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श्रीलंका जैसे ही ये 7 देश भी हो गए थे तबाह, जानिए इन डिफॉल्टर मुल्कों के लोगों के सामने क्या-क्या संकट आए

श्रीलंका में आर्थिक दिवालियापन के हालात ने भारत के इस पड़ोसी देश को हिंसा की आग में झोंक दिया है. आटा-दूध जैसे जरूरी सामानों की कीमत हजारों-हजार में पहुंच गई है. चारों ओर लूटपाट-आगजनी हो रही है. लोग सड़कों पर हैं. ऐसी स्थिति सिर्फ श्रीलंका में ही नहीं इससे पहले कई और देशों में भी आ चुकी है जब इकोनॉमी के दिवालिया होने के कारण जनता में हाहाकार मच चुका है.

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श्रीलंका में आटा-दूध जैसे जरूरी सामानों की कीमत हजारों-हजार में पहुंच गई. श्रीलंका में आटा-दूध जैसे जरूरी सामानों की कीमत हजारों-हजार में पहुंच गई.
स्टोरी हाइलाइट्स
  • दिवालिया हो चुके श्रीलंका में हिंसा और अराजकता के हालात
  • सरकार के खिलाफ शहर-शहर हिंसा, सड़कों पर उतरे लोग
  • वेनेजुएला-ग्रीस-मैक्सिको जैसे कई देश दिवालिएपन का कर चुके हैं सामना

आसमान छूती महंगाई, अनाज-दूध जैसी जरूरी सामानों की किल्लत, दुकानों पर लंबी-लंबी लाइनें, डिपार्टमेंटल स्टोर्स पर लूटपाट, राजनीतिक लड़ाई-हिंसा, सरकार विरोधी प्रदर्शन और शहर-शहर दंगों की आग में झुलस रहे पड़ोसी देश श्रीलंका के हालात ने दुनियाभर के लोगों को चिंता में डाल दिया है. गलत आर्थिक फैसलों, सस्ते ब्याज, मुफ्त की स्कीमों और 50 बिलियन डॉलर के विदेशी कर्ज के जाल में फंसा श्रीलंका दिवालिया होने की कगार पर है. इस संकट की स्थिति में जनता की उम्मीदें खत्म हो रही हैं. लोग सरकार के खिलाफ सड़कों पर हैं. प्रधानमंत्री का इस्तीफा हो चुका है. सांसदों-मंत्रियों और शहरों के मेयर्स के घरों पर लगातार हमले हो रहे हैं. जगह-जगह हिंसक भीड़ पर सेना गोलीबारी कर रही है. 1948 में आजाद हुए श्रीलंका के सामने इस तरह का संकट पहली बार सामने आया है.

कैसे श्रीलंका संकट में फंसा?

पिछले दो साल से जारी कोरोना संकट के बीच लगातार बढ़ते विदेशी कर्ज और 2019 में चुनावी वादा निभाने के लिए टैक्स घटाने के राजपक्षे सरकार के फैसले ने श्रीलंका को इस संकट की ओर ढकेल दिया. आटा-दूध-दवाइयों की कीमतें हजारों-हजार तक पहुंच चुकी हैं. इतनी कीमत के बावजूद भी सामान मिलना जब मुश्किल हो गया तो लोग हिंसा पर उतर आए. डिपार्टमेंटल स्टोर्स-मॉल्स और दुकानों में लूट का सिलसिला शुरू हो गया. लगातार जरूरी सामानों की कीमतें बढ़ती गईं, कर्ज भी बढ़ता गया और फिर श्रीलंका और वहां के लोग इस हालात में फंस गए कि न तो जरूरी सामान की कीमतें पूरी हो पाईं न ही विदेशी कर्ज को बढ़ने से रोकने का कोई उपाय दिखा. 12-12 घंटे बिजली कटौती होने लगी. इंफ्लेशन 17 फीसदी से ऊपर पहुंच गया. बाहर से आयात करने के लिए फॉरेन करेंसी खत्म हो गया और निवेशक-पर्यटक देश से दूर होने लगे.

आर्थिक संकट के खिलाफ प्रदर्शन कर रही महिला पर सरकार समर्थित लोगों ने हमला कर दिया.

इस संकट ने लोगों को वेनेजुएला और ग्रीस के दिवालिया संकट की याद दिला दी है जब एकदम से इन देशों का सिस्टम फेल हो गया और जनता को अराजकता के हालात का सामना करना पड़ा. करेंसी की वैल्यू एकदम से जीरो हो गई और लोगों के घरों में रखे पैसे कागज के ढेर बन गए. एक-एक किलो अनाज के लिए लोगों को हजारों-लाखों रुपये चुकाने पड़े और लोग एकदम से बेहाल हो गए. केवल यही देश नहीं इतिहास को अगर टटोलें तो एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका-रूस जैसे देशों को भी अतीत में दिवालियापन के हालात का सामना करना पड़ा था और रातोरात लोगों को संकटों का सामना करना पड़ा.

