बात चाहे नोएडा की किसी मल्टीनेशनल कंपनी में दिन-रात कोडिंग करने वाली 27 साल की युवती की हो, किसी यूनिवर्सिटी के कमरे में परीक्षा के दबाव से जूझते छात्र की, या फिर घर-परिवार की चारदीवारी में समेटे रहकर अकेलेपन का शिकार होती किसी गृहिणी (हाउसवाइफ) की... सर्दियों की दस्तक के साथ ही एक अजीब सी सुस्ती, उदासी और मानसिक थकान कई जिंदगियों को जकड़ने लगती है.
इसे महज सुस्ती या 'मौसम का मिजाज' समझकर टाल देना बहुत बड़ी भूल हो सकती है. चिकित्सा विज्ञान इसे सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर (SAD) यानी मौसमी अवसाद या आम भाषा में 'विंटर ब्लूज' कहता है. आइए जानते हैं क्या होता है ये डिसऑर्डर और कैसे दूर होगी ये प्रॉब्लम?
क्या है विंटर ब्लूज और क्यों बदलता है दिमाग का मिजाज?
सर गंगा राम अस्पताल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. राजीव मेहता बताते हैं कि, 'जैसे-जैसे सर्दियां नजदीक आती हैं और दिन छोटे होने लगते हैं, सूरज की रोशनी (सनलाइट) कम मिलने लगती है. इसका सीधा असर हमारे शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक यानी सर्काडियन रिदम पर पड़ता है.'
डॉ. मेहता के मुताबिक, धूप कम मिलने से हमारे दिमाग में मूड को कंट्रोल करने वाला केमिकल सेरोटोनिन कम बनने लगता है और नींद को बढ़ावा देने वाला हार्मोन मेलटोनिन जरूरत से ज्यादा पैदा होने लगता है. नतीजा यह होता है कि व्यक्ति को हर वक्त भारीपन, अत्यधिक नींद और गहरा खालीपन महसूस होने लगा है.
जयपुर के जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ. अनिल सिंह शेखावत इस बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि यह समस्या सिर्फ दफ्तर जाने वालों तक सीमित नहीं है, बल्कि आधुनिक लाइफस्टाइल ने समाज के हर वर्ग को इसकी चपेट में ला दिया है.
सिर्फ कॉर्पोरेट ही नहीं, स्टूडेंट्स और हाउसवाइफ्स पर भी वार
विंटर ब्लूज अब केवल एक वर्ग की समस्या नहीं रही, बल्कि इसके दायरे में अलग-अलग जीवनशैली जीने वाले लोग आ रहे हैं:
कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स
कई युवा, जो अपने घरों से दूर महानगरों में रहते हैं, वे इस विकार के हाई-रिस्क जोन में आते हैं. सुबह अंधेरे में ऑफिस निकलना और शाम को अंधेरे में लौटना, सूरज की रोशनी से कट जाने के कारण इनमें डिप्रेशन के लक्षण तेजी से उभरते हैं. टारगेट का दबाव और विंटर ब्लूज मिलकर उनकी कार्यक्षमता को आधा कर देते हैं.
विद्यार्थी वर्ग:
अक्सर सर्दियों के दिनों में बोर्ड परीक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी या सेमेस्टर के दबाव के बीच स्टूडेंट्स खुद को कमरे में बंद कर लेते हैं. धूप में न निकलना और लगातार स्क्रीन के आगे बैठे रहने से उनका एनर्जी लेवल अचानक शून्य पर पहुंच जाता है. पढ़ाई में एकाग्रता टूटने लगती है और वे खुद को मानसिक रूप से थका हुआ महसूस करते हैं.
गृहिणियां और महिलाएं
हालिया चिकित्सीय रिपोर्ट्स बताती हैं कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं में SAD का खतरा 4 से 5 गुना अधिक होता है. खासकर वे गृहिणियां जो घर की चारदीवारी में सर्दियों के दौरान सामाजिक गतिविधियों से कट जाती हैं, वे अकेलेपन और मौसमी उदासी का शिकार हो जाती हैं. फैमिली हिस्ट्री में यदि डिप्रेशन या बाइपोलर डिसऑर्डर रहा हो, तो यह जोखिम और ज्यादा बढ़ जाता है.
लेटेस्ट रिसर्च और आंकड़े क्या कहते हैं?
