तुर्की ने रक्षा क्षेत्र में एक ऐसा धमाका किया है जिसने पूरी दुनिया, खासकर भारत और इजरायल की सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है. इस्तांबुल में चल रहे 'SAHA 2026' रक्षा प्रदर्शनी में तुर्की ने अपनी पहली इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) यिल्दिरिमहान (Yıldırımhan) दिखाई है.
यह मिसाइल केवल एक हथियार नहीं है, बल्कि तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन के उस सपने की हकीकत है जिसमें वे तुर्की को एक वैश्विक सैन्य महाशक्ति बनाना चाहते हैं. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस मिसाइल के आने के बाद अब तुर्की की पहुंच यूरोप की सीमाओं से निकलकर सीधे दिल्ली, तेल अवीव और लंदन तक हो गई है. सोशल मीडिया और वैश्विक मीडिया में इसे भारत और इजरायल के लिए एक बुरा सपना (Nightmare) के रूप में देखा जा रहा है.
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यिल्दिरिमहान की ताकत और तकनीकी विशेषताएं
तुर्की के रक्षा मंत्रालय के आरएंडडी सेंटर द्वारा विकसित यिल्दिरिमहान की मारक क्षमता किसी को भी डराने के लिए काफी है. इस मिसाइल की रेंज 6000 KM है. इसका मतलब यह है कि अगर इसे अंकारा या इस्तांबुल से दागा जाता है, तो यह पूरे यूरोप, रूस, अधिकांश अफ्रीका और भारत के बड़े हिस्से को अपना निशाना बना सकती है.
तकनीकी रूप से यह मिसाइल 11 से 31 हजार किलोमीटर प्रतिघंटा की अविश्वसनीय रफ्तार से उड़ सकती है, जो इसे दुनिया की सबसे तेज मिसाइलों की श्रेणी में खड़ा करती है. इसमें नाइट्रोजन टेट्रोक्साइड तरल ईंधन का उपयोग किया गया है. यह चार शक्तिशाली रॉकेट इंजन सिस्टम से लैस है. इसकी इतनी अधिक रफ्तार का मतलब है कि दुश्मन के पास जवाबी कार्रवाई करने या मिसाइल को ट्रैक करने के लिए चंद मिनट भी नहीं होंगे.
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भारत और इजरायल के लिए नाइटमेयर क्यों?
इस मिसाइल के सामने आने के साथ ही उन देशों की सूची पर चर्चा तेज हो गई है जिन्हें तुर्की अपना प्रतिद्वंद्वी या शत्रु मानता है. तुर्की के राष्ट्रवादी हलकों और रक्षा रिपोर्टों में भारत, इजरायल, अमेरिका, फ्रांस, ग्रीस, साइप्रस और आर्मेनिया को उन देशों के रूप में देखा जा रहा है जो तुर्की के रणनीतिक हितों के सामने खड़े हैं.
इजरायली अखबार मारिव ने तो इसे 'तुर्की से आया नर्क' (Hell from Türkiye) तक कह दिया है. भारत के संदर्भ में चिंता इसलिए बढ़ गई है क्योंकि 6000 किमी की रेंज सीधे तौर पर दिल्ली और मुंबई जैसे प्रमुख शहरों को तुर्की के निशाने पर ला देती है. तुर्की का यह कदम केवल रक्षात्मक नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र में अपनी दादागिरी स्थापित करने और नाटो (NATO) पर अपनी निर्भरता को पूरी तरह खत्म करने की एक बड़ी कोशिश है.
आधुनिक डिफेंस सिस्टम भी इसके सामने फेल!
यिल्दिरिमहान को नाइटमेयर इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि इसकी हाइपरसोनिक रफ्तार और एडवांस पैंतरेबाजी (Maneuverability) इसे आज के दौर के किसी भी एयर डिफेंस सिस्टम के लिए असंभव टारगेट बना देती है. चाहे इजरायल का मशहूर आयरन डोम हो या अमेरिका का पैट्रियट सिस्टम, 31 हजार किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से आती मिसाइल को रोक पाना वर्तमान तकनीक के लिए नामुमकिन है.
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इसके अलावा, इसकी नाक (Nose cone) की बनावट से संकेत मिलते हैं कि यह एक साथ कई परमाणु हथियार (MIRV तकनीक) ले जाने में सक्षम हो सकती है. तुर्की के रक्षा मंत्री यासर गुलर ने इसे क्रिटिकल फोर्स मल्टीप्लायर बताया है, जिसका सीधा मतलब है कि अब तुर्की के दुश्मन किसी भी हमले से पहले हजार बार सोचेंगे.
तुर्की की नई विदेश नीति और सैन्य महत्वाकांक्षा
पिछले कुछ वर्षों में तुर्की ने जिस तरह से अपने ड्रोन (Bayraktar) और नौसैनिक बेड़े का विस्तार किया है. यिल्दिरिमहान उसी कड़ी का अगला और सबसे घातक हिस्सा है. तुर्की अब केवल हथियारों का खरीदार नहीं रहना चाहता, बल्कि वह दुनिया के टॉप 10 रक्षा निर्यातकों में शामिल होना चाहता है.
भारत के साथ तुर्की के संबंध कश्मीर मुद्दे और पाकिस्तान के साथ तुर्की की नजदीकी के कारण पहले से ही तनावपूर्ण रहे हैं. ऐसे में इतनी लंबी दूरी की मिसाइल का आना दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है. यह मिसाइल तुर्की को उन चुनिंदा देशों के क्लब में शामिल करती है जिनके पास अंतरमहाद्वीपीय हमला करने की क्षमता है. यह दुनिया को साफ संदेश है कि तुर्की अब अपनी शर्तों पर वैश्विक राजनीति करना चाहता है.
ऋचीक मिश्रा