scorecardresearch
 

रबड़ी, आइसक्रीम, कुल्फी...सीताफल से ये प्रोडक्ट बनाते-बनाते किसान ने खड़ी की करोड़ों की कंपनी

महाराष्ट्र के पंढरपुर के राजकुमार आतकरे ने सीताफल का पल्प बनाने की फैक्ट्री को 35 हजार रुपये के डी फ्रिजर से शुरू किया था. ऐसा करते-करते उन्होंने करोड़ों के टर्नओवर की कंपनी खड़ी कर ली है.

Advertisement
X
सीताफल के प्रोसेसिंग से किसान ने खड़ी कर ली करोड़ों की कंपनी
सीताफल के प्रोसेसिंग से किसान ने खड़ी कर ली करोड़ों की कंपनी

देश के किसान अगर कृषि उत्पाद के साथ-साथ उसके प्रसंस्करण पर ध्यान दें तो बढ़िया मुनाफा कमा सकते हैं. ऐसा कर दिखाया है महाराष्ट्र के रहने वाले एक दंपति ने. राजकुमार आतकरे और उनकी पत्नी रानी आतकरे पहले सीताफल की खेती करते थे. बाजार में उपज का भाव सही नहीं मिलने से उन्हें काफी घाटा होता था. इसे देखते हुए उन्होंने सीताफल के प्रसंस्करण पर ध्यान देना शुरू किया. अपनी खुद की राजाराणी नाम का ब्रांड तैयार कर लिया है. वह खुद सीताफल रबड़ी, सीताफल आइसक्रीम, सीताफल कुल्फी, सीताफल बासुंदी जैसे प्रोडक्ट बनाकर बढ़िया मुनाफा कमा रहे हैं.

35 हजार रुपये से शुरू किया था सीताफल प्रसंस्करण का काम

राजकुमार आतकरे ने सीताफल का पल्प बनाने की फैक्ट्री को 35 हजार रुपये के डी फ्रिजर से शुरू किया था. अब उनका टर्नओवर करोड़ों का हो गया है. वह पोस्ट विभाग में नौकरी करते-करते अपने 10 एकड़ के खेत में खेती से जुड़े अलग-अलग प्रयोग कर रहे हैं. उनके खेत में सीताफल, आम, अमरूद, चीकू और  नारियल जैसे कई पेड़ हैं. 

ऐसे करते हैं सीताफल की खेती

राजकुमार ने 10X15  फीट की दूरी पर सीताफल के पौधे लगाए हैं. ताकि कम मैनपावर में ट्रैक्टर के सहयोग से काम किया जा सके. पानी की कमी के कारण उन्होंने ड्रीप इरिगेशन इंस्टॉल कराया है. इतना ही नहीं पानी का स्ट़ॉक रखने के लिए उन्होने अपने खेत एक बड़ा तालाब भी बनाया है. जिसका आकार 200 फीट X 200 फीट X 39 फीट है. जिसमे लगभग एक करोड़ लीटर पानी जमा हो सकती है. इसी पानी का इस्तेमाल वे आपने खेतों की सिंचाई के लिये करते है. राजकुमार सीताफल की खेती में रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करते हैं इशके कारण उनके फलों में मिठास अच्छी होती है. सोलापूर जिले का वातावरण भी सीताफल के खेती के लिये अनुकूल है जिससे यहां के सीताफल का स्वाद और बेहतर हो जाता है. 

Advertisement

कब राजकुमार सीताफल के प्रोसेसिंग का लिया फैसला?

राजकुमार आतकरे खेती बागवानी में अच्छी उपज हासिल कर रहे थे, पर जैसे ही उपज को लेकर बाजार में जाते, बाजार में उसकी कीमतें गिर जाती. पहली बार जब वो अपने सीताफल लेकर बाजार गए थे तो उन्हें 150 रुपये प्रति किलो की दर से दाम मिला था. पर जब दूसरी बार जब वो अपने उत्पाद लेकर बाजार गए तो उन्हें 30 रुपये प्रति किलो की दर से दाम मिला. पर इतने कम रेट पर उन्होंने अपने उत्पाद को नहीं बेचा औऱ उसे वो अपने घर ले आएं और उसे प्रसंस्कृत करने का फैसला किया.

बढ़ने लगा मुनाफा

राजकुमार आतकरे इसके बाद वे मोहोल कृषि विज्ञान केंद्र गये और स्थानीय वैज्ञानिक दिनेश क्षीरसागर से चर्चा के बाद सीताफल का पल्प बनाने का निर्णय लिया गया. उन्होंने मशीनरी खरीदी और पल्प बनाना शुरू किया.  इस प्रयोग के बाद पल्प को 300 रुपये प्रति किलोग्राम भाव मिला. यही सीताफल बाजार में पहले 30 रुपये प्रति किलो में बिकता था.

कई शहरों में खोला अपना आउटलेट

राजकुमार आतकरे ने सीताफल रबड़ी बनाना शुरू कर दिया, ओरिजिनल प्रोडक्ट होने के कारण कीमत भी अच्छी थी और उनकी रबड़ी मशहूर हो गई. इसके बाद उन्होंने सीताफल बासुंदी, सीताफल आइसक्रीम, कुल्फी आदि जैसे कई उत्पाद शुरू किए.उन्होंने बाजार में राजरानी ब्रांड के आउटलेट शुरू किए. अब उनके पास सोलापुर, पुणे में आउटलेट हैं. इस काम में उनका बेटा भी उनकी सहायता करता है हुए पूरी मार्केटिंग की जिम्मेंदारी संभालता है. 

---- समाप्त ----
रिपोर्ट: नितिन शिंदे
Live TV

Advertisement
Advertisement