Verity Review: किताब पढ़ने और उसकी फिल्म देखने में फर्क होता है. किताब में लेखक की कल्पनाओं के साथ आप अपनी कल्पनाओं के घोड़े भी दौड़ा सकते हैं, लेकिन फिल्म में निर्देशक आपको वही दिखाता है, जो उसकी नजरों ने देखा. कोलीन हूवर के मशहूर नॉवेल ‘वेरिटी’ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है. निर्देशक माइकल शोवाल्टर ने एक ऐसी कहानी को पर्दे पर उतारा है, जिसमें रहस्य, जुनून, धोखा और रिश्तों की उलझनें भरपूर हैं. मगर अफसोस, इन सबको मिलाकर जो थ्रिलर बननी चाहिए थी, वह कई जगह बी-ग्रेड सस्पेंस ड्रामा जैसी लगती है. डकोटा जॉनसन और ऐनी हैथवे की मौजूदगी के बावजूद फिल्म का जादू नहीं चलता.
खून, रहस्य और एक खौफनाक घर!
कहानी है लोवेन एशले (डकोटा जॉनसन) की, जो एक स्ट्रगलिंग राइटर है. एक दिन सड़क पर हुए हादसे में उसके चेहरे पर खून के छींटे पड़ जाते हैं. इसी दौरान उसकी मुलाकात जेरेमी क्रॉफर्ड (जोश हार्टनेट) से होती है, जो उसे अपनी शर्ट देकर मदद करता है. बाद में पता चलता है कि जेरेमी मशहूर लेखिका वेरिटी क्रॉफर्ड (ऐनी हैथवे) का पति है. एक हादसे के बाद वेरिटी कोमा में है और जेरेमी चाहता है कि लोवेन उसकी अधूरी किताब पूरी करे.
लोवेन जब उनके आलीशान घर में रहने पहुंचती है, तो उसे वेरिटी की एक अधूरी आत्मकथा मिलती है. इसमें जेरेमी के साथ उसके जुनूनी रिश्ते और अपने जुड़वां बच्चों के प्रति नफरत से जुड़े ऐसे राज खुलते हैं, जो कहानी को अंधेरे और खतरनाक मोड़ पर ले जाते हैं. अब सवाल है कि वेरिटी की लिखी बातें सच हैं, किसी बीमार दिमाग की कल्पना या फिर किसी बड़े खेल का हिस्सा?
सस्पेंस के नाम पर डराने की कोशिश
फिल्म की शुरुआत में माहौल बनाने की अच्छी कोशिश दिखती है. बैकग्राउंड म्यूजिक, अचानक होने वाली एडिटिंग और डरावने विजुअल्स से निर्देशक आपको मनोवैज्ञानिक थ्रिलर का एहसास कराना चाहते हैं. लेकिन यह कोशिश इतनी जोर-जबरदस्ती वाली है कि डर से ज्यादा बनावटीपन महसूस होता है.
कहानी में रहस्य तो है, लेकिन किरदारों की मनोदशा और उनके रिश्तों की गहराई गायब है. कई अहम घटनाओं को समझाने के लिए वॉइसओवर का सहारा लिया गया है. नतीजा यह कि दर्शक किरदारों को महसूस करने के बजाय उनकी कहानी सुनता रह जाता है. फिल्म जिस मनोवैज्ञानिक तनाव पर टिकी है, वही पर्दे पर ठीक से बन नहीं पाता.
बोल्डनेस है, लेकिन कहानी कहां है?
‘वेरिटी’ को एक डार्क, ट्विस्टेड और इरोटिक थ्रिलर के तौर पर पेश किया गया है. मगर फिल्म में बोल्डनेस कई बार कहानी से ज्यादा जरूरी लगने लगती है. लोवेन का बार-बार नहाना, कपड़े बदलना और खाने के दौरान कैमरे का जरूरत से ज्यादा ठहरना आपको रोमांचित करने के बजाय कहानी से भटका सकता है.
जेरेमी और लोवेन के बीच पनपता रोमांस भी कई जगह अटपटा लगता है. कभी होंठों पर पुडिंग लगे होने जैसी छोटी बात को रोमांस का आधार बना दिया जाता है, तो कभी गंभीर दृश्यों में ऐसी नाटकीयता आ जाती है कि हंसी छूट जाती है. वेरिटी का व्हीलचेयर पर होना भी कुछ दृश्यों में अनजाने हास्य की वजह बन जाता है.
डकोटा-ऐनी की केमिस्ट्री भी नहीं बचा पाई फिल्म
डकोटा जॉनसन अपने किरदार में जरूरी बेचैनी और असुरक्षा पैदा करने के लिए संघर्ष करती दिखती हैं. उनकी भावहीन-सी स्क्रीन प्रेजेंस को फिल्म का हिस्सा माना जा सकता है, लेकिन कई जगह यह किरदार की उलझन के बजाय अभिनय की कमी जैसी लगती है. ऐनी हैथवे से एक रहस्यमयी और प्रभावशाली मौजूदगी की उम्मीद थी, मगर उनका किरदार भी पूरी तरह उभर नहीं पाता. जोश हार्टनेट भी फिल्म को वह मजबूती नहीं दे पाते, जिसकी जरूरत है.
फिल्म का सबसे बड़ा दांव इसका क्लाइमैक्स और आखिरी ट्विस्ट है. यहां कहानी कुछ देर के लिए दर्शक को उलझाने में सफल जरूर होती है, लेकिन तब तक बहुत कुछ ऐसा हो चुका होता है, जिससे फिल्म का असर कमजोर पड़ जाता है. अंत में सच और झूठ के बीच की धुंध तो बनी रहती है, मगर मन में यही सवाल उठता है कि इतनी लंबी कवायद का नतीजा बस इतना ही था?
‘वेरिटी’ एक ऐसी फिल्म है, जिसके पास दिलचस्प कहानी, दमदार कलाकार और सस्पेंस पैदा करने का पूरा मौका था. लेकिन कमजोर पटकथा, बनावटी रोमांस और जरूरत से ज्यादा सनसनीखेज ट्रीटमेंट ने इसका खेल बिगाड़ दिया. किताब के प्रशंसकों को भी किरदारों की गहराई और कहानी की बारीकियों की कमी खल सकती है.
अगर आप डकोटा जॉनसन और ऐनी हैथवे की वजह से फिल्म देखने जा रहे हैं, तो उम्मीदें थोड़ी कम रखिए. और अगर आपको ऐसा सस्पेंस चाहिए जो आखिरी मिनट तक दिमाग घुमाए, तो शायद विजय सलगांवकर की ‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ से बेहतर जवाब मिलने की उम्मीद कर सकते हैं. फिलहाल ‘वेरिटी’ का सच यही है कि इसका रहस्य जितना दिलचस्प है, उसे पर्दे पर कहने का तरीका उतना ही निराश करता है.
आजतक एंटरटेनमेंट डेस्क