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पशुपालकों के लिए वरदान '1962': मौत से लड़ रहे घोड़े के बच्चे 'कबीर' के लिए बनी फरिश्ता, घर पहुंचा इलाज

1962 Animal Helpline: मध्यप्रदेश के खंडवा में 1962 पशु एंबुलेंस सेवा ने एक घोड़े के बच्चे 'कबीर' की जान बचाई. जहरीली दवा चाटने से मरणासन्न हुए कबीर को डॉ कौस्तुभ त्रिवेदी की टीम ने घर पहुंचकर नया जीवन दिया.

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जूं नाशक दवा चाटने से बेहाल था 'कबीर'.(Photo:ITG)
जूं नाशक दवा चाटने से बेहाल था 'कबीर'.(Photo:ITG)

मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में 'पशु चिकित्सा हेल्पलाइन 1962' ने अपनी उपयोगिता साबित की है. एक छोटी सी चूक के कारण जहर का शिकार हुए घोड़े के बच्चे 'कबीर' को इस टोल-फ्री सेवा ने मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया. पीड़ित परिवार ने प्रदेश सरकार और डॉक्टरों की टीम का भावुक आभार व्यक्त किया है. 

दरअसल, शहर के खानशाहवली इलाके निवासी सैयद वसीम रजा लगभग 5 माह पहले घोड़े का एक बच्चा लाए और उसका नाम 'कबीर' रखा. घर में बच्चे की तरह कबीर का लालन पालन हो रहा था, और घर के सभी सदस्य उसे बच्चे जैसा दुलार करने लगे. कुछ दिन पहले कबीर को जुएं पड़ गए. 

रविवार शाम को वसीम ने मेडिकल स्टोर से जूं नाशक दवा लाकर कबीर के शरीर पर दवा लगा दी. वसीम ने दवा तो लगा दी, लेकिन वह कबीर के मुंह को कवर करना भूल गया. कबीर ने अपने शरीर पर लगी जुंआ नाशक विषैली दवा चाटना शुरू कर दिया. कुछ ही देर में विषैली दवा ने असर दिखाया और कबीर को बैचेनी होने लगी और वह लोटपोट होने लगा और उसके मुंह से झाग आने लगा. घर के सदस्यों ने यह सब देखा, तो घबरा गए.

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वसीम को इसकी खबर लगी तो वह तुरंत घर आया और टोल-फ्री नंबर 1962 पर फोन लगाकर पशुओं के उपचार के लिए उपलब्ध शासन की एंबुलेंस सुविधा के लिए कॉल किया. कुछ ही देर में पशु चिकित्सक डॉ. कौस्तुभ त्रिवेदी अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे और उन्होंने अपना इलाज शुरू किया. 

डॉ. त्रिवेदी ने एंबुलेंस पैरावेट स्टॉफ सुश्री विधि पटेल और अटेण्डेंट नीलेश विश्वकर्मा के सामूहिक प्रयासों से लगभग आधे घंटे के उपचार के बाद कबीर को आराम मिलना शुरू हो गया और धीरे-धीरे वह बिल्कुल स्वस्थ हो गया. वसीम और उसका परिवार कबीर की जान बचाने के लिए पशु चिकित्सक डॉ. त्रिवेदी और उनके सहयोगी स्टॉफ की सराहना करते नहीं थकते हैं.

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