कौशल्या, जिनका त्याग राम के वनवास से भी बड़ा था

कौशल्या की कहानी आज के समय में और भी महत्वपूर्ण लगती है. हम अक्सर त्याग को महानता की कसौटी पर मापते हैं. राम ने राजपाट छोड़ा, इसलिए उनका त्याग दिखाई दिया. सीता ने महल छोड़ा और वन का रास्ता चुना, इसलिए उनका त्याग याद रहा. लेकिन कौशल्या के त्याग का क्या?

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कौशल्या के त्याग की कहानी. (Photo: AI) कौशल्या के त्याग की कहानी. (Photo: AI)

रितु तोमर

  • नई दिल्ली,
  • 10 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 8:20 AM IST

रामायण का नाम सुनते ही हमारी स्मृतियों में सबसे पहले राम, सीता, कैकेयी या मंथरा जैसे किरदार उभरते हैं. कैकेयी को उस रानी के रूप में याद किया जाता है, जिसके दो वरदानों ने अयोध्या की नियति बदल दी. मंथरा को उस फैसले के पीछे खड़ी सूत्रधार के तौर पर देखा जाता है. सीता को उस दैवीय स्त्री के रूप में, जिसने राजमहल की सुख-सुविधाओं को छोड़कर पति के साथ वन जाने का मार्ग चुना. लेकिन इन्हीं चर्चित किरदारों के बीच मां कौशल्या भी थीं, जिनकी पीड़ा सबसे अधिक थी पर उनकी व्यथा रामायण की विराट कथा में कहीं पीछे छूट गई.

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अयोध्या की ज्येष्ठ महारानी कौशल्या ने न कभी कोई वरदान मांगा, न सत्ता के लिए संघर्ष किया और न ही किसी षड्यंत्र का हिस्सा बनीं. उन्होंने इतिहास की दिशा बदलने वाला कोई फैसला भी नहीं लिया. फिर भी राम के वनवास की सबसे बड़ी कीमत चुकाने वालों में उनका नाम सबसे ऊपर रखा जा सकता है. जिस बेटे को उन्हें राजसिंहासन पर बैठे देखना था, उसी बेटे को अपनी आंखों के सामने वन की ओर जाते देखना पड़ा. राम ने 14 वर्षों का वनवास जंगल में बिताया लेकिन कौशल्या ने उन 14 वर्षों का वियोग अयोध्या में जिया.

कौशल्या की पीड़ा को समझने के लिए हमें उस सुबह की ओर लौटना होगा, जब अयोध्या राम के राज्याभिषेक की तैयारियों में डूबा हुआ था. जो मां अपने बेटे के राजतिलक की तैयारियों में व्यस्त थी. उसे एकाएक पता चला कि उनका वही बेटा राजमहल छोड़कर 14 वर्षों के लिए वनवास जाने वाला है. वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में कौशल्या राम के राज्याभिषेक के लिए मंगल-कर्म करती दिखाई देती हैं लेकिन जब राम उनके सामने वनवास का समाचार लेकर आते हैं, तो जैसे एक ही क्षण में उनका संसार उजड़ जाता है. जिस बेटे का राजतिलक होते देखना था, उसी बेटे को अब अपनी आंखों के सामने वन की ओर जाते देखना होगा. 

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राम के मुंह से वनवास की बात सुनते ही कौशल्या के सामने जैसे अयोध्या का सारा वैभव बेमानी हो जाता है. जिस बेटे को कुछ ही देर बाद राजमुकुट पहनना था, वही अब वन जाने वाला था. वाल्मीकि रामायण में कौशल्या इस आघात को अपने भीतर दबा नहीं पातीं. वह विलाप करती हैं, अपने दुख को खुलकर व्यक्त करती हैं. उनके सामने एक ओर दशरथ का वचन और रघुकुल की मर्यादा थी, तो दूसरी ओर वह ममता थी जो अपने बेटे को उस कष्टकारी रास्ते पर देखना नहीं चाहती थी. कौशल्या इसी दोराहे पर खड़ी थीं, एक तरफ धर्म था, दूसरी तरफ मां का हृदय और इस बार धर्म को स्वीकार करने की कीमत उन्हें अपने बेटे से बिछड़कर चुकानी थी.

