जरा सोचिए, आज आपका जॉब इंटरव्यू है. आप अपनी होने वाली नई वर्कप्लेस के लिए निकलते हैं. रास्ते में आप अपनी पसंदीदा कॉफी शॉप पर रुकते हैं और एक बड़ा सा आइस्ड लाटे लेकर इंटरव्यू के लिए पहुंच जाते हैं. हाथ में कॉफी है और आप सीधे इंटरव्यू रूम में चले जाते हैं. इंटरव्यू शुरू होता है और आपके हाथ में वही कॉफी रहती है. बातचीत के बीच आप आराम से एक-दो घूंट भी लेते रहते हैं.
कुछ जेन जी नौकरी करने वालों के लिए इसमें कुछ भी गलत नहीं है. आखिर कॉफी ही तो है, इसमें इतनी बड़ी बात क्या है? लेकिन अगर यही चीज किसी मिलेनियल या जेन X भर्ती करने वाले के सामने हो, तो शायद उनका पहला सवाल होगा, 'इंटरव्यू में ऐसा करना कब से ठीक हो गया?'
और इसी के साथ जेन जी और मिलेनियल्स के बीच वर्क प्लेस में कल्चर क्लैश की लिस्ट में एक और चीज जुड़ जाती है.
अब ये बात नई नहीं है कि दोनों पीढ़ी काम को अलग-अलग तरीके से देखती हैं. कई सर्वेज से लेकर सोशल मीडिया और ऑफिसिस में होने वाली बहस तक, दोनों के बीच का ये फर्क काफी चर्चा में रहा है.मिलेनियल्स को अक्सर हसल, बहुत मेहनत करना और हमेशा आगे बढ़ने वाली सोच से जोड़ा जाता है, जबकि जेन जी अपने मन के शांति को ज्यादा महत्व देती है.
कहानी शुरू हुई एक आइस्ड कॉफी से
ये पूरा मामला तब चर्चा में आया, जब फ्लोरिडा की एक भर्ती करने वाली एजेंसी की प्रेजीडेंट कैटलिन वेनिएनेन ने टिक टॉक पर एक वीडियो शेयर किया. इसमें उन्होंने इंटरव्यू से जुड़ी एक खास गलती की बात की-हाथ में आइस्ड कॉफी लेकर इंटरव्यू के लिए पहुंचना. उन्होंने बताया कि उनके जेन जी जॉब के लिए उम्मीदवार ऐसा कर रहे हैं.
युवा उम्मीदवार को ट्रेनिंग देने के अपने अनुभव के आधार पर वेनिएनेन ने कहा कि कॉफी लेकर इंटरव्यू में पहुंचना देखने में छोटी बात लग सकती है, लेकिन इससे कैंडिडेट जरूरत से ज्यादा कैजुअल लग सकता है. इससे ऐसा भी लग सकता है कि इंटरव्यू उसके लिए कोई खास मौका नहीं, बल्कि दिन के बाकी कामों के बीच निपटाया जाने वाला एक और काम है.
ये वीडियो बहुत जल्द ही वायरल हो गया. होना भी था, वजह जो इतनी अलग थी. जेन जी के नौकरी चाहने वाले के लिए दी गई एक छोटी सी सलाह देखते ही देखते पीढ़ी वाले बहस में बदल गई. कुछ लोगों का मानना था कि इंटरव्यू में एक खास तरह की फॉरमैलिटी होनी चाहिए. वहीं कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि आखिर हाथ में आइस्ड कॉफी होने से इतना फर्क क्यों पड़ना चाहिए?
तो क्या एक कप कॉफी सच में आपका जॉब इंटरव्यू खराब कर सकती है? अगली बार इंटरव्यू में कॉफी लेकर जाना ठीक है या उसे बाहर ही छोड़ देना चाहिए?
इंटरनेट पर इस सवाल को लेकर खूब चर्चा हुई, लेकिन इसका कोई तय जवाब नहीं है. और हम भी आपको इसका कोई एक जवाब नहीं देने वाले.
हम यहां कॉफी नहीं, बल्कि चाय की चुस्की लेते हुए उन कई तरीकों की बात कर रहे हैं, जिनसे जेन जी अनजाने में भर्ती करने वालों को हैरान कर सकती है. क्योंकि आइस्ड लाटे तो इस पूरी कहानी का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा है.
