पाकिस्तान की कोशिश एक बार फिर नाकाम हो गई है. आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर और मंत्री मोहसिन नकवी की तेहरान यात्रा अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव को रोक नहीं पाई. पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच मध्यस्थता करने की कोशिश की थी, लेकिन दोनों पक्ष अपने रुख पर अड़े रहे. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव जारी है. अमेरिका-ईरान के बीच छोटे-छोटे सैन्य टकराव बढ़ते जा रहे हैं.
पाकिस्तान ने हाल के हफ्तों में अमेरिका और ईरान के बीच शांति स्थापित करने की कोशिश की. आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर और आंतरिक मंत्री मोहसिन नकवी तेहरान पहुंचे. वहां उन्होंने ईरानी नेताओं से मुलाकात की और अमेरिका के साथ सीधी बातचीत का प्रस्ताव रखा. पाकिस्तान का कहना था कि वह दोनों देशों के बीच विश्वसनीय मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है.
यह भी पढ़ें: बारिश कम कर सकती है नौतपा का ताप... आज से शुरू हो रहा मौसम का नया स्पेल, जानिए IMD का अलर्ट
पाकिस्तान की इस कोशिश के पीछे कई कारण थे. पाकिस्तान ईरान के साथ सीमा साझा करता है. दोनों देशों के बीच आर्थिक और सुरक्षा संबंध भी हैं. साथ ही, पाकिस्तान अमेरिका का पुराना सहयोगी रहा है. इस्लामाबाद को उम्मीद थी कि वह दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर ला सकेगा. लेकिन यह कोशिश पूरी तरह फेल हो गई.
अमेरिका-ईरान टकराव की पृष्ठभूमि
अमेरिका-ईरान के बीच तनाव कई साल पुराना है. हाल के महीनों में तनाव चरम पर पहुंच गया. ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने की धमकी दे रहा था, जबकि अमेरिका इसे दुनिया के तेल व्यापार के लिए खतरा मानता है.
अमेरिका ने ईरान के बंदर अब्बास समेत कई सैन्य ठिकानों पर हमले किए. ईरान ने जवाब में ड्रोन और मिसाइल हमलों की कोशिश की. ऐसे में पाकिस्तान ने मध्यस्थता का प्रस्ताव रखा. जनरल मुनीर की तेहरान यात्रा को इस कोशिश का हिस्सा माना जा रहा था, लेकिन अमेरिका ने साफ कर दिया कि वह ईरान पर दबाव बनाए रखेगा.
मुनीर-नकवी की तेहरान यात्रा क्यों फेल हुई?
जनरल आसिम मुनीर और नकवी की यात्रा के दौरान ईरानी नेताओं ने होर्मुज पर अपना नियंत्रण बनाए रखने और अमेरिकी प्रतिबंध हटाने की मांग दोहराई. पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल ने दोनों पक्षों को समझाने की कोशिश की कि युद्ध से कोई फायदा नहीं होगा. लेकिन अमेरिका ने पाकिस्तान की मध्यस्थता को पर्याप्त नहीं माना.
यह भी पढ़ें: ईरान के बंदर अब्बास पर ही बार-बार क्यों हमले कर रहा अमेरिका? होर्मुज से है कनेक्शन
अमेरिकी प्रशासन (ट्रंप सरकार) का रुख सख्त था. उन्होंने कहा कि जब तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय हमलों को नहीं रोकता, तब तक कोई समझौता संभव नहीं है. ईरान भी अपने रुख पर अडिग रहा. नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान की कोशिश बेनतीजा रही.
पाकिस्तान इस पूरे मामले में दोहरी मुश्किल में फंस गया है. एक तरफ ईरान उसके पड़ोसी देश के रूप में महत्वपूर्ण है, वहीं अमेरिका से आर्थिक और सैन्य सहायता भी मिलती रही है.
जनरल मुनीर की तेहरान यात्रा पाकिस्तान की सेना और सरकार की संयुक्त कोशिश थी, लेकिन कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला. पाकिस्तानी मीडिया और विश्लेषकों का कहना है कि इस असफलता से पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर सवाल उठ रहे हैं.
होर्मुज पर बढ़ता संकट
ईरान ने कई बार धमकी दी कि अगर अमेरिका ने दबाव बढ़ाया तो वह इस रास्ते को बंद कर देगा. अमेरिका ने जवाब में बंदर अब्बास और अन्य ठिकानों पर हमले किए. पाकिस्तान की मध्यस्थता फेल होने के बाद अब दोनों देशों के बीच टकराव और बढ़ सकता है.
इस टकराव का असर सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं है. भारत, चीन, यूरोप और अन्य देशों की तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. तेल की कीमतें बढ़ने से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा. पाकिस्तान की असफल मध्यस्थता से साफ हो गया है कि इस मुद्दे पर बड़े देश सीधे बातचीत करना चाहते हैं. पाकिस्तान जैसे मध्यस्थ देशों की भूमिका सीमित साबित हो रही है.
यह भी पढ़ें: क्या चीन की नेवी बनेगी दुनिया में सबसे मजबूत? जान लीजिए PLAN-9 क्या है
विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल पूर्ण युद्ध की संभावना कम है, लेकिन छोटे-छोटे टकराव जारी रह सकते हैं. अमेरिका ईरान पर दबाव बनाए रखना चाहता है, जबकि ईरान अपनी क्षेत्रीय ताकत दिखाना चाहता है. पाकिस्तान अब शायद अपनी कोशिशें कम कर देगा और स्थिति पर नजर रखेगा. चीन और रूस जैसे देश भी इस मुद्दे में अपनी भूमिका बढ़ा सकते हैं.
जनरल आसिम मुनीर और नकवी की तेहरान यात्रा पाकिस्तान की मध्यस्थता की आखिरी कोशिश थी, जो फेल हो गई. अमेरिका-ईरान टकराव रुकने के बजाय और गहराता जा रहा है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण की लड़ाई अब वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बन गई है. पाकिस्तान को अपनी कूटनीति पर फिर से विचार करना होगा.
ऋचीक मिश्रा