इम्तियाज अली की फिल्म मैं वापस आऊंगा एक ऐसी कहानी लिख रही है, जो बॉलीवुड ने एक लंबे अरसे से नहीं देखी. फिल्मों का असर, उनकी कहानी या जनता से मिलने वाला प्यार सब अपनी जगह है. मगर मैं वापस आऊंगा बॉक्स ऑफिस बिजनेस के गेम का नियम बदल रही है. खासकर बॉलीवुड में लंबे समय से किसी फिल्म ने इस तरह का क्रेज नहीं देखा.
किसी फिल्म ने देखा भी हो, मगर बिना रेगुलर फिल्मी मसालों, पॉलिटिक्स या विवादित मुद्दों के बिना आई किसी लव स्टोरी ने तो ऐसा कमाल नहीं ही किया. जहां पहले वीकेंड यानी शुक्रवार-शनिवार-रविवार के तीन दिनों में फिल्मों का भविष्य तय हो जाता है, वहीं मैं वापस आऊंगा ने यह खेल पूरा पलट दिया है. पहले वीकेंड के बाद ट्रेड पंडित इसे फ्लॉप घोषित करने ही वाले थे, लेकिन दूसरे हफ्ते में यह फिल्म सरप्राइज हिट बनने की तरफ बढ़ रही है.
70 करोड़ रुपये के रिपोर्टेड बजट में बनी फिल्म अगर पहले वीकेंड में 5.5 करोड़ रुपये नेट कलेक्शन करे, तो बिजनेस की समझ रखने वाला कोई भी शख्स फिल्म को फ्लॉप कहने के लिए बेचैन रहेगा ही. लेकिन कुछ कहानियां, कुछ फिल्में और उनकी दर्शकों में पैठ किसी लॉजिक से नहीं बल्कि सिनेमा के मैजिक से बनती है. और मैं वापस आऊंगा के मैजिक ने पहले वीकेंड के बाद धीरे-धीरे असर दिखाना शुरू किया.
पहले हफ्ते में फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 12.25 करोड़ रुपये का नेट कलेक्शन किया था. लेकिन मैं वापस आऊंगा के इमोशन और इम्तियाज की स्टोरीटेलिंग ने जैसे पहले हफ्ते में जनता पर कोई जादू सा कर दिया. दिलजीत दोसांझ, नसीरुद्दीन शाह, वेदांग रैना और शरवरी की परफॉर्मेंस ने उस जादू को और अद्भुत बना दिया और फिर हुआ वह 'कमाल' जिसने ट्रेड पंडितों को हैरान कर दिया है. लेकिन इस हैरानी से ज्यादा असल में मैं वापस आऊंगा की कामयाबी बॉलीवुड के लिए एक बहुत बड़ी उम्मीद है. वह उम्मीद जो लॉकडाउन के बाद से लगातार खोने लगी थी.
锁定डाउन के बाद से बॉलीवुड इंडस्ट्री के लिए यह बात चिंता का मुद्दा रही है कि साल की सबसे बड़ी, चर्चित फिल्मों के अलावा बाकी फिल्मों को भरपूर दर्शक नहीं मिल रहे. इतने भी नहीं कि दोबारा कोई प्रोड्यूसर ऐसी फिल्में बनाने के बारे में सोचे. इसका सबसे ज्यादा नुकसान उन फिल्मों को होता है जो बिना किसी बड़े स्टार, बिना पॉपुलर मसालों के, लिमिटेड बजट में एक दमदार कहानी कहने निकलती हैं.
रीमा कागती की सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव, नीरज घेवान की होमबाउंड तो कुछ ऐसी फिल्में हैं ही. ताबड़तोड़ एक्शन वाली बेहद रियलिस्टिक फिल्म किल (2024) का फ्लॉप होना भी इसी समस्या का हिस्सा है. इन फिल्मों को ओटीटी पर आने के बाद जनता से बहुत प्यार मिला. तमाम लोगों ने कहा कि यह बड़े पर्दे पर देखनी चाहिए थी, लेकिन अफसोस की बात यह है कि जब तक ये फिल्में थिएटर्स में थीं, लोग देखने ही नहीं गए.
लॉकडाउन के बाद क्रिटिक्स के रिव्यूज के मुकाबले, जनता के वर्ड ऑफ माउथ की वैल्यू कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हुई है. मैं वापस आऊंगा इसी बात का सबूत है. फिल्म क्रिटिक्स ने इस फिल्म के सिर्फ पॉजिटिव रिव्यूज ही नहीं दिए बल्कि इसके बारे में लगातार लिखा भी. लेकिन फिल्म का भला तभी हुआ जब शुक्रवार से फिल्म देख चुके रियल दर्शकों की तारीफें सोशल मीडिया पर पहुंचीं.
इन तारीफों ने मैं वापस आऊंगा के खिलाफ सोशल मीडिया पर नेगेटिविटी फैलाते ट्रोल्स को भी ठंडा कर दिया. रियल दर्शकों ने ट्रोल्स के इस आरोप का भी जवाब दे दिया कि फिल्म 'एंटी-धुरंधर' है या 'पाकिस्तान के प्रति नर्म' है. इन रियल दर्शकों ने ही फिल्म देखे बिना ही, किसी के पोस्ट से कहानी जज करने वाले लोगों को भी करारा जवाब दिया.
ये तारीफें सिनेमा के इस बदलते दौर में एक बहुत बड़ी उम्मीद हैं. फाइनली जनता ने दिखाया है कि वे धमाकेदार एंटरटेनमेंट फिल्मों के दौर में, एक इमोशनल ड्रामा भी देख सकते हैं. हिंसा, नफरत और विवादों की खाद पर उगी फिल्मों के दौर में एक शांत, सुंदर फिल्म के लिए भी जगह है.
अगर पाकिस्तान को घर में घुसकर मारने वाली कहानियों के लिए बॉक्स ऑफिस पर जगह है, तो उस नफरती मुल्क के बनने में अपना घर कुर्बान कर चुके लोगों के दर्द के लिए भी जगह है. और अगर एक धुरंधर के लिए लोग थिएटर्स में भीड़ जुटा सकते हैं, तो एक मैं वापस आऊंगा का टिकट भी खरीद सकते हैं. यह भारतीय और हिंदी सिनेमा में क्रिएटिव रिस्क लेने वाले फिल्ममेकर्स के लिए एक बहुत बड़ी उम्मीद है.
मैं वापस आऊंगा की बॉक्स ऑफिस सक्सेस यही उम्मीद लेकर आई है. इसीलिए इस फिल्म का नाम इन दिनों हर जुबान पर है. जिसने मैं वापस आऊंगा देखी है, वह इसके जादू से बाहर नहीं निकल पा रहा. जिसने नहीं देखी है, वह जल्द ही देख लेना चाहता है. इम्तियाज अली की मैं वापस आऊंगा का यह जादू अभी बॉक्स ऑफिस पर और लंबा चलने वाला है.
सुबोध मिश्रा