसका एक हार्ड-हिटिंग डायलॉग था— 'आधे 1947 ने खा लिए, बाकी आधे 1984 ने'.

जहां दिलजीत की फिल्म पॉलिटिक्स पर सवाल उठाकर नहीं, बल्कि इमोशंस के जरिए दर्शक को पंजाब का दर्द दिखाती है, वहीं माचिस में सनातन का मानना है कि हथियार उठा लेने वाले लोग गलत नहीं होते, सब इस 'सिस्टम' से पीड़ित होते हैं और अपने जैसे पीड़ितों को खोज लेते हैं. माचिस में सनातन, पाली, बाकी किरदारों की बातचीत और कहानियों से पंजाब पर होने वाली पॉलिटिक्स पर तीखे सवाल उठते हैं.

पॉलिटिक्स पर सवाल उठाने के बावजूद हुई रिलीज

सतलुज 2022 से ही CBFC (सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन) से सर्टिफिकेट मिलने के इंतजार में थिएटर्स तक पहुंचने की राह देखती रही. मेकर्स ने जी5 पर रिलीज कर भी दी, तो 48 घंटों में ही फिल्म हटा दी गई, लेकिन दिलचस्प ये है कि इससे एक दशक पहले, 25 अक्टूबर 1996 को माचिस की रिलीज के सामने ऐसी कोई अड़चन नहीं थी.

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रिपोर्ट्स ये जरूर बताती हैं कि उस समय भी कई नेताओं ने माचिस को बैन करने की मांग जरूर की थी, मगर फिल्म के साथ ऐसा कुछ हुआ नहीं था. जबकि माचिस की रिलीज के वक्त पंजाब और केंद्र, दोनों जगह कांग्रेस पार्टी की सरकारें थीं. वही कांग्रेस, जिसकी सरकारों के रहते ही पंजाब ने हिंसा का सबसे बुरा एक दशक देखा था, मगर इसके बावजूद सतलुज के मुकाबले माचिस की रिलीज काफी स्मूद रही थी. दिलचस्प ये भी है कि सतलुज ऐसे वक्त आई है जब पंजाब में अगले चुनाव की गहमागहमी जोर पकड़ रही है. इस साल के अंत तक या अगले साल की शुरुआत में वहां चुनाव हो सकते हैं. 

माचिस की रिलीज पर तो पॉलिटिक्स का असर नहीं हुआ, मगर फिल्म ने पंजाब की पॉलिटिक्स पर असर जरूर डाला था. एक पुरानी बातचीत में जर्नलिस्ट गजिन्दर कुमार ने आईएएनएस को बताया था कि माचिस ने पंजाब में उग्रवाद के पनपने की वजहों और पुलिस के हिंसात्मक रवैये को लेकर बहस छेड़ दी थी.

फिल्म आने के कुछ महीनों बाद ही, फरवरी 1997 में पंजाब चुनाव के नतीजों को लोग इस बहस से जोड़कर देखते हैं. चुनावों में कांग्रेस पार्टी की बुरी हार हुई थी और प्रकाश सिंह बादल की पार्टी शिरोमणि अकाली दल ने 117 में से 75 सीटें अपने नाम करके बड़ी जीत हासिल की थी.

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2 करोड़ के रिपोर्टेड बजट में बनी माचिस 6 करोड़ से ज्यादा ग्रॉस कलेक्शन के साथ बॉक्स ऑफिस पर भी कामयाब रही थी. इतना ही नहीं, इस फिल्म ने दो नेशनल अवार्ड भी जीते थे. अच्छी बात ये है कि सतलुज भले अब आपको ओटीटी पर न मिले, लेकिन माचिस अभी भी अमेजन प्राइम वीडियो पर देखी जा सकती है.

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