इंटरव्यू से पहले ही शुरू हो जाता है बदलाव
जेन जी के पास वर्क प्लेस से जुड़े कई ऐसे तरीके हैं, जिन्हें देखकर पुराने दौर के भर्ती करने वाले कभी कह सकते हैं, 'अच्छा है, अपनी बात रखते हैं', तो कभी सोच सकते हैं, 'ये क्या हो रहा है?'
हालांकि यहां 'रेज बेटिंग' का मतलब यह नहीं है कि जेन जी गलत है. इसका मतलब सिर्फ इतना है कि जेन जी कई बार उन नियमों के हिसाब से नहीं चलती, जो पिछली पीढ़ी के काम करने के एक्सपीरीयंस का हिस्सा रहे हैं.
शुरुआत करते हैं एक छोटे से मैसेज से- 'क्या हम इंटरव्यू को 'रिस्कैड्यूल' यानी टाल सकते हैं या दोबारा रख सकते है?' और खास बात ये है कि ये मैसेज इंटरव्यू से सिर्फ पांच मिनट पहले भेजा जाता है.
एक एयरलाइन में काम करने वाले 36 वर्षीय HR प्रोफेशनल ने इंडिया टुडे को बताया, 'ऐसे मैसेजेस के साथ कई बार बहुत कैजुअल वजह भी दी जाती है. शुरुआत में ये मुझे कुछ ज्यादा ही सीधा लगा, लेकिन इससे मुझे एहसास हुआ कि वर्क प्लेस में अपनी उम्मीद को ज्यादा साफ तरीके से बताना अब स्वाभाविक होता जा रहा है.”
उन्होंने आगे बताया कि समय के साथ उन्हें यह भी समझ आया कि कुछ युवा उम्मीदवार अपनी मजबूरियों और सीमाओं के बारे में खुलकर बात करने में ज्यादा सहज हैं. वे ऐसी प्रक्रिया में खुद को जबरदस्ती ढालने के बजाय अपनी परेशानी बता देना पसंद करते हैं, जो उनके लिए काम नहीं कर रही.
प्लक्सी इंडिया की HR निदेशक सुवर्णा मिश्रा ने भी कुछ ऐसा ही अनुभव साझा किया. उन्होंने कहा, कैंडिडेट्स इंटरव्यू टालने या रिस्कैड्यूल करने के लिए एक लाइन में वजह बताते हुए मैसेज कर देते हैं और ज्यादा सफाई नहीं देते. शुरुआत में ये मुझे कैजुअल लगा, लेकिन बाद में समझ आया कि ये सीमाओं यानी अपनी बाउंडरीज को लेकर जयादा हेल्डी रवैया है, जो शायद हमारी पीढ़ी में उतना नहीं था.'
फिर आता है ड्रैसिंग का मामला
सूट और टाय वाला दौर अब पहले जैसा नहीं रहा.
स्नीकर्स (जूते), ओवर साइज्ड टी शर्ट्स (ढीले टीशर्ट्स) रंग बिरंगे बाल, छिदे हुए कान और अब सबसे ज्यादा चर्चा में आया आइस्ड कॉफी का कप-ये सब जॉब इंटरव्यू वाले कमरे तक पहुंच रहे हैं.
इंटरनेशनल शेयर्ड सपोर्ट सेंटर प्राइवेट लिमिटेड के CEO विनीत चतुर्वेदी ने कहा, 'टाय किसी की योग्यता का पैमाना नहीं है और कर्मचारी को ये समझना चाहिए. हालांकि, साफ-सुथरा दिखना और जगह के हिसाब से सही कपड़े पहनना आज भी एफर्ट दिखाता है. पुराने ड्रेस कोड को छोड़ना और इंटरव्यू को पूरी तरह कैजुअल बातचीत की तरह लेना, दोनों अलग बातें हैं.'
सिएलो टैलेंट से जुड़े ग्लोबल HR और GCC लीडर सचिन मल्होत्रा ने भी जॉब सीकर्स को इंटरव्यू में स्नीकर्स और बीरकेनस्टॉक पहने हुए देखा है. उनके 18 साल के करियर में ये एक नया अनुभव है.
