अमेरिका और ईरान के बीच 60 दिनों का सीजफायर समझौता काफी नाजुक हो गया है. पिछले 48 घंटों में दोनों देशों की सेनाओं ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास गोलीबारी की है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समझौते को ओवर बताते हुए कहा कि ईरान कभी डील करना चाहता है. लेकिन जमीनी हालात और बयानबाजी दोनों ही तीखे बने हुए हैं.
इंडिया टुडे की OSINT टीम ने पिछले दो दिनों के अमेरिकी हमलों का नक्शा तैयार किया और दोनों पक्षों के आधिकारिक बयानों का विश्लेषण किया. इससे साफ होता है कि सैन्य कार्रवाई और राजनीतिक संदेश एक-दूसरे के साथ चल रहे हैं.
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हमलों का बढ़ता दायरा और रणनीतिक निशाने
इस बार के अमेरिकी हमलों में भौगोलिक बदलाव साफ दिखा. पहले हमले मुख्य रूप से ईरान के दक्षिणी तट पर केंद्रित थे, लेकिन अब उत्तर की ओर भी विस्तार हुआ है. रेलवे ब्रिज और परिवहन ढांचे भी निशाने पर आए. दक्षिण में बंदरगाह, तटीय सैन्य ठिकाने और समुद्री यातायात नियंत्रण सुविधाओं पर हमले जारी रहे.
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, करीब 90 सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया. इनमें एयर डिफेंस सिस्टम, मिसाइल और ड्रोन इंफ्रास्ट्रक्चर, नौसैनिक संपत्तियां और लॉजिस्टिक्स सुविधाएं शामिल हैं. रॉयटर्स ने बंदर अब्बास में हमलों की खबर दी, जबकि ईरानी मीडिया ने बुशहर, कोनारक, चाबहार, ईरान शहर और उत्तरी ईरान के दो रेलवे ब्रिजों पर हमलों की पुष्टि की.
ये निशाने कई स्तरों पर ईरान की रणनीतिक क्षमता को दबाने का संकेत देते हैं. बंदर अब्बास ईरान का सबसे बड़ा वाणिज्यिक बंदरगाह है. यहां आईआरजीसी नेवी की बड़ी सुविधाएं हैं. खार्ग द्वीप ईरान का मुख्य कच्चा तेल निर्यात टर्मिनल है. क़ेश्म, लावान और अबू मूसा होर्मुज के व्यस्त जलमार्गों की निगरानी करते हैं.
पूर्व की ओर सिरिक, जास्क, कोनारक और चाबहार तक हमले पहुंचे. चाबहार में समुद्री यातायात नियंत्रण टावर को नुकसान पहुंचने की खबर है. उत्तरी रेलवे ब्रिजों पर हमले से सैन्य सामग्री और जवानों की आवाजाही प्रभावित हुई. इससे साफ है कि अमेरिका सिर्फ समुद्री ताकत को नहीं, बल्कि ईरान की अंदरूनी लॉजिस्टिक्स को भी दबाना चाहता है.
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ईरान का जवाब और गल्फ में तनाव
ईरानी सरकारी मीडिया के अनुसार, तेहरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर जवाबी हमले किए. कतर में सैटेलाइट एंटीना, कुवैत में पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम और बहरीन में अमेरिकी ईंधन स्टोरेज सुविधा पर ड्रोन हमलों का दावा किया गया. हालांकि इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है.
CENTCOM ने इसे ईरान द्वारा सीजफायर का साफ उल्लंघन बताया. कहा कि हमले वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों का तत्काल जवाब थे. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अब इस टकराव का केंद्र बन गया है. दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा चोकपॉइंट पहले इतना चर्चा में नहीं था, लेकिन अब युद्ध का मुख्य मैदान बन चुका है.
बयानों की जंग: शब्दों का युद्ध
सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ दोनों पक्षों में बयानबाजी का युद्ध भी तेज है. ट्रंप ने NATO समिट से पहले ईरान के नेतृत्व को scum और sick people कहा. उन्होंने समझौते को ओवर बताया लेकिन कभी-कभी कहा कि ईरान डील करना चाहता है. ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर ईरान जारी रखा तो बहुत बुरा होगा.
ईरान की तरफ से संसद स्पीकर मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने अमेरिका पर MoU का बड़ा उल्लंघन करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि अमेरिका को अब समझ आ जाना चाहिए कि धमकी और वादाखिलाफी मुफ्त नहीं रहेगी. विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि धमकियों के तहत बातचीत नहीं होगी.
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ईरानी संसदीय राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के चेयरमैन ब्रिगेडियर जनरल इब्राहिम अजीजी ने साफ संदेश दिया – होर्मुज में नए ईरानी व्यवस्था को मान्यता दो. दोनों पक्ष समझौते के तहत बनी समितियों से बातचीत जारी रखने का दावा कर रहे हैं, लेकिन हर सैन्य कार्रवाई के बाद बयानबाजी से शांति की उम्मीद कम होती जा रही है.
युद्ध का विस्तार और भविष्य
यह टकराव दिखाता है कि सीजफायर औपचारिक रूप से है, लेकिन दोनों पक्ष जबरदस्ती से बात कर रहे हैं. अमेरिका होर्मुज में वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है, जबकि ईरान अपनी क्षेत्रीय ताकत और नियंत्रण बनाए रखना चाहता है.
रेलवे ब्रिजों जैसे अंदरूनी ठिकानों पर हमले से साफ है कि युद्ध अब सिर्फ समुद्री क्षेत्र तक सीमित नहीं है. ईरान की लॉजिस्टिक्स और सप्लाई लाइन को निशाना बनाया जा रहा है. वहीं ईरान गल्फ देशों में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना रहा है.
अनिश्चितता बरकरार
अमेरिका-ईरान टकराव में मिसाइलों, नक्शों और संदेशों का खेल जारी है. सीजफायर टूटने के कगार पर है. ट्रंप के अप्रत्याशित बयान और ईरान की सख्ती से कोई नहीं बता सकता कि अगला कदम क्या होगा. यह सिर्फ दो देशों का युद्ध नहीं है. पूरा क्षेत्र और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा इससे जुड़ी हुई है. फिलहाल सैन्य कार्रवाई और तीखी बयानबाजी दोनों जारी हैं, जिससे शांति की राह और मुश्किल होती जा रही है.
बिदिशा साहा