भारत ने फॉरेन डायरेक्ट इंवेस्टमेंट (FDI) पॉलिसी में जो बदलाव किए हैं, उसका शुरुआती असर सामने आने लगा है. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, नई व्यवस्था के तहत 29 निवेश प्रस्तावों के जरिए करीब ₹4,895 करोड़ का इंवेस्टमेंट भारत में आया है. यह बदलाव खास तौर पर उन निवेशकों के लिए अहम है, जिनका संबंध भारत के साथ लैंड बॉर्डर शेयर करने वाले देशों से है. मई में लागू हुए संशोधित एफडीआई नियमों के तहत कुछ सीमित और नॉन-कंट्रोलिंग हिस्सेदारी वाले इंवेस्टमेंट को सरकारी मंजूरी की जरूरत से बाहर रखा गया है.
क्या बदला FDI नियम में?
नई व्यवस्था के तहत अगर किसी निवेश में हिस्सेदारी नॉन-कंट्रोलिंग है और 10 फीसदी से ज्यादा नहीं है, तो उसे ऑटोमैटिक रूट के तहत निवेश की अनुमति मिल सकती है. इसका मतलब है कि ऐसे मामलों में निवेशक को पहले से सरकारी मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होगी. हालांकि, संबंधित सेक्टर की FDI सीमा और अन्य निर्धारित शर्तों का पालन करना अनिवार्य रहेगा. यह छूट सभी तरह के विदेशी निवेश पर लागू नहीं होती. इसका दायरा उन्हीं निवेश मामलों तक सीमित है, जो संशोधित नियमों में तय शर्तों को पूरा करते हैं.
2020 में क्यों कड़े किए गए थे नियम?
भारत ने 2020 में लैंड बॉर्डर शेयर करने वाले देशों से आने वाले विदेशी निवेश के लिए अपने FDI नियमों को सख्त किया था. इसका उद्देश्य ऐसे निवेशों की सरकारी स्तर पर ज्यादा जांच और निगरानी सुनिश्चित करना था. उस समय किसी निवेशक की बेनिफिशियल ओनरशिप का संबंध पड़ोसी देश से होने पर भी कई मामलों में सरकारी मंजूरी की जरूरत पड़ सकती थी. नई व्यवस्था में सीमित और नॉन-कंट्रोलिंग हिस्सेदारी के लिए कुछ राहत दी गई है. इससे ऐसे निवेशों के लिए प्रक्रिया पहले की तुलना में आसान हो सकती है.
IT से AI और फार्मा इंडस्ट्री में निवेश
सरकार के मुताबिक, नए नियमों के तहत आए निवेश प्रस्ताव कई अलग-अलग सेक्टरों से जुड़े हैं. इनमें सूचना प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मैन्युफैक्चरिंग, फार्मास्यूटिकल्स, डेटा सेंटर और ट्रांसपोर्ट सर्विसेज जैसे क्षेत्र शामिल हैं. इससे संकेत मिलता है कि संशोधित FDI नियमों का इस्तेमाल केवल किसी एक सेक्टर तक सीमित नहीं है, बल्कि अर्थव्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों में निवेश को आसान बनाने के लिए किया जा रहा है.
किन देशों से आए निवेश प्रस्ताव?
वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अनुसार, 29 निवेश प्रस्ताव मॉरीशस, अमेरिका, दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर, लक्जमबर्ग और केमैन आइलैंड्स में स्थित निवेशकों या इकाइयों से जुड़े हैं. यानी इन निवेश प्रस्तावों का स्रोत कई अलग-अलग देशों और ज्यूरिस्डिक्शन में फैला हुआ है. हालांकि, इस बदलाव पर सबसे ज्यादा चर्चा चीन के संदर्भ में हो रही है. भारत के साथ लैंड बॉर्डर शेयर करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में चीन सबसे बड़ा पड़ोसी देश है. इसलिए नई व्यवस्था को चीन से जुड़े संभावित निवेश के नजरिए से भी देखा जा रहा है.
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
नए नियमों के तहत नॉन-कंट्रोलिंग और 10 फीसदी तक की हिस्सेदारी वाले पात्र निवेशकों के लिए सरकारी मंजूरी की प्रक्रिया हटने से निवेश का रास्ता आसान और तेज हो हुआ है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसे निवेश पर कोई शर्त लागू नहीं होगी. निवेशकों को सेक्टोरल लिमिट समेत सभी निर्धारित नियमों का पालन करना होगा.
आजतक बिजनेस डेस्क