रणबीर कपूर की 'रामायण' रिलीज होने में औने-पौने दिन ही बचे हैं. पांच नवंबर को सिनेमाघरों में दस्तक देने जा रही इस फिल्म को लेकर जितनी चर्चा इसके भव्य सेट, भारी-भरकम स्टारकास्ट और विजुअल्स की है, उतनी ही चर्चा इसके म्यूजिक की भी है. लेकिन इस बार चर्चा की वजह सिर्फ संगीतकार एआर रहमान का नाम या उनकी धुनों का जादू नहीं है. ऑस्कर जीत चुके इस संगीतकार को अपनी ही नई रचनाओं के लिए आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है. फिल्म के गाने एक-एक कर सामने आ रहे हैं और उनके साथ संगीत की मौलिकता और क्रिएटिव एक्सपेरिमेंट्स पर भी बहस तेज हो रही है. कहीं भक्ति प्रसंग में सूफियाना रंग सुनाई देने की शिकायत है, कहीं कव्वाली जैसी धुन पर सवाल उठ रहे हैं, तो कहीं रहमान पर अपने ही पुराने म्यूजिक की धुनें दोहराने के आरोप लग रहे हैं.
यह विवाद केवल किसी गाने के अच्छे या बुरे होने भर तक सीमित नहीं है. इसके केंद्र में एक बड़ा सवाल है. क्या रहमान 'रामायण' जैसे महाकाव्य के लिए ऐसा संगीत रच पा रहे हैं, जो कहानी की सांस्कृतिक संवेदना से जुड़ने के साथ-साथ उनकी अपनी रचनात्मक पहचान को भी नए स्तर पर ले जाए? आखिर जिस संगीतकार ने 'रोजा', 'दिल से', 'रॉकस्टार' और 'स्लमडॉग मिलियनेयर' जैसी फिल्मों के जरिए अलग-अलग तरह के संगीत संसार रचे हैं, उससे अपेक्षाएं भी साधारण नहीं हैं. ऐसे में 'रामायण' का संगीत उनके लिए सिर्फ एक बड़ी फिल्म का हिस्सा नहीं, बल्कि उनकी रचनात्मकता की अग्निपरीक्षा भी बन गया है.
25 अक्टूबर को 'रामायण' का गाना 'मंगल रंग' रिलीज हुआ. राम-सीता के स्वयंवर, विवाह और सीता के अयोध्या आगमन से जुड़े प्रसंगों को समेटे इस गीत से उम्मीद थी कि एआर रहमान का संगीत इन पलों की भव्यता के साथ उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक संवेदना को भी सुरों में पिरोएगा. लेकिन गाना सामने आते ही इसकी धुन बहस का विषय बन गई. सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे कि राम-सीता के विवाह जैसे पवित्र प्रसंग के लिए रचे गए गीत में भक्ति संगीत की पारंपरिक रंगत के बजाय सूफियाना सुरों और कव्वाली जैसी शैली का असर ज्यादा क्यों सुनाई दे रहा है?
'रॉकस्टार' के 'कुन फाया कुन' से लेकर तमिल फिल्म 'कंडुकोंडैन कंडुकोंडैन' के गाने तक रहमान के पुराने संगीत को भी अब इस बहस में खींचा जा रहा है. सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इसकी तुलना रहमान की ही फिल्म 'रॉकस्टार' के चर्चित गाने 'कुन फाया कुन' से शुरू कर दी. यह गाना अपनी सूफियाना रंगत के लिए जाना जाता है. आलोचकों ने इसे रहमान के पुराने सफल संगीत फॉर्मूले को दोबारा भुनाने की कोशिश बताया.
