आज की दुनिया में AI केवल एक सॉफ्टवेयर या ऐप नहीं है, बल्कि यह 21वीं सदी का सबसे बड़ा हथियार और ताकत बन चुका है. एक तरफ जहां वैज्ञानिक इसके खतरों को लेकर चिंतित हैं, वहीं दूसरी तरफ AI को लेकर अमेरिका और चीन के बीच तनातनी बढ़ती जा रही है, दोनों देशों के बीच आगे निकलने की होड़ मची हुई है.
दरअसल, अमेरिकी AI कंपनी एंथ्रोपिक (Anthropic) के CEO डारियो अमोडेई ने एक लेख के जरिये चेतावनी दी है कि जिस तरीके से दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है. लेकिन इसे सुरक्षित बनाने के नियम और तरीके पिछड़ रहे हैं. एक तरह से डारियो की हालिया रिपोर्ट ने आग में घी डालने का काम किया है.
उनका कहना है कि अगर AI के विकास की रफ्तार को थोड़ा धीमा करके सुरक्षा इंतजाम मजबूत नहीं किए गए, तो यह टेक्नोलॉजी भविष्य में इंसानों के लिए खतरनाक हो सकती है. सैम एल्टमैन (OpenAI) और एलॉन मस्क से बड़े उद्योगपतियों ने भी एंथ्रोपिक के CEO के सुझाव का समर्थन किया है. डारियो ने AI को लेकर खासकर तीन सलाह दी है.
1. बाहरी जांच: उन्होंने टेक कंपनियों को अपने AI मॉडल की जांच बाहर के स्वतंत्र विशेषज्ञों से करानी चाहिए ताकि कमियों का पता चल सके.
2. डेमोक्रेटिक कंट्री एकजुट हों: भारत, अमेरिका और यूरोप जैसे देशों की कंपनियों को मिलकर सुरक्षा के नियम तय करना चाहिए.
3. AI को लेकर वैश्विक सहमति जरूरी: दुनिया के अन्य देशों के साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एआई के नियम बनाए जाना चाहिए. चीन पर टेक प्रतिबंधों और चिप्स की सप्लाई पर निगरानी को और सख्त किया जाए.
चीन ने इस पर ऐतराज जताते हुए पलटवार किया है. चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने डारियो अमोडेई के सुझाव को सिरे से खारिज कर दिया है. चीन ने कहा है कि अमेरिका सुरक्षा का बहाना बनाकर चीन के तकनीकी विकास को रोकना चाहता है. चीन का मानना है कि यह अमेरिका की पुरानी चाल (Cold War Playbook) है, ताकि दुनिया की तकनीक पर सिर्फ उसका ही कब्जा रहे.
चीन का सीधा आरोप है कि अमेरिका अपनी कमजोरी छुपाने और चीन के AI को पीछे धकेलने के लिए सुरक्षा का नाटक कर रहा है. क्योंकि एंथ्रोपिक के सीईओ डारियो अमोडेई ने सुझाव दिया है कि केवल 'लोकतांत्रिक राष्ट्रों' को मिलकर नियम बनाना चाहिए, इस पर चीन का मानना है कि यह उसे वैश्विक एआई गवर्नेंस और वैश्विक टेक इनोवेशन से बाहर करने की साजिश है.
यही नहीं, चीन का कहना है कि जिस तरह 20वीं सदी में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच परमाणु हथियारों को लेकर 'शीत युद्ध' चला था. वाशिंगटन अब AI के क्षेत्र में वैसा ही साइलेंट कोल्ड वॉर शुरू कर रहा है.
AI को लेकर अमेरिका का नजरिया
वहीं अमेरिका का मानना है कि जो देश AI में नंबर-1 बनेगा, वही आने वाले समय में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, सेना और तकनीक पर राज करेगा. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कहा है कि अमेरिका AI की रेस में चीन से आगे है और वह इस बढ़त को किसी कीमत पर खोना नहीं चाहता है.
कैसे अमेरिका ने चीन को रोकने की कोशिश की?
AI को चलाने और प्रशिक्षित करने के लिए सुपर-एडवांस्ड कंप्यूटर चिप्स जैसे Nvidia की चिप्स की जरूरत होती है. अमेरिका ने चीन को ये चिप्स और उन्हें बनाने वाली मशीनें बेचने पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं, ताकि चीन के AI का विकास धीमा पड़ जाए. अमेरिका को डर है कि चीन इस एडवांस्ड AI का इस्तेमाल अपने सैन्य अभियानों, हैकिंग और जासूसी के लिए कर सकता है.
आजतक बिजनेस डेस्क