दूसरे धर्म से हैं आदिल हुसैन, भगवान शिव-कृष्ण में आस्था, पढ़ी गीता

अभिनेता आदिल हुसैन ने भगवद्गीता, कर्म, आत्मा और जीवन के उद्देश्य पर खुलकर चर्चा की. उन्होंने बताया कि गीता ने उनके जीवन को देखने का नजरिया बदला है और इसे केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि आत्मा को समझने का माध्यम माना.

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धर्मों पर एक्टर का अलग विचार (Photo: Social Media) धर्मों पर एक्टर का अलग विचार (Photo: Social Media)

आजतक एंटरटेनमेंट डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 13 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 10:40 AM IST

फिल्मों में अपने गंभीर और प्रभावशाली अभिनय के लिए पहचाने जाने वाले अभिनेता आदिल हुसैन इन दिनों अपने आध्यात्मिक विचारों को लेकर चर्चा में हैं. पारस छाबड़ा के पॉडकास्ट ‘अबरा का डबरा शो’ में आदिल हुसैन ने भगवत गीता, कर्म, आत्मा, पुनर्जन्म और जीवन के उद्देश्य जैसे विषयों पर खुलकर बातचीत की. इस दौरान उन्होंने बताया कि वो गीता पढ़ते हैं और इस ग्रंथ ने जीवन को देखने का उनका नजरिया काफी हद तक बदला है.

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आदिल के लिए गीता केवल धार्मिक किताब नहीं है, बल्कि इंसान को खुद को समझने और अपने कर्मों पर विचार करने का अवसर देने वाली रचना है. बातचीत में उन्होंने कर्म और उसके प्रभाव से जुड़े विचार शेयर किए. एक्टर का मानना है कि इंसान को अपने हर काम के पीछे छिपी भावना और उद्देश्य को समझना चाहिए. केवल कोई काम कर लेना ही काफी नहीं है, बल्कि ये देखना भी जरूरी है कि वो काम किस मानसिकता से किया जा रहा है.

गीता पर बोले आदिल 
हिंदू ग्रंथ पढ़ने पर आदिल ने कहा कि मुझे समझ नहीं आता कि मुझे क्यों नहीं पढ़ना चाहिए. ये भारत देश है. मैं यहां का निवासी हूं. भारतवर्ष में रहकर मुझे जो ज्ञान का भंडार है. उनको अगर हम नहीं जानते फिर इस देश में पैदा होने का कोई मतलब नहीं है. मैं खुश किस्मत हूं कि मैं इस दुनिया का हिस्सा हूं. मुझे सूफी के बारे में दादा ने बताया था. उन्होंने कभी किसी धर्म के बीच फर्क नहीं किया. उन्होंने अधिकतर वक्त नॉन मुस्लिम लोगों के बीच बिताया. उन्होंने कहा कि ये तुम्हारी जिंदगी है. तुम्हें जो करना है करो. ये आपका पाथ है, आपको कैसे चलना आप फैसला करो. 

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आदिल ने कहा कि राम कृष्णन ने बहुत अच्छी बात कही है, जितना मत, उतना पथ. हर इंसान का पथ अलग-अलग है. कृष्ण को मैंने गीता में पढ़ा, तो मैं उनका भी भक्त हूं. और राम- शिव जी के बारे में भी पढ़ा. रूमी के बारे में भी पढ़ा. अगर  धार्मिक दृष्टिकोण से देखें, तो उसमें फर्क ही नहीं है. छोटी सोच वाले लोग फर्क करते हैं. मुस्लिम तो 1400AD में आए. उससे पहले दुनिया में तरह-तरह के लोग थे. कंस मुस्लिम तो नहीं था. रावण मुस्लिम नहीं था. विलेन हमेशा ही रहेंगे. 

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