यांमार के पैट्रिक थॉ के लिए बचपन से अमेरिका में पढ़ाई करने का सपना था. मिशिगन विश्वविद्यालय में दाखिला मिलते ही उन्हें लगा कि उनकी ज़िंदगी की नई शुरुआत हो चुकी है. न्यूरोसाइंस के छात्र पैट्रिक ने 2023 में मिशिगन पहुंचकर कैंपस लाइफ में पूरे एनर्जी से हिस्सा लेना शुरू किया. वे रिसर्च लैब, बायोलॉजी फ्रैटरनिटी और कई अन्य कक्षाओं में एक्टिव रहे. उनके प्रोफेसर और दोस्त उन्हें एक जिज्ञासु, जोखिम लेने वाला और गहराई से सोचने वाला छात्र बताते हैं.
2025 की गर्मियों में उन्हें सिंगापुर में मेडिकल रिसर्च इंटर्नशिप मिली, जो उनके करियर के लिए अगला महत्वपूर्ण कदम था. लेकिन इस बीच डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने 12 देशों के नागरिकों पर ट्रैवल बैन लगा दिया, जिसमें म्यांमार भी शामिल था. इसका असर पैट्रिक की जिंदगी पर सीधे पड़ा. वे मानसिक रूप से मिशिगन में होने के बावजूद, शारीरिक रूप से सिंगापुर में फंसे रह गए.
वीजा अपॉइंटमेंट में रुकावट और सख्त नियमों के चलते वे अमेरिका वापस नहीं लौट पा रहे. यूनिवर्सिटी ने उन्हें ऑस्ट्रेलिया में स्टडी-अब्रॉड का विकल्प भी दिया, लेकिन अनिश्चितता के कारण उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया. अमेरिका उनके लिए सिर्फ पढ़ाई का केंद्र नहीं था, बल्कि गृहयुद्ध की हिंसा और असुरक्षा से बाहर निकलने का सुरक्षित जगह भी था.
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अब पैट्रिक ने हार मानने की बजाय नए रास्ते अपनाने का फैसला किया है. उन्होंने ऑस्ट्रेलिया और कनाडा की यूनिवर्सिटियों में दाखिले के लिए आवेदन किया है. उनका सपना है कि वे कम से कम उत्तर अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई जारी रख सकें, ताकि अपने दोस्तों और सपनों से जुदा न हों. पैट्रिक की कहानी उस लाखों छात्रों की है, जिन्हें राजनीतिक फैसलों के कारण अपने सपनों से दूर रहना पड़ रहा है.