1. वेनेजुएला में जब नोट हो गए कबाड़!

वेनेजुएला में 2017 में शुरू हुए आर्थिक संकट ने देश को दिलाविया घोषित करा दिया. विदेशी कर्ज और गलत आर्थिक नीतियों ने करेंसी का हाल इतना बुरा कर दिया कि सरकार को 10 लाख बोलिवर का नोट तक छापना पड़ा. करेंसी की वैल्यू इतनी खराब हुई कि एक-एक कप कॉफी के लिए लोगों को 25-25 लाख बोलिवर तक की कीमत चुकानी पड़ी. 500 ग्राम बोनलेस चिकन की कीमत 2.94 डॉलर, 12 अंडों के लिए 2.93 डॉलर तक लोगों को चुकाना पड़ा. भारत से अगर तुलना करें तो 12 अंडों के लिए आपको 1.08 डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. एक किलोग्राम टमाटर के लिए 1.40 डॉलर तक लोगों को चुकाने पड़े. लोगों को दूध-आटा जैसे सामानों के लिए बोरे में भर भरकर नोट चुकाने पड़े.

2. अर्जेंटीना जब अचानक हो गया कंगाल

साल 2020 के जुलाई महीने में अचानक दक्षिण अमेरिकी देश अर्जेंटीना कंगाली की कगार पर पहुंच गया. विदेशी निवेशक अपने निवेश किए बॉन्ड के 1.3 बिलियन डॉलर पूरे वापस मांगने लगे. बैंकों और वित्तीय संस्थाओं ने इस कर्ज को वापस करने से साफ हाथ खड़े कर दिए. अर्जेंटीना ने खुद के इस हालात के लिए अमेरिका को दोषी ठहरा दिया. लोगों के लिए महंगाई का सामना करना मुश्किल हो गया. साल 2001-02 में भी अर्जेंटीना दिवालियापन के हालात से जूझ चुका था. जैसे-तैसे इकोनॉमी के हालात संभले थे कि फिर स्थिति बिगड़ जाने से आम जनता के लिए रोजमर्रा के सामानों की महंगाई को झेलना मुश्किल हो गया.

3. 2012 के ग्रीस संकट ने जब लोगों को भुखमरी की कगार पर पहुंचा दिया

पिछले दशक में इस दुनिया ने रातोरात ग्रीस को दिवालिया होते देखा. 2001 में अपनी करेंसी की जगह यूरो को अपनाने के बाद से ग्रीस की इकोनॉमी लगातार संकट में फंसती चली गई. सरकारी कर्मचारियों के वेतन बढ़ने और लगातार बढ़ते सरकारी खर्च ने 2004 आते-आते सरकारी खजाने को भारी कर्ज में डूबा दिया. 2004 के एथेंस ओलंपिक के आयोजन के लिए किए गए 9 बिलियन यूरो के खर्च ने सरकार को महासंकट में फंसा दिया.

इसके बाद साल 2008 से दुनिया में आई आर्थिक मंदी ने ग्रीस को कर्ज और महंगाई के जाल में फंसा दिया. लोगों के रोजगार छिन गए, शेयर बाजार क्रैश कर गया, पर्यटन स्थल बंद होने लगे, विदेशी पर्यटक और निवेशक दोनों देश से दूर हो गए. सरकार के पास न तो लोगों को राहत देने का कोई उपाय बचा और न ही कर्ज के जाल से मुक्ति की कोई राह बची. भुखमरी की कगार पर पहुंच गए लोगों को उस हालात से निकलने में कई साल लगे. यूरोपीय यूनियन से मिले बेलआउट पैकेज के जरिए घिसट-घिसटकर कई साल लगे ग्रीस में हालात को सामान्य होने में.

4. आइसलैंड के बैंक जब बन गए इकोनॉमी के लिए मुसीबत

2008 में नॉर्डिक देश आइसलैंड के तीन बैंक 85 बिलियन डॉलर का कर्ज डिफॉल्ट कर गए. बैंकों के दिवालिएपन ने देश की इकोनॉमी को एकदम से हिला दिया. करेंसी के लिए संकट के हालात पैदा हो गए. लोगों के रोजगार छिनने लगे, लोन चुकाने में लोग फेल होने लगे, बाजार में बढ़ी महंगाई ने लोगों को मंदी के हालात से दो-चार करा दिया. 50 हजार से अधिक लोगों की सेविंग खत्म हो गई, दूसरी ओर रोजगार का संकट अलग से खड़ा हो गया.