हाल ही में मेंटल हेल्थ पर आई वैश्विक और राष्ट्रीय शोध (Research) से यह बात सामने आई है कि दुनिया भर में लगभग 5% से ज्यादा आबादी सीधे तौर पर सीजनल डिप्रेशन से प्रभावित होती है, जबकि हल्के स्तर का विंटर ब्लूज हर 5 में से 1 व्यक्ति के रूटीन को बिगाड़ देता है.
जर्नल ऑफ़ अफेक्टिव डिसऑर्डर की एक स्टडी के अनुसार, लाइट एक्सपोजर की कमी हमारे न्यूरोट्रांसमीटर बैलेंस को पूरी तरह डिस्टर्ब कर देती है. राहत की बात यह है कि मेडिकल साइंस में अब इसके इलाज के लिए आधुनिक और सटीक तकनीकें आ चुकी हैं, जिससे समय रहते इस पर काबू पाया जा सकता है.
अगर दिखें ये लक्षण तो न करें नजरअंदाज:
जयपुर के मनोचिकित्सक डॉ. अनिल सिंह शेखावत सलाह देते हैं कि यदि मौसम बदलने पर आप या आपका कोई अपना इन लक्षणों से गुजर रहा है, तो सतर्क हो जाएं.
अत्यधिक सोना या अनिद्रा: या तो व्यक्ति दिनभर बिस्तर पर सोना चाहता है (हाइपरसोमनिया) या फिर रातभर नींद नहीं आती.
खानपान में बदलाव: खासकर मीठी चीजें और कार्बोहाइड्रेट (जैसे जंक फूड, आलू, मैदा) खाने की तीव्र इच्छा होना, जिससे वजन तेजी से बढ़ने लगता है.
सोशल विथड्रॉल: दोस्तों, परिवार और सामाजिक मेलजोल से पूरी तरह कट जाना, बातचीत कम कर देना.
लगातार लो मूड: बिना किसी ठोस वजह के उदासी, चिड़चिड़ापन और भविष्य को लेकर निराशा का भाव रहना.
कमजोरी और ऊर्जा की कमी: शरीर में हर वक्त भारीपन और किसी भी काम में मन न लगना.
कैसे पाएं इससे छुटकारा?
डॉ. राजीव मेहता के अनुसार, विंटर ब्लूज का इलाज पूरी तरह संभव है और इसके लिए घबराने की बिल्कुल जरूरत नहीं है. इसके लिए कई थेरेपीज हैं जो आपको इससे बचा सकती हैं.
लाइट थेरेपी:
यह इस डिसऑर्डर का सबसे अचूक इलाज माना जाता है. इसमें मरीज को एक खास 'लाइट बॉक्स' (10,000 लक्स ब्राइट लाइट) के सामने दिन में 20 से 30 मिनट बैठना होता है, जो प्राकृतिक धूप की कमी को पूरा करके मस्तिष्क में सेरोटोनिन के स्तर को सुधारता है.
विटामिन डी और खानपान:
सर्दियों में शरीर को धूप कम मिलने से विटामिन डी की कमी हो जाती है, जो डिप्रेशन को बढ़ावा देती है. डॉक्टर की सलाह पर विटामिन डी सप्लीमेंट्स और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर डाइट लें.
कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT-SAD):
यह एक प्रकार की टॉक थेरेपी है, जो मौसम बदलने के साथ मन में आने वाले नकारात्मक विचारों और आदतों को बदलने में मदद करती है.
एरोबिक एक्सरसाइज और मॉर्निंग वॉक
रोजाना सुबह की हल्की धूप में टहलना और शारीरिक व्यायाम एंडोर्फिन (खुशी देने वाला हॉर्मोन) रिलीज करता है, जो डिप्रेशन को दूर भगाता है.
इसलिए मौसम का बदलना प्रकृति का नियम है, लेकिन इस बदलाव को अपने मानसिक सुकून पर हावी न होने दें. यदि उदासी का यह दौर दो हफ्ते से ज्यादा खिंच जाए, तो झिझक छोड़िए और किसी विशेषज्ञ चिकित्सक से मिलकर सही समय पर काउंसलिंग और ट्रीटमेंट का सहारा लीजिए. याद रखिए, आपकी मानसिक सेहत ही आपकी सबसे बड़ी पूंजी है!
मानसी मिश्रा