40 साल, दो विमान और 2 इंडियन! जान पर खेलकर यात्रियों को बचाने वाले भारतीयों की कहानी

एक तरफ कॉकपिट में घायल पड़ा पायलट, दूसरी तरफ हमलावर और तीसरी तरफ सैकड़ों यात्रियों से भरा विमान, जो तेजी से नीचे जा रहा था. ऐसे वक्त में स्मित ने हार नहीं मानी. उन्होंने हमलावर का सामना किया और कॉकपिट का दरवाजा खोलने में कामयाब रहे. इससे केबिन क्रू और यात्रियों को अंदर पहुंचकर हमलावर को काबू करने का मौका मिला.

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दो भारतीयों की दिलेरी. (Photo: ITG) दो भारतीयों की दिलेरी. (Photo: ITG)

आजतक एंटरटेनमेंट डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 01 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 5:21 PM IST

आसमान में उड़ते विमान में बैठे यात्री अपनी जिंदगी पायलट और क्रू के भरोसे छोड़ देते हैं. लेकिन कई बार सफर के दौरान ऐसे हालात बन जाते हैं, जहां पायलट को सिर्फ विमान नहीं, बल्कि उसमें बैठे हर शख्स की जान बचाने की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है. कल भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मछार के सामने भी ऐसा ही मुश्किल वक्त आया. दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट में उनके को-पायलट ने उन पर चाकू से हमला कर दिया. हमले में स्मित गंभीर रूप से घायल हो गए और इसी दौरान विमान अचानक नीचे जाने लगा. इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी, हमलावर का मुकाबला किया और विमान में सवार सभी 174 लोगों की जान बच गई. इस घटना ने करीब 40 साल पुरानी एक और कहानी याद दिला दी. तब भी एक भारतीय ने अपनी जान की परवाह किए बिना विमान में सवार लोगों की जिंदगी बचाने के लिए बहादुरी दिखाई थी.

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आज से तकरीबन 40 साल पहले भी एक भारतीय ने विमान में फंसी जिंदगियों को बचाने के लिए अपनी जान की परवाह नहीं की थी. नाम था नीरजा भनोट. पांच सितंबर 1986 को पैन एम फ्लाइट 73 कराची एयरपोर्ट पर खड़ी थी, जब चार हथियारबंद आतंकियों ने विमान को हाईजैक कर लिया. नीरजा उस फ्लाइट की सीनियर फ्लाइट अटेंडेंट थीं. करीब 17 घंटे चले इस खौफनाक घटना में उन्होंने यात्रियों को बचाने के लिए लगातार जोखिम उठाया. आखिरकार जब आतंकियों ने गोलीबारी शुरू की, नीरजा ने इमरजेंसी एग्जिट खोलकर यात्रियों को बाहर निकलने में मदद की और तीन बच्चों को गोलियों से बचाते हुए खुद अपनी जान गंवा दीं.

यानी 40 साल के फासले पर दो भारतीय, दो विमान और दो भयावह संकट. एक तरफ 2026 में कॉकपिट के भीतर चाकू से हमला झेलता भारतीय पायलट, दूसरी तरफ 1986 में आतंकियों के कब्जे वाले विमान में यात्रियों के बीच खड़ी भारतीय फ्लाइट अटेंडेंट. परिस्थितियां अलग थीं, खतरा अलग था और दोनों की भूमिकाएं भी अलग थीं, लेकिन एक चीज दोनों कहानियों को जोड़ती है, जब सैकड़ों जिंदगियों का सवाल आया, तो दोनों ने खुद को बचाने से पहले यात्रियों को बचाने के बारे में सोचा.