इस संकट की शुरुआत तब हुई थी जब उदारीकरण के फैसले के तहत प्राइवेट बैंकों को कई तरह की छूट दी गई. प्राइवेट बैंकों ने कम गारंटी और आसान शर्तों पर लोगों को खूब लोन बांटा लेकिन 2008 की आर्थिक मंदी शुरू होते ही जब रोजगार का संकट पैदा हुआ तो लोगों की ओर से कर्ज वापसी बंद सी हो गई. ऐसे में एक-एक कर बैंक दिवालिया होते चले गए. लेकिन आइसलैंड ने एक कड़ा फैसला किया जिससे कई साल बाद फिर हालात संभलने लगे. आइसलैंड की सरकार ने जनता के टैक्स के पैसे से बैंकों को डूबने से बचाने की बजाय बैंकों को खुद इस हालात से निपटने को छोड़ दिया. इससे जनता पर नया बोझ नहीं आया और हालात साल 2013 आते आते संभलते दिखने लगे.

5. रूस जैसा देश भी जब कंगाली की कगार पर था

1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद कई सालों तक रूस पर लगातार कर्ज का बोझ बढ़ता गया और 1998 आते-आते दिवालिएपन के हालात पैदा हो गए. करेंसी का अवमूल्यन करना पड़ा यानी कीमत घटानी पड़ी. डिफॉल्ट की स्थिति आते ही एकाएक विदेशी मुद्रा भंडार को 5 बिलियन डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा, शेयर्स धड़ाम हो गए और शेयर बाजार क्रैश हुआ तो संभालने के लिए उसे बंद करना पड़ा. आम लोगों के लिए रोजगार-लोन और जरूरी सामान जुटाने के हालात को संभालना मुश्किल होता चला गया. केवल रूस में नहीं इसका असर एशिया के बाजारों, अमेरिका, यूरोप और बाल्टिक देशों तक भी हुआ.

6. मैक्सिको में करेंसी के अवमूल्यन ने जब बिगाड़ दिया था गेम

1994 में मैक्सिको की सरकार ने डॉलर के मुकाबले अपनी करेंसी का 15 फीसदी तक अवमूल्यन किया. इससे हालात एकाएक बिगड़ गए. विदेशी निवेशकों में हलचल मच गई, वे अपना निवेश का पैसा मैक्सिको की मार्केट से वापस निकालने लगे, शेयरों को बेचने लगे. इस संकट में जीडीपी में 5 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई. देश को 80 बिलियन डॉलर तक का कर्ज लेना पड़ा. आईएमएफ, कनाडा, अमेरिका और लैटिन अमेरिकी देशों ने मैक्सिको को इस संकट से उबारने के लिए बेलआउट पैकेज दिया तब जाकर मैक्सिको और आसपास के देशों के आर्थिक संकट के हालात को संभालने में मदद मिली.

7. ...जब अमेरिका के 19 राज्य डिफॉल्ट की कगार पर थे

अमेरिका में 1840 के दशक में नहरों के निर्माण के लिए बड़े प्रोजेक्ट्स की शुरुआत हुई. इसके लिए 80 मिलियन डॉलर तक का कर्ज लेकर सरकारों ने खर्च किया. इसके बाद आर्थिक संकट का जो सिलसिला शुरू हुआ वो अमेरिका के 19 राज्यों को कर्ज के जाल में फंसा गया. Illinois, Pennsylvania और Florida जैसे राज्य कर्ज के जाल में थे.  इसके अलावा नए बैंकों की स्थापना के लिए भी सरकारी पूंजी का इस्तेमाल इस संकट को बढ़ा रहा था. कर्ज की वसूली के लिए व्यापारिक प्रतिबंधों का दौर शुरू हुआ और लोगों पर इसका काफी बुरा असर हुआ.

 

आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका में जगह जगह हिंसा हो रही है.

अब दुनिया आर्थिक दिवालियापन का ताजा संकट जो श्रीलंका में देख रही है उससे उबारने में तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं खुद को असहाय महसूस कर रही हैं. श्रीलंका का ये ताजा संकट कहां और कैसे जाकर रुकेगा ये तो कहना मुश्किल है लेकिन करेंसी के बुरे हाल, रोजगार, निवेश और अर्थव्यवस्था को लेकर हालात इतनी जल्दी सामान्य होना आसान नहीं दिखता. भारत ने संकट में फंसे पड़ोसी देश श्रीलंका को उबारने के लिए अनाज और बिजली उत्पादन समेत कई परियोजनाओं में मदद दी है लेकिन IMF जैसी विदेशी संस्थाएं भी इस हालात में श्रीलंका को ज्यादा कर्ज देने की स्थिति में नहीं दिख रही है. बढ़ता विदेशी कर्ज इस हाल में ले आया है कि विदेशी निवेशकों को भी इस देश के सिस्टम पर भरोसा करने में अब लंबा वक्त लगेगा. देश के कारोबार और बैंकों की हालत तो पहले से ही खराब है.

 

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