दक्षिण भारत में जल्लीकट्टू सांडों की लड़ाई होती है. इसे खेल का दर्जा दिया गया है. ये सांड बेहद ताकतवर होते हैं. सांडों की ये लड़ाई जल्लीकट्टू थाई के तमिल महीने में शुरू होती है (जनवरी में शुरू होता है और फरवरी में समाप्त होता है). यह 4 महीने लगातार चलता है. इसका आयोजन राज्य के अलग-अलग हिस्सों में होता है. हालांकि, अलंगनल्लूर, पालामेडु और अवनियापुरम में होने वाली जल्लीकट्टू की लड़ाई सबसे ज्यादा मशहूर है.
क्या होती है जल्लीकट्टू सांडों
आपके दिमाग में ये जरूर आया होगा कि इन ताकतवर जल्लीकट्टू सांडों की डाइट क्या होगी. किसान तक के मुताबिक इन सांडों का ख्याल खास तरीके से रखा जाता है. इन्हें हरी घास खिलाई जाती है. दिन में कई बार इन सांडों को बाल्टी भर राइस ब्रान यानी कि चावल की भूसी या चोकर खिलाया जाता है.
कपास के बीज और मकई से बने चारे का बड़ा पैकेट जल्लीकट्टू के सांडों को खिलाया जाता है. जल्लीकट्टू सांडों की देखभाल करने वाली महिला चरवाहा सुंदरवल्ली कहती हैं कि इन सांडों को फौलादी ताकत की जरूरत है. ऐसे में हम इन्हें पोषण से भरा खाना देते हैं. पहला भोजन सुबह 9.30 बजे दिया जाता है. इस दौरान चावल की भूसी की एक पूरी, बड़ी बाल्टी में भरे चोकर और घास का रोल दिया जाता है. ताजा घास और भरपूर पानी भी इन सांडों को दिया जाता है. ऐसा दिन भर में दो से तीन बार निश्चित समयांतराल पर किया जाता है. शाम का भोजन हल्का होता है और यह सुबह और दोपहर में दिए जाने वाले भोजन का एक 'अच्छा कॉम्बो' होता है.
जल्लीकट्टू सांडों के व्यायाम पर भी रखा जाता है नजर
किसान तक के मुतााबिक, सांडों की कसरत का भी भरपूर ध्यान दिया जाता है. इन्हें लंबी सैर पर ले जाया जाता है. ऐसा करने से इन्हें भूख ज्यादा लगती है. पोषणयुक्त भोजन के चलते इन सांडों में फिर फौलादी ताकत आती है. फिर ये मैदान में उतरकर अन्य सांडों के खिलाफ अपना जलवा दिखा सकते हैं.