दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर चर्चा में आ गया है. कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने एक बार फिर से वहां पर धावा बोल दिया लेकिन इस बार का मुद्दा छात्रों से जुड़ा नहीं है बल्कि सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त से जुड़ा हुआ है. दरअसल, CJP का आरोप है कि मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में कथित तौर पर गलतियां हुई हैं. इसी मुद्दे पर पार्टी चुनाव आयोग की जवाबदेही तय करने की मांग कर रही है, जिसके लिए प्रोटेस्ट किया जा रहा है. हालांकि, दिल्ली पुलिस ने कम समय पहले आवेदन मिलने और पिछले प्रदर्शन में नियमों के उल्लंघन का हवाला देते हुए इस प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी है,लेकिन बावजूद इसके भारी संख्या में लोग वहां पर जमा हो रहे हैं.
लेकिन इस बीच कई लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि क्या केवल प्रोटेस्ट करने से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपने पद से हट सकते हैं? तो इसका साफ जवाब है नहीं. इसके लिए भी एक लंबा प्रोसेस होता है जिसे फॉलो किया जाता है. तो चलिए जानते हैं कि कैसे मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाया जा सकता है.
बता दें कि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया ठीक वैसी ही होती है जैसे हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जजों को पद से हटाने के लिए की जाती है जोकि एक कठिन प्रक्रिया है. इसे भारतीय संविधान के आर्टिकल 324 में तय की गई है.
हालांकि, संविधान में यह सुनिश्चित किया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को सरकार के दवाब से बचाया जा सकता है. इसका मकसद यह है कि वह निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से काम कर सकें. मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संवैधानिक और स्वतंत्र है, इसलिए उन्हें सिर्फ साधारण बहुमत से नहीं हटाया जा सकता. ECI को पद से हटाने का प्रोसेस संसद से शुरू होता है. इसके लिए पहले उनके खिलाफ दुर्व्यवहार या अक्षमता साबित करने के लिए पद से हटाने का प्रस्ताव लाया जाता है. इसके बाद से इसे लोकसभा या राज्यसभा में पेश किया जाता है.
प्रस्ताव को लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के साइन के साथ पेश किया जाता है. जब प्रस्ताव पेश कर दिया जाता है, तो संबंधित सदन के स्पीकर को इस विषय पर विचार करना होता है. हालांकि, वे इस प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं. लेकिन अगर वह इसे स्वीकार करते हैं, तो इन आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जाता है.
गठित की गई इस समिति की अगुवाई सुप्रीम कोर्ट के जज द्वारा की जाती है. वहीं, हाईकोर्ट के एक चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित न्यायविद कमेटी में शामिल होते हैं. उनकी जांच रिपोर्ट पर सदन चर्चा करता है. इस समिति का काम यही होता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगे आरोपों की जांच करें. जब जांच शुरू होती है तो, ECI को भी उनका पक्ष रखने का मौका दिया जाता है. कमेटी की जांच जब पूरी हो जाती है, तो इसकी रिपोर्ट स्पीकर या चेयरमैन को सौंपी जाती है. लेकिन अगर कमेटी उन्हें दोषी पाती है, तो फिर पद से हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है.
अगर समिति की रिपोर्ट में वह दोषी पाए जाते हैं, तो उन्हें हटाने के लिए प्रस्ताव को संबंधित सदन में चर्चा के लिए लाया जाता है. फिर इस प्रस्ताव के सदन के कुल सदस्यों की बहुमत यानी 50 प्रतिशत से ज्यादा और उपस्थित या मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से परित करना अनिवार्य होता है, जिसे विशेष बहुमत भी कहते हैं. जब यह प्रस्ताव एक सदन में पारित हो जाता है, तो इसे दूसरे सदन में भेजा जाता है. फिर विशेष बहुमत से पारित किया जाता है. जब यह प्रस्ताव दोनों सदनों में पारित हो जाता है, तो इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है.
संसद की ओर से प्रस्ताव पारित हो जाने पर राष्ट्रपति, मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने को लेकर आदेश जारी करती है. हालांकि, यह पूरी प्रक्रिया को एक सत्र में पूरा करना अनिवार्य है. जब दोनों सदनों को प्रस्ताव पर राष्ट्रपति मुहर लगाती हैं, तो मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटा दिया जाता है.