लेकिन कौशल्या की महानता उनके दुख से नहीं, बल्कि उस दुख के बावजूद खुद को संभालने में दिखाई देती है. वह राम को रोकना चाहती हैं, लेकिन बावजूद इसके उसे आशीर्वाद देकर विदा करती हैं. राम के लिए वनवास पिता के वचन और धर्म की रक्षा का प्रश्न था लेकिन कौशल्या के लिए वही वनवास अपने सबसे प्रिय पुत्र को अपनी आंखों के सामने खो देने जैसा था. राम को जाना था, यह तय हो चुका था. कौशल्या के पास बस इतना अधिकार बचा था कि वह जाते हुए बेटे के सिर पर हाथ रख सकें और उसके लिए मंगल की कामना कर सकें.

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(Photo: AI)

राम के जाने के बाद कौशल्या का दुख और गहरा हो जाता है. वह केवल राम के वियोग में नहीं हैं, बल्कि दशरथ से सवाल भी करती है. उन्हें चिंता है कि राजमहल में पले राम, सीता और लक्ष्मण वन के कठोर जीवन को कैसे सहेंगे? 

राम के वन जाने के बाद दशरथ भी पुत्र वियोग सह नहीं पाते और प्राण त्याग देते हैं. लेकिन ऐसे समय में कौशल्या के व्यक्तित्व की एक और झलक मिलती है. दशरथ की मृत्यु और राम के वनवास के बीच परिवार भीतर से बिखर चुका था. राम वन जा चुके थे, दशरथ अब जीवित नहीं थे. भरत अपराधबोध से भरे हुए थे. ऐसे समय में कौशल्या के सामने अपने दुख में डूबे रहने का पूरा अधिकार था लेकिन भरत को लेकर उनका व्यवहार उनके व्यक्तित्व को अलग ऊंचाई देता है.

भरत जब अयोध्या लौटते हैं और राम के वनवास और पिता की मृत्यु का सच उन्हें पता चलता है तो वह टूट जाते हैं. वाल्मीकि रामायण के इस बेहद मार्मिक प्रसंग में शोक में डूबी कौशल्या भरत को स्नेह से गले लगा लेती हैं. वह अपनी पीड़ा को पीछे रख भरत से स्नेह करती हैं. कौशल्या की यही खूबी उन्हें सिर्फ राम की मां से इतर रामायण का एक बड़ा पात्र बनाती है. रामायण की कथा में उनका सबसे बड़ा योगदान शायद यही है कि वह सत्ता के केंद्र में होते हुए भी सत्ता की राजनीति का हिस्सा नहीं बनीं.

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राम के वन जाने के बाद रामायण की कथा आगे बढ़ती रहती है. राम वन में जाते हैं, ऋषियों से मिलते हैं, सीता का हरण होता है, सुग्रीव और हनुमान से मिलन होता है. लंका युद्ध होता है और राम की विजय भी होती है. कथा का हर बड़ा पड़ाव राम के साथ आगे बढ़ता है लेकिन अयोध्या में कौशल्या के हिस्से न कोई युद्ध आता है, न कोई रोमांच, न कोई विजय अभियान. उनके हिस्से आता है सिर्फ इंतजार.

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यही कौशल्या के त्याग का सबसे अनदेखा पहलू है. राम के पास वनवास के दौरान यात्रा थी, संघर्ष था, साथी थे और  विजय थी. कौशल्या के पास इंतजार था. राम के सामने हर दिन एक नई चुनौती थी, कौशल्या के सामने हर दिन का खालीपन था इसलिए शायद यह कहना ज्यादा सही होगा कि राम ने वनवास भोगा और कौशल्या ने राम के वनवास का वियोग.

तुलसीदास के रामचरितमानस में भी कौशल्या का चरित्र राम के प्रति गहरे वात्सल्य और भक्ति से जुड़ा दिखाई देता है. राम केवल अयोध्या के राजकुमार नहीं हैं बल्कि ईश्वर समतुल्य भी हैं. ऐसे में कौशल्या का मातृत्व असमंजस में फंसा है. 