उन्होंने एक कैंडिडेट का किस्सा भी बताया, जो फाइनल राउंड इंटरव्यू में स्नीकर्स और हूडी पहनकर आया था. शुरुआत में उनकी प्रतिक्रिया ज्यादा पॉजिटिव नहीं थी. लेकिन फिर उसी कैंडिडेट ने उस दिन के सबसे मुश्किल सवाल का जवाब, सूट पहनकर आए बाकी कैंडिडेट्स से ज्यादा क्लैरिटी के साथ दिया.
उनके मुताबिक, इस अनुभव ने उन्हें याद दिलाया कि कई बार इंटरव्यू रुम में सबसे ज्यादा गलत चीज कपड़े नहीं, बल्कि उस आउटफिट को लेकर बनाई गई सोच होती है.
पुणे की एक 43 वर्षीय HR कंस्लटेंट ने कहा, 'मैं समझ सकता हूं कि अगर आप किसी मार्केटिंग एजेंसी या स्टार्ट अप में इंटरव्यू दे रहे हैं, तो कैजुअल कपड़े पहने जा सकते हैं. लेकिन मेरे सामने ऐसे कैंडिडेट्स भी आए हैं, जो बैंक के जॉब इंटरव्यूज में भी फॉर्मल कपड़े पहनकर नहीं आए. वर्क प्लेस की प्रोफेशनल अपीयरेंस यानी दिखने का तरीका और हायजीन (पर्सनल साफ साफाई) से जुड़ी उम्मीद को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.'
ई-मेल में इमोजी भी पहुंच गए
एक वक्त था जब ई-मेल भेजने से पहले उसे कई बार पढ़ा जाता था, ताकि छोटी से छोटी गलती भी न रह जाए. अब ग्रामर से लेकर चैट जीपीटी की मदद से अपने शब्दों का लहजा समझने तक, कर्पोरेट में बातचीत का तरीका काफी बदल चुका है.
लेकिन कुछ मिलेनियल और जेन X भर्ती करने वालों के लिए एक और चीज अब भी थोड़ी हैरान करने वाली है- ई-मेल्स और मैसेज में इमोजी का इस्तेमाल.
एक दवा-तकनीक कंपनी में काम करने वाले भर्ती अधिकारी ने बताया, 'एक बार मुझे सैलरी पर बातचीत के लिए एक उम्मीदवार का संदेश मिला, जिसमें मुरझाए हुए फूल वाली इमोजी लगी थी. सच कहूं तो शुरुआत में मुझे समझ ही नहीं आया कि उसका मतलब क्या था. आखिरकार मुझे गूगल पर खोजकर देखना पड़ा कि उस फूल के जरिए आखिर क्या बताने की कोशिश की गई थी.'
अजीब है, है ना? लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है.
घोस्टिंग और अचानक नौकरी छोड़ना
लगता है कि घोस्टिंग अब सिर्फ डेटिंग तक सीमित नहीं रह गया है. रिक्रूटर्स का कहना है कि किसी के भी हायरिंग प्रोसेस यानी नौकरी देने के प्रोसेस के अलग-अलग चरणों में भी कैंडिडेट्स अचानक गायब हो रहे हैं.
ब्रांड टॉक की सीनियर HR मैनेजर आस्था आनंद ने बताया, कैडिडेट्स इंटरव्यू कंफर्म करने के बाद गायब हो जाते हैं, ऑफर एक्सेप्ट करने के बाद जवाब देना बंद कर देते हैं या जॉइनिंग की तारीख पर आते ही नहीं हैं. पहले हम किसी भी प्रोसेस को पूरा करके बात खत्म करने में विश्वास करते थे. अगर हमने नौकरी ज्वाइन न करने का फैसला भी किया, तो HR को कॉल या ई-मेल जरूर करते थे, क्योंकि आपको कभी नहीं पता होता था कि भविष्य में आपका रास्ता फिर कब मिल जाए. रिश्ते खराब करना कोई विकल्प नहीं था.'
उन्होंने आगे कहा, 'आज ऐसा लगता है कि प्रोफेशनल लाइफ में शिष्टाचार धीरे-धीरे कम हो रही है. मेरा मानना है कि हर उम्मीदवार, चाहे वो किसी भी पीढ़ी का हो, इस मामले में खुद को बेहतर कर सकता है.'
