फ्यूचर मिल्क की चर्चा अहम बनती जा रही है. फ्यूचर मिल्क को केवल दूध के रूप में ही नहीं बल्कि दवाई के तौर पर भी देखा जा रहा है. इस वजह से उन पशुओं के पालन को बढ़ावा देने की भी कोशिश की जा रही है जो संख्या में घट रहे हैं. ऊंट और याक इसका बड़ा उदाहरण है. कुछ समय पहले नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनडीआरआई), करनाल, हरियाणा में भी फ्यूचर मिल्क को लेकर चर्चा हो चुकी है, और अगर अभी की बात करें तो आने वाली फरवरी में फ्यूचर मिल्क को लेकर एक बड़ी चर्चा होने जा रही है. 9 से 11 फरवरी तक ये चर्चा आनंद, गुजरात में की जाएगी.
नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) और इंटरनेशनल डेयरी फेडरेशन (आईडीएफ) मिलकर इस कार्यक्रम को आयोजित कर रहे हैं. एनिमल रिसर्च और डेयरी सेक्टर से जुड़े एक्सपर्ट का मानना है कि देश के कुछ प्राचीन पशु जिनका इस्तेमाल कई तरह के काम में किया जाता था उनकी संख्या अब घटने लगी है. ऐसे में उन्हें बचाने के लिए यह बेस्ट साबित हो सकता है. अगर उनके दूध की डिमांड बढ़ जाए तो पशुपालक उन्हें पालने में भी दिलचस्पी दिखाने लगेंगे.
नॉन बोवाइन के मुकाबले गाय-भैंस के दूध में कम मेडिसिनल वैल्यू होती है.
नॉन बोवाइन के मुकाबले गाय-भैंस पालन में लागत ज्यादा आती है.
बकरी, भेड़, ऊंटनी, गधी और याक के दूध में मेडिसिनल वैल्यू ज्यादा होती है.
भारत में नॉन बोवाइन की संख्या बढ़ रही है, इसलिए दूध इस्तेमाल करने पर जोर है.
नॉन बोवाइन का दूध और दूध से बने प्रोडक्ट इंसानी खानपान में जरूरी है.
गधी के दूध को फूड में शामिल करने के लिए NDRI ने FSSAI को लेटर लिख चुका है.
बेशक संख्या कम है, लेकिन फ्यूचर मिल्क में याक भी शामिल है.
जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में याक पालन किया जा रहा है.
याक के दूध से बने पनीर की देश से ज्यादा विदेशों में डिमांड है.
देश के कुछ प्राचीन पशुओं को बचाने की कोशिश की जा रही है. ऐसे पशुओं को बचाने के लिए एक मात्र रास्ता दूध है. दूध की डिमांड बढ़ जाए तो पशुपालक इन्हें पालने में भी दिलचस्पी दिखाएंगे. NDRI के डायरेक्टर डॉ. धीर सिंह का कहना है कि मानव स्वास्थ्य के लिए लिपिड, लैक्टोज, इम्युनोग्लोबुलिन, विभिन्न पेप्टाइड्स, न्यूक्लियोटाइड्स, ओलिगोसेकेराइड और मेटाबोलाइट्स आज की दौड़-भाग वाली जिंदगी और खानपान में बहुत फायदेमंद साबित हो सकते हैं. इनकी पूर्ति नॉन बोवाइन पशुओं के दूध से हो सकती है.