ट्रेन का टिकट लेकर सफर शुरू करने वाले यात्री के लिए देरी का मतलब सिर्फ कुछ मिनट या घंटे इंतजार करना नहीं होता. कई बार इसके साथ आगे की पूरी योजना बिगड़ जाती है, जरूरी काम छूट जाते हैं और घंटों स्टेशन या ट्रेन में ही गुजारने पड़ते हैं. अगर ऐसी देरी बहुत लंबी हो जाए और रेलवे इसकी ठोस वजह भी न बता पाए, तो क्या यात्री मुआवजे की मांग कर सकता है? झारखंड के एक मामले में कंज्यूमर कमीशन के फैसले ने इस सवाल को फिर चर्चा में ला दिया है.
मामला 23 सितंबर 2024 का है. संजय कुमार ने टाटानगर से संबलपुर जाने के लिए '12871 इस्पात एक्सप्रेस' में दो स्लीपर टिकट बुक किए थे. ट्रेन को सुबह 10:18 बजे टाटानगर से रवाना होना था और उसी दिन शाम 3:50 बजे संबलपुर पहुंचना था. लेकिन ट्रेन तय समय पर मंजिल तक नहीं पहुंची. संबलपुर पहुंचने में उसे 528 मिनट यानी करीब 9 घंटे की देरी हुई. इस लंबी देरी के बाद यात्री ने रेलवे के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का रास्ता अपनाया.
यात्री ने ₹4.50 लाख मुआवजा मांगा
संजय कुमार का कहना था कि ट्रेन की इतनी लंबी देरी की वजह से उन्हें शारीरिक, मानसिक और वित्तीय परेशानियों का सामना करना पड़ा. उन्होंने 8 अक्टूबर 2024 को साउथ ईस्टर्न रेलवे के सीनियर डिविजनल ऑपरेशंस मैनेजर को कानूनी नोटिस भेजा. बाद में उन्होंने कंज्यूमर कमीशन में केस दायर करते हुए ₹4.50 लाख मुआवजे की मांग की. अपने दावे के समर्थन में उन्होंने ट्रेन टिकट, कानूनी नोटिस और दूसरे दस्तावेज रिकॉर्ड पर रखे.
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रेलवे ने केस पर ही उठाए थे सवाल
साउथ ईस्टर्न रेलवे और ईस्ट कोस्ट रेलवे ने लिखित जवाब में यात्री के दावे का विरोध किया. रेलवे की ओर से कहा गया कि इस तरह के मामले की सुनवाई कंज्यूमर कमीशन के बजाय रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल में होनी चाहिए. रेलवे ने यह भी आपत्ति जताई कि टिकट आईआरसीटीसी से बुक किया गया था, लेकिन आईआरसीटीसी को मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया. इसके अलावा ट्रेन खड़गपुर डिविजन से भी गुजरती है, फिर भी संबंधित डिविजन को केस में शामिल नहीं किया गया. रेलवे ने सरकारी संस्था के खिलाफ मुकदमा करने से पहले 60 दिन का नोटिस देने की प्रक्रिया पूरी नहीं होने की दलील भी दी.
वित्तीय नुकसान का सबूत नहीं दिया
रेलवे की एक अहम दलील यह थी कि यात्री ने वित्तीय नुकसान साबित करने के लिए कोई दस्तावेज या दूसरी सामग्री पेश नहीं की. रेलवे के मुताबिक सिर्फ ट्रेन के देर से पहुंचने से वित्तीय नुकसान साबित नहीं होता. रेलवे ने यह भी कहा कि ट्रेन को सुरक्षित तरीके से चलाना, भले ही उसमें देरी हुई हो, अपने आप में सेवा में कमी नहीं माना जा सकता.
रेलवे की सभी दलीलें हो गईं खारिज
झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिला कंज्यूमर कमीशन ने 2 सितंबर 2026 को इस मामले में आदेश दिया. कमीशन ने रेलवे की ओर से उठाई गई आपत्तियों को खारिज कर दिया. अधिकार क्षेत्र के सवाल पर कमीशन ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों की सुनवाई कंज्यूमर कमीशन कर सकता है. कमीशन ने यह भी कहा कि यात्रियों को सिर्फ रेलवे अधिकारियों की दया पर नहीं छोड़ा जा सकता.
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देरी की वजह साबित नहीं कर सका रेलवे
कमीशन ने पाया कि रेलवे यह साबित नहीं कर सका कि ट्रेन की देरी ऐसी वजह से हुई थी जो उसके नियंत्रण से बाहर थी. यात्री की ओर से पेश टिकट और कानूनी नोटिस को रिकॉर्ड पर पर्याप्त माना गया. खास बात यह रही कि कमीशन ने अलग से वित्तीय नुकसान का दस्तावेज नहीं होने के बावजूद यात्री को हुई परेशानी को नजरअंदाज नहीं किया. आदेश में माना गया कि इतनी लंबी देरी से यात्री को उत्पीड़न और परेशानी हुई.
₹30,000 मुआवजा, ₹5,000 मुकदमा खर्च
कंज्यूमर कमीशन ने साउथ ईस्टर्न रेलवे और ईस्ट कोस्ट रेलवे को 45 दिनों के भीतर यात्री को ₹30,000 मुआवजा देने का आदेश दिया है. इसके अलावा ₹5,000 मुकदमे का खर्च भी देना होगा. अगर रेलवे 45 दिनों के भीतर यह रकम नहीं चुकाता है, तो आदेश की तारीख से भुगतान होने तक इस रकम पर 12 फीसदी सालाना ब्याज देना होगा.
आजतक बिजनेस डेस्क