जो भी हूं, मां की बदौलत हूं, कूड़ा बीनकर मुझे पढ़ाया... IIT के बाद IFS अफसर बने गौतम ने ल‍िखा पोस्ट

सोशल मीडिया पर छाई यह तस्वीर हर उस मां की जीत है जो अपने बच्चे के लिए अपनी ज़िंदगी न्योछावर कर देती है. मुंबई के स्लम से निकलकर IIT मद्रास और फिर IFS अफसर बनने वाले गौतम पाडीभार ने जब अपनी कबाड़ चुनने वाली मां को सरकारी कुर्सी पर बिठाया, तो वो लम्हा इतिहास बन गया. जानिए बिना पैसों और सुविधाओं के कैसे लिखी गई यह ऐतिहासिक कामयाबी!

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'कबाड़ चुनने वाले हाथों को मिली अफसर की कुर्सी!' जानिए बिना कोचिंग IIT और UPSC क्रैक करने वाले गौतम की भावुक कहानी 'कबाड़ चुनने वाले हाथों को मिली अफसर की कुर्सी!' जानिए बिना कोचिंग IIT और UPSC क्रैक करने वाले गौतम की भावुक कहानी

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई द‍िल्ली ,
  • 24 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 7:47 PM IST

सफलता की कहानियों में अकसर बड़े-बड़े कोचिंग संस्थानों, लाखों के पैकेज और सुख-सुविधाओं का जिक्र होता है. लेकिन मुंबई की एक तंग झुग्गी से निकलकर देश के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान IIT मद्रास और फिर भारतीय वन सेवा (IFS) तक पहुंचे गौतम पाडीभर की कहानी किसी फि‍ल्मी पटकथा से कम नहीं है.

यह कहानी सिर्फ एक लड़के के अफसर बनने की नहीं है. यह कहानी उस अनपढ़ मां की है, जिसने अपने बच्चे के हाथों में कबाड़ की बोरी नहीं, बल्कि किताबें थमाने के लिए जिंदगी भर मुंबई की सड़कों पर कूड़ा बीना. आइए जानते हैं आईएफएस अफसर गौतम पाटीभर की सक्सेस स्टोरी

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हाल ही में सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हुई, जिसने देश भर के लोगों को भावुक कर दिया. तस्वीर में एक बेहद सादगी पसंद बुजुर्ग महिला अफ़सर की नीली बत्ती वाली सरकारी कुर्सी पर बैठी दिख रही हैं. यह कुर्सी उसी IFS अफ़सर गौतम की है, और कुर्सी पर बैठी महिला उनकी मां सखूबाई पाडीभर हैं.

अनपढ़ मां, जो शिक्षा की ताकत समझती थी

गौतम का बचपन बेहद गरीबी और अभावों में बीता. पिता के साये से वंचित होने के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. गांव में मजदूरी करने से लेकर मुंबई की झुग्गियों में सड़कों से कूड़ा चुनने तक मां सखूबाई ने हर वो काम किया जिससे परिवार का पेट भर सके.

गौतम बताते हैं कि उनकी मां कभी स्कूल नहीं गईं, लेकिन वे पढ़ाई की ताकत को बहुत अच्छी तरह समझती थीं. परिवार ने भुखमरी और कड़े अभाव झेले, मां का एक गंभीर एक्सीडेंट भी हुआ और वे लगातार बीमारियों से जूझती रहीं, लेकिन उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी. उनका सिर्फ़ एक ही सपना था कि जो लाचारी उन्होंने झेली, उनके बच्चों को न झेलनी पड़े. उन्होंने बच्चों को बचपन में ही काम पर धकेलने के बजाय पढ़ाई की आज़ादी दी.

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झुग्गी से IIT मद्रास का सफ़र: बिना किसी कोचिंग के गाड़ा झंडा
गौतम की शुरुआती पढ़ाई महाराष्ट्र के जालना स्थित जवाहर नवोदय विद्यालय (JNV) से हुई. जब देश भर के बच्चे लाखों रुपये खर्च करके कोटा और दिल्ली में IIT की कोचिंग कर रहे थे, तब गौतम बिना किसी कोचिंग और सुविधाओं के JEE की तैयारी कर रहे थे.

उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने IIT मद्रास में बीटेक (BTech) में दाखिला हासिल कर लिया. गौतम अपनी इस सफलता का पूरा श्रेय अपनी मां के उसी जुझारूपन और कभी न हार मानने वाले जज़्बे को देते हैं, जिसने उन्हें हर मुश्किल से लड़ना सिखाया.

और फिर बने भारतीय वन सेवा (IFS) के अफसर

इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद गौतम ने सिविल सर्विसेज का रुख किया. उन्होंने UPSC द्वारा आयोजित की जाने वाली भारतीय वन सेवा परीक्षा 2022 (IFS Exam 2022) में हिस्सा लिया और पूरे भारत में 139वीं रैंक (AIR 139) हासिल की.

साल 2023 बैच के छत्तीसगढ़ कैडर के अधिकारी के रूप में गौतम की पहली पोस्टिंग हुई. वर्तमान में वे छत्तीसगढ़ के जगदलपुर स्थित प्रसिद्ध कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में बतौर डायरेक्टर तैनात हैं.

'यह कुर्सी मेरी नहीं, मां के पसीने की है'

जब मां सखूबाई अपने अफ़सर बेटे के दफ़्तर पहुंचीं, तो गौतम ने उन्हें अपनी सरकारी कुर्सी पर बिठाया. उस पल को याद करते हुए गौतम बेहद भावुक हो गए.

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गौतम ने लिखा कि आज मैं जो कुछ भी हूं, अपनी मां की बदौलत हूं. यह सफलता सिर्फ मेरी नहीं है, यह सबसे पहले और सबसे ज्यादा मेरी मां की है. मुंबई के फुटपाथों पर कबाड़ की थैलियां उठाने वाले हाथों का देश के शीर्ष प्रशासनिक अफसर की कुर्सी तक पहुंचना सिर्फ एक पारिवारिक उपलब्धि नहीं, बल्कि हर उस मां की जीत है जो अपने बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी न्योछावर कर देती है.

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