इस बीच, चतुर्वेदी ने ऐसे कर्मचारियों को भी देखा है, जो सैलरी मिलने वाले दिन अपना लैपटॉप HR के पास छोड़कर दोबारा काम पर ही नहीं लौटे. कुछ लोगों ने अपने रिलीविंग लेटर के लिए भी कोई फॉलो-अप नहीं किया.
नौकरी से पहले ही पूछे जा रहे हैं ‘बोल्ड’ सवाल
अब आते हैं उन सवालों पर, जिन्हें कभी जॉब मिलने से पहले पूछना काफी बोल्ड माना जाता था.
जैसे ये पूछना कि अगर शाम 7 बजे के बाद कोई काम से जुड़ा मैसेज आए, तो उसके जवाब को लेकर कंपनी की क्या उम्मीद हैं.
पिछली पीढ़ी के नौकरी तलाशने वालों का नजरिया ज्यादा सावधान हुआ करता था. उनके लिए सबसे पहले नौकरी हासिल करना जरूरी था. ऐसे में इस तरह का सवाल पूछना नौकरी के मौके को जोखिम में डालने जैसा लग सकता था. लेकिन कुछ जेन जी उम्मीदवार नौकरी से जुड़े इन अनकहे नियमों के हिसाब से चलने के बजाय अपनी बात सीधे रखने में ज्यादा सहज नजर आते हैं..
HR एंगल कंसल्टिंग की फाउंडर और CHRO रेखा ने ऐसा ही एक अनुभव साझा किया
उन्होंने बताया, 'एक कैंडिडेट्स ने मुझसे पहले ही राउंड में पूछ लिया, जबकि हमने अभी तक रोल के बारे में ठीक से बात भी नहीं की थी-‘शाम 7 बजे के बाद मैसेजेस और ई-मेल्स का जवाब देने को लेकर आपकी क्या उम्मीद है?’ सच कहूं तो मन ही मन मैंने आंखें घुमा लीं, क्योंकि मेरी जेनरेशन में हम ऑफर लेटर साइन होने तक ऐसा सवाल पूछने की हिम्मत नहीं करते थे. बल्कि हममें से ज्यादातर ने शायद कभी पूछा ही नहीं होता.'
उन्होंने आगे कहा, 'लेकिन जितना मैंने इस बारे में सोचा, उतना समझ आया कि वो कमिटमेंट की कमी नहीं दिखा रही थी. वो भी हमारा वाइब चेक कर रही थी, ठीक उसी तरह जैसे हम उसका आकलन कर रहे थे. जेन जी बस उन बातों को खुलकर कह रही है, जिनसे मिलेनियल्स चुपचाप परेशान होते रहे हैं. उनके लिए बाउंडरीज महत्वाकांक्षा की कमी नहीं हैं. वे बेसिक उम्मीद हैं और जो कंपनीज उनका सम्मान नहीं करेंगी, वे अच्छे टैलेंट को खोती रहेंगी.”
इंटरव्यू अब सिर्फ एकतरफा सवाल-जवाब नहीं
इंटरव्यू के दौरान इंटरव्यूर से सवाल पूछना भी जेन जी का एक आम तरीका बनता जा रहा है.
कंपनी का कल्चर, मैनेजर के काम करने का तरीका, तरक्की, काम करने की फ्लैक्सिबिलिटी और वर्किंग आर्स यानी कितने घंटे काम करना होगा जैसे सवाल अब सिर्फ फाइनल राउंड के लिए नहीं बचाए जाते. कैंडिडेट्स नौकरी एक्सेप्ट करने से पहले ये जानना चाहते हैं कि वे किस तरह के माहौल में काम करने जा रहे हैं.
इस तरह इंटरव्यू अब सिर्फ एकतरफा सवाल-जवाब नहीं रह गया है. यह दोनों तरफ से एक तरह का वाइब चेक बन रहा है.
लेकिन ये तो सिर्फ शुरुआत है.
असली 'रेज बेटिंग''या कहें वर्क प्लेस में बड़ा बदलाव-तब शुरू होता है, जब जेन जी वास्तव में नौकरी ज्वाइन करती है.
(रिपोर्ट: मेधा चावला, इंडिया टुडे)
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