फातिमा मुस्लिम लीग की पहली मुस्लिम महिला MLA बनीं, लेफ्ट का किला ध्वस्त

मुस्लिम लीग के 75 साल के इतिहास में नया कीर्तिमान रचते हुए एडवोकेट फातिमा तिलहिया पार्टी की पहली महिला विधायक बनकर उभरी हैं. उन्होंने कोझिकोड की पेराम्ब्रा सीट पर सीपीआई(एम) के दिग्गज नेता टी.पी. रामकृष्णन को हराकर वामपंथ के उस 'अभय दुर्ग' को ढहा दिया है.

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फातिमा तिलहिया ने वामपंथ के गढ़ में की सेंधमारी (Photo-Facebook/Fatima) फातिमा तिलहिया ने वामपंथ के गढ़ में की सेंधमारी (Photo-Facebook/Fatima)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 04 मई 2026,
  • अपडेटेड 8:54 PM IST

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है. पार्टी की युवा और फायरब्रांड नेता एडवोकेट फातिमा तिलहिया ने केरल विधानसभा चुनाव में एक ऐसी जीत दर्ज की है, जिसने न केवल रूढ़ियों को तोड़ा है, बल्कि राज्य के राजनीतिक समीकरणों को भी हिलाकर रख दिया है.

कोझिकोड जिले की पेराम्ब्रा विधानसभा सीट से फातिमा ने जीत हासिल कर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की पहली महिला विधायक बनने का गौरव हासिल किया है. उनकी यह जीत इसलिए भी खास है, क्योंकि उन्होंने वामपंथ के एक उस मजबूत किले को ध्वस्त कर दिया है, जहां पिछले चार दशकों से किसी भी विपक्षी दल के लिए सेंध लगाना नामुमकिन माना जाता था.

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पेराम्ब्रा सीट साल 1980 से ही वामपंथियों का एक अभेद्य गढ़ रही है, लेकिन फातिमा तिलहिया ने यहां सीपीआई(एम) के दिग्गज नेता और एलडीएफ (LDF) के संयोजक टी.पी. रामकृष्णन को पटखनी देकर सबको चौंका दिया. चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, फातिमा को कुल 81,429 वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंदी रामकृष्णन को 76,342 वोटों पर ही संतोष करना पड़ा.

यह भी पढ़ें: केरल की राजधानी में बीजेपी की शानदार एंट्री, तिरुवनंतपुरम की तीनों सीटों पर कब्जा 
फातिमा ने 5,087 वोटों के सम्मानजनक अंतर से जीत हासिल की. यह जीत न केवल एक चुनावी सफलता है, बल्कि दशकों से चली आ रही एक ऐसी परंपरा का अंत भी है जहां मुस्लिम लीग की महिला नेताओं को सदन तक पहुंचने का अवसर नहीं मिल पा रहा था.

फातिमा तिलहिया की इस सफलता के पीछे उनकी वर्षों की कड़ी मेहनत और वैचारिक प्रतिबद्धता रही है. मुस्लिम लीग की छात्र इकाई 'एमएसएफ' (MSF) की महिला विंग 'हरिता' की संस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्होंने अपनी पहचान बनाई. उन्होंने हमेशा पार्टी के भीतर लैंगिक न्याय और महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के लिए आवाज उठाई, जिसके कारण उन्हें कई बार अपनी ही पार्टी के भीतर अनुशासनात्मक कार्रवाई और कड़े विरोध का सामना भी करना पड़ा. हालांकि, उन्होंने कभी हार नहीं मानी और कोझिकोड नगर निगम की पार्षद के रूप में जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत की.

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