'मैं 80 के दशक में IIT मद्रास में पढ़ता था... और यकीन मानिए, वह पूरी तरह से एक 'जाति-चेतना' (Caste-conscious) वाली जगह थी.'
पहली नज़र में यह बयान किसी को भी हिला सकता है. लेकिन जब इसे कहने वाला शख्स खुद IIT मद्रास का पूर्व छात्र हो, तो बात सिर्फ सामाजिक जाति की नहीं रह जाती. हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर आईआईटी मद्रास के पूर्व छात्र रमेश श्रीवत्स ने कैंपस लाइफ का जो 'कड़वा और व्यंग्यात्मक' सच बयान किया है, वह आज IIT बॉम्बे में उबले विवाद और छात्र खुदकुशी के बीच बेहद मौजूं हो गया है.
दरअसल, IIT बॉम्बे में 18 सितंबर को बीटेक सेकेंड ईयर के छात्र साहिल वाकोडे की खुदकुशी के बाद कैंपस में बवाल मचा हुआ है. परिजनों ने जातिगत उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए प्रोफेसर सूर्यनारायण दूल्ला के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है. इस पूरे बैकड्रॉप में रमेश श्रीवत्स ने समझाया है कि कैसे आईआईटी के भीतर एक 'अदृश्य जाति व्यवस्था' (हेरार्की) चलती है, जो भले ही सामाजिक न हो, लेकिन छात्रों की दिमागी नसें फाड़ने के लिए काफी है.
जब हर साल बदल जाती थी 'IIT की जाति'
श्रीवत्स ने बताया कि 80 के दशक में जब वे आईआईटी मद्रास पहुंचे, तो कैंपस में सामाजिक या पारिवारिक पृष्ठभूमि कोई नहीं पूछता था, लेकिन प्रतिस्पर्धा और भेदभाव के कई अनकहे स्तर मौजूद थे.
कैंपस में कदम रखते ही पहली 'जाति' तय होती थी जेईई (JEE) रैंक से. सिंगल डिजिट और टॉप रैंकर्स को 'उच्च जाति' और पीछे की रैंक वालों को 'निम्न' माना जाता था.
6 महीने बाद आता है ब्रांच का 'अहंकार'
वो बताते हैं कि छह महीने बीतते-बीतते रैंक का नशा उतरा और 'ब्रांच' की दादागिरी शुरू हुई. टॉप पर कंप्यूटर साइंस (CSE), उसके बाद इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल और सबसे नीचे बाकी ब्रांचेस.
श्रीवत्स ने एक दिलचस्प किस्सा साझा किया. जब वे फर्स्ट इयर में फिजिक्स में फेल हो गए, तो समर कोर्स के लिए प्रोफेसर से मिलने गए. साथ में उनका एक दोस्त भी था.
प्रोफेसर ने श्रीवत्स से पूछा, 'कौन सी ब्रांच है?'
श्रीवत्स बोले- 'कंप्यूटर साइंस.'
प्रोफेसर चौंके- 'कंप्यूटर साइंस? तुम यहां क्या कर रहे हो?'
फिर प्रोफेसर ने उनके दोस्त से पूछा. उसने कहा- 'मेटलर्जी, सर.'
प्रोफेसर ने तुरंत ताना मारा- 'अच्छा! फिर तो तुम्हारे यहां होने की ठोस वजह है!'
सेकेंड/थर्ड इयर: GPA और 'जीनियस' बनाम 'कैश काउ' का ठप्पा
दूसरे और तीसरे साल तक आते-आते यह पदानुक्रम 'GPA' (अंकों) के जाल में उलझ जाता था. श्रीवत्स के मुताबिक, इसे सिर्फ कम या ज्यादा नंबरों से नहीं, बल्कि दो दायरों में देखा जाता था:
जीनियस ग्रुप, वो ग्रुप जो बिना पढ़े या कम पढ़कर भी हाई GPA लाते थे, उन्हें 'सुपर कास्ट' माना जाता था. कैश काउ (घिस्सू) वो थे जो दिन-रात घिसकर/रटकर हाई GPA लाते थे.
वहीं एवरेज व बॉटम में वो थे जो दिन-रात पढ़कर भी कम नंबर लाते थे, और सबसे नीचे वे जो न पढ़ते थे और न ही नंबर लाते थे. श्रीवत्स मजाकिया लहजे में खुद को इसी आखिरी पायदान पर रखते हैं.
फोर्थ इयर: करियर और 'अमेरिकन एक्सेंट' की होड़
चौथे साल तक पहुंचते-पहुंचते न रैंक मायने रखती थी, न ही GPA. अब असली 'जाति' तय होती थी इस बात से कि आप जा कहां रहे हैं? अमेरिका की यूनिवर्सिटी में एडमिशन, IIM की कॉल, या फिर बड़ी टेक कंपनी में नौकरी! श्रीवत्स याद करते हैं कि कैसे अमेरिका में एडमिशन पाने वाले एक सहपाठी ने पार्टी दी थी और वे मजाक उड़ाते थे कि बिना मद्रास से बाहर कदम रखे ही उसका 'अमेरिकन एक्सेंट' निकल आया है.
सिस्टम वही, बस रूप बदला है
श्रीवत्स अपनी बात का अंत एक बेहद गहरी बात से करते हैं. वे कहते हैं कि उनके जमाने की इस 'अदृश्य जाति व्यवस्था' की सबसे बुरी बात यह थी कि लोग पदानुक्रम (हेरार्की) के पीछे अंधे थे. लेकिन एक अच्छी बात यह थी कि यह हर साल बदल जाती थी, यह किसी के परिवार या जन्म से तय नहीं होती थी.
लेकिन आज का कड़वा सच यह है कि 80 के दशक की वो 'रैंक, GPA और ब्रांच' वाली अनकही होड़ अब सामाजिक पहचान और मानसिक अवसाद के उस घातक मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां से बच्चे सीधे मौत को गले लगा रहे हैं. सवाल यह है कि आखिर IITs का यह दमघोंटू कॉम्पिटिटिव कल्चर कब खत्म होगा?
आजतक एजुकेशन डेस्क