दक्षिण भारतीय रामायण परंपराओं में भी कौशल्या के मातृत्व और राम-वियोग के अलग-अलग साहित्यिक रंग मिले हैं. कंबन की तमिल कंब रामायण रामकथा को अधिक काव्यात्मक और भावनात्मक विस्तार देती है. वहां भी कौशल्या का दुख केवल एक घटना का हिस्सा नहीं रह जाता, बल्कि मां और बेटे के संबंध की गहरी संवेदना बन जाता है. यही रामायण की खूबसूरती भी है कि कथा बदलती है, भाषा बदलती है लेकिन मां और बेटे के बीच का वह भाव बार-बार नए रूप में सामने आता है इसलिए कौशल्या को सिर्फ आदर्श मां कह देना उनके व्यक्तित्व को कमतर कर देना है. वह एक ऐसी स्त्री हैं जो दुखी है, शोकाकुल है, राम को वन जाने से रोकना चाहती हैं, लेकिन धर्म के सामने अपने मातृत्व को पीछे कर देती हैं. वह दशरथ से आहत होती हैं, लेकिन उनका दुख पूरे परिवार के खिलाफ प्रतिशोध में नहीं बदलता और जब भरत उनके सामने आते हैं, तो वह अपने दुख से ऊपर उठकर उसे भी स्नेह देती हैं.

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शायद यही वजह है कि कौशल्या की कहानी आज के समय में और भी महत्वपूर्ण लगती है. हम अक्सर त्याग को महानता की कसौटी पर मापते हैं. राम ने राजपाट छोड़ा, इसलिए उनका त्याग दिखाई दिया. सीता ने महल छोड़ा और वन का रास्ता चुना, इसलिए उनका त्याग याद रहा. लेकिन कौशल्या के त्याग का क्या? उन्होंने अपने बेटे को अपनी आंखों के सामने वन जाते देखा और फिर उसकी प्रतीक्षा में जीवन के सबसे कठिन वर्ष गुजारे.

कौशल्या का त्याग राम के त्याग जितना ही गहरा था. पर उससे भी बड़ा था और शायद रामायण की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस मां के गर्भ से राम का जन्म हुआ, जिनकी गोद में खेलते हुए वह बड़े हुए और जिनका आशीर्वाद लेकर वन गए, उसी मां की कहानी राम की विराट कथा की पृष्ठभूमि में धीरे-धीरे पीछे चली गई. 

इतिहास में कैकेयी का नाम उनके एक फैसले की वजह से चर्चाएं बटोर ले गया लेकिन कौशल्या का नाम उनके धैर्य के कारण याद किया जाना चाहिए था. कौशल्या ने कोई युद्ध नहीं लड़ा. उन्होंने कोई राजनीतिक चाल नहीं चली. उन्होंने सिंहासन के लिए संघर्ष नहीं किया. उन्होंने अपने दुख को इतिहास बदलने का हथियार नहीं बनाया पर उन्होंने उस दुख को सहा, जिसने एक मां की पूरी दुनिया बदल दी इसलिए कौशल्या को केवल राम की मां कहकर आगे बढ़ जाना शायद रामायण के एक बहुत बड़े मानवीय पक्ष को खो देना है.

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आधुनिक नारीवादी चिंतक कौशल्या के त्याग को लेकर अधिक मुखर हैं. लेखिका अमी गणात्रा का मानना है कि इतिहास ने कौशल्या और कैकेयी को अच्छी रानी और बुरी नायिका के बीच में बांट दिया है. नई पीढ़ी इन दोनों किरदारों को इसी टैग के साथ देखने में सहज हैं जबकि दोनों का अपने-अपने हिसाब से अधिक मानवीय पहलू रहा है. 

रामायण हमें राम का वनवास याद दिलाती है, सीता की अग्निपरीक्षा याद दिलाती है लेकिन कौशल्या हमें उस त्याग की याद दिलाती हैं, जिसका कोई वन नहीं था, कोई युद्ध नहीं था और कोई विजय दिवस नहीं था. उनका वनवास अयोध्या में था और उनकी लड़ाई अपने ही हृदय के भीतर थी.

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