यानी मामला सिर्फ 'मंगल रंग' के पसंद आने या नहीं आने का नहीं है. सवाल उस संगीतकार की रचनात्मकता पर उठ रहे हैं, जिसने अपने संगीत से अलग पहचान बनाई और हर बार कुछ नया सुनाने की उम्मीद जगाई. अब उसी रहमान से पूछा जा रहा है कि 'रामायण' जैसे महाकाव्य के लिए उनके संगीत में कोई नई धुन है या फिर उनकी पुरानी कामयाब धुनों की परछाईं ही इसमें सुनाई दे रही है? आरोप ये भी लगाया जा रहा है कि जिस संगीतकार ने अपने करियर में इतनी अलग-अलग और यादगार धुनें दी हैं, वह रामायण जैसी बड़ी फिल्म के लिए एक बिल्कुल नई संगीत पहचान क्यों नहीं बना पा रहा?
यह आरोप रहमान की प्रतिष्ठा के लिहाज से खासा अहम है. वजह यह है कि ‘कुन फाया कुन’ केवल एक लोकप्रिय गाना नहीं, बल्कि उनके संगीत करियर की पहचान बनने वाली रचनाओं में शामिल है. ऐसे में जब उनकी नई रचना की तुलना उसी पुराने गाने से की जाती है, तो बहस केवल समानता तक सीमित नहीं रहती. यह सवाल भी खड़ा होता है कि क्या कोई संगीतकार अपनी स्थापित शैली से बाहर निकलकर हर नई कहानी के लिए नया संगीत संसार रच पा रहा है?
एक चर्चित तमिल फिल्म है ‘कंडुकोंडैन कंडुकोंडैन’ जिसके गाने ‘एन्ना सोल्ला पोगिराई’ से भी 'मंगल रंग' की काफी तुलना हो रही है. सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिसमें दोनों गानों की तुलना की जा रही है. कमाल की बात है कि इस तमिल गाने को भी ए आर रहमान ने ही कंपोज किया था. सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ने दोनों गानों की धुन और संगीत कॉर्डिनेशन की तुलना करते हुए आरोप लगाया कि ‘मंगल रंग’ में रहमान के पुराने तमिल गाने की झलक सुनाई देती है. इस तरह विवाद और गहराया. अब सवाल सिर्फ यह नहीं रहा कि रामायण के गाने में सूफियाना या कव्वाली जैसा प्रभाव क्यों है, बल्कि यह भी पूछा जाने लगा कि क्या रहमान अपने ही पुराने संगीत को नए रूप में पेश कर रहे हैं?
रामायण का गीत 'मंगल रंग' पहला मौका नहीं है जब 'रामायण' के म्यूजिक पर सवाल उठे हैं. इससे पहले रामायण में रावण के किरदार पर फिल्माए गए 'रावण तांडव' के म्यूजिक की भी आलोचना हुई थी. तांडव जैसी पावरफुल नृत्य शैली के म्यूजिक को लेकर दर्शकों की जो उम्मीदें थीं. शायद रहमान उस पर भी खरे नहीं उतरे तभी तो इस गाने के रिलीज होते ही लोगों ने अपनी निराशा जाहिर करनी शुरू कर दी.
जब इस पर आलोचना बढ़ी तो रहमान ने संगीत तैयार करने की प्रक्रिया और सोशल मीडिया पर होने वाली आलोचना को लेकर अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि किसी म्यूजिक को तैयार करने में काफी मेहनत लगती है. विचार के स्तर पर काफी दिमागी कसरत होती है. इतनी लंबी प्रक्रिया से गुजरने के बाद जब लोगों की इस तरह की प्रतिक्रियाएं मिलती हैं तो उस पर सफाई देने की एनर्जी नहीं बचती.
रहमान ने दो टूक कहा कि उन्होंने अपना काम बेहद ईमानदारी से किया है और उम्मीद करते हैं कि लोग बिना किसी पूर्वाग्रह के उनके संगीत को पसंद करें. रहमान ने यह भी कहा कि वह अपनी पुरानी फिल्मों की सफलताओं 'रॉकस्टार' या 'स्लमडॉग मिलियनेयर' के फॉर्मूले पर हमेशा टिके नहीं रह सकते. एक कलाकार के लिए आगे बढ़ना और नए प्रयोग करना जरूरी है.
