विजय वर्मा का जीवन हमेशा इतना आसान नहीं था. अक्टूबर 1978 में राजस्थान के झुंझुनू जिले के बिसाऊ गांव में जन्मे वर्मा का बचपन कठिन और बेहद मुश्किल परिस्थितियों में बीता. उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना बड़ी चुनौती थी. जब वह केवल 10 साल के थे, तब उनके दादा-दादी का निधन हो गया. इसके ठीक एक साल के भीतर उनके पिता की भी मौत हो गई. इसके बाद उनकी मां ने अकेले ही छह बच्चों की जिम्मेदारी संभाली. कम उम्र में ही विजय को काम करना पड़ा. वह दिन में सिर्फ 3 रुपये के लिए बर्तन धोते थे. बाद में पुणे पहुंचने पर उन्होंने 8 रुपये के लिए रेत छानने का काम भी किया. कभी कुछ रुपयों के लिए दिनभर मेहनत करने वाले विजय वर्मा ने आगे चलकर निर्माण क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई.
निर्माण क्षेत्र में बनाई अपनी पहचान
दशकों की मेहनत के बाद आज वही विजय वर्मा 160 करोड़ रुपये के निर्माण कारोबार को संभाल रहे हैं. पुणे में उनके चार घर हैं और वह भारत के अलावा ओमान और यमन में भी परियोजनाओं पर काम कर चुके हैं. हालांकि, उन्हें यह सफलता रातोंरात नहीं मिली. उन्होंने छोटे-छोटे काम और मिले हर अवसर से शुरुआत की और धीरे-धीरे आगे बढ़ते गए. उनकी कहानी एक बड़े मौके की नहीं, बल्कि एक छोटे अवसर से दूसरे अवसर तक पहुंचते हुए सालों की मेहनत और संघर्ष की कहानी है.
अस्तित्व के लिए संघर्ष भरा बचपन
हालांकि, पिता के निधन के बाद विजय के परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनकी मां पर आ गई. छह बच्चों वाले परिवार की वह अकेली कमाने वाली थीं. गांव में रोजगार के सीमित साधन थे, इसलिए वह घर के पास जंगल से सूखे पत्ते, जलाऊ लकड़ी और गोबर इकट्ठा करती थीं. रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 30-40 किलो सामग्री के बदले उन्हें सिर्फ 1 किलो आटा मिलता था. ऐसे हालात में परिवार के लिए छोटी-सी कमाई भी बहुत मायने रखती थी.
साल 1989 में वर्मा के बड़े भाई ने कुछ समय तक सरकारी अस्पताल के कर्मचारियों तक दोपहर का खाना पहुंचाने का काम किया. इसके बदले उन्हें रोजाना 2 रुपये मिलते थे. सात दिनों में उन्होंने कुल 14 रुपये कमाए. उस समय यह रकम परिवार के लिए काफी बड़ी थी और इससे उनकी मां सब्जियां और दूध खरीद सकें.
विजय वर्मा आज भी उस घटना को एक दुर्लभ खुशी के तौर पर याद करते हैं. उस दौर में परिवार के लिए कुछ रुपये भी सिर्फ कमाई नहीं, बल्कि कुछ दिनों की राहत और उम्मीद का जरिया हुआ करते थे.
काम करने के लिए छोड़ दिया स्कूल
वर्मा जब छठी कक्षा में पढ़ रहे थे, तो वह अंग्रेजी और गणित में अपनी अच्छी पकड़ के लिए जाना जाता थे, तभी एक पारिवारिक परिचित ने उसके बड़े भाई को मुंबई में 500 रुपये प्रति माह की नौकरी की पेशकश की. बेहद कम आय वाले परिवार के लिए यह रकम बहुत बड़ी लग रही थी.
वर्मा ने बातचीत सुन ली और उसने भी काम करने का फैसला किया. अपनी मां के रोकने के प्रयासों के बावजूद, वह अगली सुबह स्कूल छोड़कर अपने भाई के साथ चला गया. उस फैसले ने आखिरकार उन्हें राजस्थान से पुणे पहुंचा दिया, जहां उन्होंने जो भी काम मिला, उसे करना शुरू कर दिया. इनमें से एक काम बर्तन धोने का था, जिसके लिए उन्हें प्रतिदिन 3 रुपये मिलते थे. उन्होंने मजदूर के रूप में भी काम किया, जिसमें रेत छानने का काम भी शामिल था, जिसके लिए उन्हें प्रतिदिन 8 रुपये मिलते थे.
मजदूर से लेकर खुद के बिजनेस तक का सफर
कई साल तक छोटे-मोटे काम करने के बाद विजय वर्मा के जीवन में बड़ा बदलाव तब आया, जब उन्होंने निर्माण क्षेत्र में कदम रखा. साल 2008 में उन्होंने साई विजय कंस्ट्रक्शन की शुरुआत की. बाद में 2011 में इसे औपचारिक रूप से लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (LLP) के तौर पर रजिस्टर्ड किया गया. धीरे-धीरे कंपनी ने भारत के अलग-अलग हिस्सों में निर्माण परियोजनाएं संभालनी शुरू की और बाद में विदेशों तक भी अपना काम बढ़ाया. रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी ने ओमान और यमन में करीब 730 करोड़ रुपये की परियोजनाओं पर काम किया. वर्मा ने अपनी विदेशी परियोजनाओं के जरिए 3,800 से ज्यादा श्रमिकों को प्रशिक्षण दिया. इनमें से 3,200 से अधिक श्रमिकों ने बाद में खुद का कारोबार शुरू किया.
3 रुपये रोज की कमाई से शुरू हुआ सफर
विजय वर्मा की कहानी की सबसे खास बात यह है कि उनका आज का मुकाम उनके शुरुआती जीवन से बिल्कुल अलग है. कहां उन्होंने बचपन में 3 रुपये से काम की शुरुआत की थी. आर्थिक मजबूरियों के कारण उन्होंने स्कूल भी छोड़ दिया क्योंकि उस समय उनके लिए पढ़ाई जारी रखने से ज्यादा जरूरी कमाई करना था. धीरे-धीरे उन्होंने मजदूरी से आगे बढ़कर निर्माण क्षेत्र में अपनी जगह बनाई और आखिरकार अपनी कंपनी के संस्थापक बने.
आजतक एजुकेशन डेस्क