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30 सितंबर 2026 को फ्लाईदुबई की फ्लाइट FZ1073 दुबई से तेल अवीव के लिए रवाना हुई थी. विमान में 174 लोग सवार थे. सफर सामान्य था, लेकिन उड़ान के दौरान कॉकपिट में अचानक ऐसी स्थिति पैदा हुई, जिसने पूरे विमान को मौत के मुहाने पर ला खड़ा किया. रिपोर्टों के मुताबिक, ओमान के को-पायलट ने कैप्टन स्मित मछार पर चाकू से हमला किया. इसी दौरान विमान तेजी से नीचे जाने लगा और कुछ ही सेकंड में उसने करीब 14 हजार फीट नीचे चला गया.

एक तरफ कॉकपिट में घायल पड़ा पायलट, दूसरी तरफ हमलावर और तीसरी तरफ सैकड़ों यात्रियों से भरा विमान, जो तेजी से नीचे जा रहा था. ऐसे वक्त में स्मित ने हार नहीं मानी. उन्होंने हमलावर का सामना किया और कॉकपिट का दरवाजा खोलने में कामयाब रहे. इससे केबिन क्रू और यात्रियों को अंदर पहुंचकर हमलावर को काबू करने का मौका मिला. विमान में मौजूद अन्य प्रशिक्षित पायलटों ने इसके बाद विमान को संभालने में मदद की और फ्लाइट की सऊदी अरब के तबुक में इमरजेंसी लैंडिंग कराई गई.

1986 में नीरजा भनोट ने भी नहीं छोड़ा था यात्रियों का साथ

स्मित की कहानी सुनकर चार दशक पुरानी नीरजा भनोट की कहानी याद आना स्वाभाविक है. पांच सितंबर 1986 को पैन एम फ्लाइट 73 मुंबई से फ्रैंकफर्ट होते हुए न्यूयॉर्क जा रही थी. विमान कराची में रुका हुआ था, तभी अबू निदाल संगठन से जुड़े चार हथियारबंद आतंकियों ने उसे हाईजैक कर लिया. नीरजा भनोट उस विमान में सीनियर फ्लाइट असिस्टेंट थीं.

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नीरजा ने सबसे पहले कॉकपिट क्रू को खतरे की जानकारी दी. पायलट विमान से निकलने में सफल रहे और इस वजह से आतंकी विमान को उड़ाकर कहीं और ले जाने में असमर्थ हो गए. इसके बाद नीरजा और बाकी केबिन क्रू की जिम्मेदारी और भी बड़ी हो गई. विमान के भीतर मौजूद यात्रियों को संभालना और उनकी जान बचाना.

आतंकियों ने यात्रियों के पासपोर्ट इकट्ठा करने का आदेश दिया था. उनका मकसद अमेरिकी यात्रियों की पहचान करना था. नीरजा और उनके साथियों ने कई अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट छिपा दिए यानी खतरा सिर्फ सामने खड़े आतंकियों से नहीं था, बल्कि हर उस फैसले में था जो नीरजा उस वक्त ले रही थीं. एक गलत कदम यात्रियों की जान को और खतरे में डाल सकता था.

करीब 17 घंटे तक यह गतिरोध चलता रहा. आखिरकार आतंकियों ने यात्रियों पर गोलीबारी शुरू कर दी. इसी दौरान नीरजा ने इमरजेंसी एग्जिट खोलकर लोगों को बाहर निकलने में मदद की. वह चाहतीं तो खुद भी निकल सकती थीं, लेकिन यात्रियों को निकालने के दौरान वह पीछे रह गईं. पैन एम हिस्टोरिकल फाउंडेशन के मुताबिक, उन्होंने तीन बच्चों को गोलियों से बचाने के लिए खुद को उनके आगे कर दिया और अपनी जान गंवा दी.

नीरजा को उनकी बहादुरी के लिए मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया. 1987 में वह यह सम्मान पाने वाली सबसे कम उम्र की और पहली महिला बनीं. उनकी कहानी सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी साहस की मिसाल बनी. अमेरिकी न्याय विभाग ने 2006 में पैन एम फ्लाइट 73 के पूरे केबिन क्रू को स्पेशल करेज अवॉर्ड दिया था.

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