इसमें कोई दोराय नहीं है कि ए आर रहमान का भारतीय संगीत में जो कद है, वह केवल उनकी लोकप्रिय धुनों की वजह से नहीं बना. उन्होंने शास्त्रीय, लोक संगीत, पश्चिमी ऑर्केस्ट्रेशन से लेकर सूफियाना गायकी सहित कई प्रभावों को मिलाकर अपनी अलग पहचान बनाई है. यही एक्सपेरिमेंट उनकी सबसे बड़ी ताकत भी है. लेकिन जब उनकी यही शैली रामायण जैसे महाकाव्य में इस्तेमाल होती है, तो अपेक्षाएं बदल जाती हैं. दर्शक केवल एक अच्छा गाना नहीं सुनना चाहते, वे चाहते हैं कि म्यूजिक राम, सीता और रावण जैसे पात्रों के स्वभाव और कहानी के सांस्कृतिक संसार से भी मेल खाए.
रहमान पर उठ रही उंगलियों की एक ओर वजह उनसे मौलिकता की अपेक्षा है. उनसे मौलिकता की अपेक्षा इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि उनका अपना संगीत इतिहास बेहद समृद्ध रहा है. 'कुन फाया कुन' जैसे गाने उनके लिए मानक बन चुके हैं. ऐसे में जब नई रचना की तुलना उन्हीं के पुराने संगीत से होने लगती है, तो सवाल सिर्फ एक गाने पर नहीं, उनकी रचनात्मक दिशा पर भी उठने लगते हैं. उन्हें हमेशा जज किया जाने लगता है कि क्या वह अपनी पुरानी शैली को दोहरा रहे हैं या किसी नई कहानी के लिए उसे नया अर्थ दे रहे हैं? फिलहाल 'रामायण' के म्यूजिक को लेकर हो रही बहस रहमान के लिए एक बड़ी अग्निपरीक्षा बनती दिख रही है, जिसे पार करना उनके लिए जरूरी बन गया है.
आलोचना की आंच में कुमार विश्वास भी तप रहे...
आलोचना की आंच सिर्फ रहमान तक सीमित नहीं है. कुमार विश्वास भी इसकी तपिश का सामना कर रहे हैं. ‘रामायण’ के गानों को लेकर गीतकार कुमार विश्वास की भी आलोचना हो रही है. पहले ‘रावण तांडव’ के बोलों को लेकर सवाल उठे और अब ‘मंगल रंग’ को लेकर भी बहस छिड़ गई है. सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने ‘रावण तांडव’ की तुलना फिल्म ‘आदिपुरुष’ के शिव तांडव से की. सोशल मीडिया पर यूजर्स का कहना था कि रावण की शिवभक्ति पर आधारित इस गीत में वह भव्यता नजर नहीं आई, जो आनी चाहिए थी. कुछ यूजर्स ने कुमार विश्वास के लिखे बोलों को भी साधारण बताया. लोगों का यह भी कहना है कि उनका कुमार विश्वास पर विश्वास था लेकिन अब वह विश्वास डगमगाने लगा है.
वहीं, फिल्म के दूसरे गाने ‘मंगल रंग’ के बोल भी कुमार विश्वास ने लिखे हैं. अरिजीत सिंह और श्रेया घोषाल की आवाज में सजे इस गाने में भगवान राम और माता सीता के प्रेम और विवाह से जुड़े प्रसंग दिखाए गए हैं. गाना रिलीज होने के बाद कुछ लोगों ने इसके बोलों और भावों पर सवाल उठाए. हालांकि, सबसे ज्यादा चर्चा इसके संगीत को लेकर हुई, जिसे कुछ लोगों ने कव्वाली और सूफी शैली से प्रभावित बताया.
इस बीच ‘मंगल रंग’ को लेकर विवाद के बीच कुमार विश्वास का एक वीडियो सामने आया है. इसमें उन्होंने कहा, भगवान ने मुझसे जिन शब्दों का प्रयोग करवाया है, उसके लिए भगवान के प्रति आभार. उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले समय में यह गाना विवाह समारोहों में इस्तेमाल होगा.
रितु तोमर