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Russia-Ukraine Conflict: रूस-अमेरिका के कोल्ड वॉर में पिस गए ये 7 देश, Ukraine का भी हाल ऐसा ही ना हो जाए...

Russia-Ukraine Conflict पर पूरी दुनिया की निगाहें हैं. रूस के एक लाख तीस हजार सैनिक यूक्रेन की सीमा पर तैनात हैं. किसी भी हमले का जवाब देने के लिए अमेरिका और नाटो की सेना ने भी यूरोप में तैनाती बढ़ा दी है. रूस-अमेरिका के बीच तनाव के कारण पिछले कुछ दशकों में कई देशों को भारी नुकसान हुआ है. लोगों को आशंका है कि अगर जंग छिड़ी तो तीसरे विश्व युद्ध की आशंका बन सकती है.

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यूक्रेन में आए दिन रूस के खिलाफ इस तरह के प्रदर्शन होते रहते हैं.
यूक्रेन में आए दिन रूस के खिलाफ इस तरह के प्रदर्शन होते रहते हैं.
स्टोरी हाइलाइट्स
  • यूक्रेन पर रूसी हमले की आशंकाओं से पूरी दुनिया सतर्क
  • अमेरिका और नाटो देशों ने भी जंगी बेड़े तैनात किए
  • 1950 के दशक से जारी कोल्ड वॉर के शिकार हुए कई देश

एक मशहूर कहावत है कि 'जब एक बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है'... दो विश्वयुद्ध देख चुकी दुनिया आज कुछ इसी तरह के भय से फिर आशंकित है. दुनिया की दो बड़ी महाशक्तियों अमेरिका और रूस में पिछले कुछ सालों से बढ़े तनाव का असर अब दिख रहा है पूर्वी यूरोप के देश यूक्रेन को लेकर. जिसकी सीमा पर एक लाख 30 हजार रूसी सैनिक डेरा डाले हुए हैं. वहां तैनात तोप-लड़ाकू विमानों और जंग के अत्याधुनिक हथियारों की तस्वीरें पूरी दुनिया में चर्चा का कारण बनी हुई हैं. कभी भी जंग शुरू हो जाने के आसार जताए जा रहे हैं और जवाबी कार्रवाई के लिए यूक्रेन के पक्ष में अमेरिका की अगुवाई वाले NATO की सेना ने भी पूर्वी यूरोप में मोर्चाबंदी बढ़ा दी है. दोनों ओर से जंगी जहाजों से लेकर वॉरशिप तक की तैनाती ने पूरी दुनिया को एक और वर्ल्ड वॉर की आशंकाओं से थर्रा कर रख दिया है.

आज यानी 16 फरवरी का दिन इसलिए भी अहम है क्योंकि अमेरिका ने खुफिया जानकारी के आधार पर कहा था कि रूस सीक्रेट रूप से 16 फरवरी को ही यूक्रेन पर हमले की तैयारी में है. अमेरिका-ब्रिटेन समेत तमाम देशों ने यूक्रेन से अपने नागरिकों को हटने का फरमान सुना दिया. लेकिन जंग की आशंकाओं के बीच रूस की ओर से ये खबर आई है कि रूसी सेना की एक टुकड़ी यूक्रेन सीमा से अपने बेस की ओर लौट आई है. अब युद्ध की आशंकाएं और जंग टलने की संभावनाओं दोनों पर पूरी दुनिया की निगाहें हैं.

जंग का असर पूरी दुनिया पर होगा

रूस के बाद यूक्रेन यूरोप में क्षेत्रफल के हिसाब से दूसरा सबसे बड़ा देश है. अगर यूक्रेन को लेकर जंग हुई तो भारत समेत कोई भी देश इसके नुकसान से बच नहीं सकेगा. कारोबार, तेल सप्लाई, कोरोना वैक्सीन सप्लाई से लेकर तमाम तरह के काम दुनिया भर में प्रभावित होंगे. इन आशंकाओं के बीच सेंसेक्स समेत दुनिया भर के शेयर बाजारों में पिछले कई दिन से भारी गिरावट का दौर भी देखा जा रहा है. दो देश या कुछ देश भले जंग लड़ें लेकिन आज के वैश्विक युग में कोई भी देश उसके कुप्रभाव से अछूता नहीं रह सकेगा. अमेरिका और रूस जैसी महाशक्तियों के टकराव का केंद्र बने देशों का क्या होता है इसे जानने के लिए इतिहास के कुछ पन्ने पलटने की जरूरत है. 1945 में दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद शुरू हुए कोल्ड वॉर में कई देशों का हाल बेहाल हो गया. जानिए क्या हुआ उन देशों का जो पिछले 7 दशकों में इन दोनों महाशक्तियों की जंग या इनके बीच तनाव का अखाड़ा बने...

1. क्रीमिया पर कब्जा

महाशक्तियों की लड़ाई का इससे पहले का सबसे ताजा उदाहरण है क्रीमिया. 2014 में रूस ने हमला करके यूक्रेन के इस हिस्से को अलग कर दिया था. रूस ने क्रीमिया पर यह कहते हुए कब्जा कर लिया था कि उस प्रायद्वीप पर उसका ऐतिहासिक दावा रहा है. इसका कारण था कि यूक्रेन में 2014 में रूस समर्थक राष्ट्रपति को उनके पद से हटा दिया गया था. उससे नाराज होकर रूस ने दक्षिणी यूक्रेन के क्रीमिया प्रायद्वीप को अपने कब्जे में ले लिया. इस विवाद का इतिहास भी लंबा है. 1954 में रूसी आबादी वाले क्रीमिया को रूस से यूक्रेनी सोवियत गणराज्य में स्थानांतरित कर दिया गया था. पहले पूर्वी यूक्रेन और क्रीमिया की अधिकांश आबादी रूसी थी, जिनका रूस के प्रति लगाव बना रहा. और यही मुख्य कारण रहा कि रूस को क्रीमिया पर कब्जा करने में किसी विरोध का सामना नहीं करना पड़ा.

2. कोरिया का विभाजन

1945 में दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के साथ ही रूस और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव और वर्चस्व की लड़ाई का पहला नतीजा दुनिया ने देखा कोरिया के विभाजन के साथ. कई सालों तक चले युद्ध के बाद जिसमें एक तरफ अमेरिका की सेनाएं भी शामिल थीं तो दूसरी ओर से रूस और चीन ने दखल दी. 1953 में देश दो हिस्सों में विभाजित हो गया. कम्युनिस्ट विचारधारा के साथ बने उत्तर कोरिया में तब से तानाशाही शासन है और वहां के लोग किस हाल में हैं इस बारे में दुनिया को कुछ ज्यादा पता नहीं है. दूसरी ओर अमेरिका के पूंजीवादी व्यवस्था के साथ आए दक्षिणी हिस्से के लोगों को दक्षिण कोरिया नामक देश मिला.

तब से अब तक के इन 70 सालों में न तो कोरिया के इन दोनों देशों में तनाव कम हुआ है और न ही हथियारों की होड़ खत्म हुई है. आज भी उत्तर कोरिया के पक्ष में रूस और चीन खड़े हैं तो दक्षिण कोरिया की सुरक्षा के लिए अमेरिकी सैनिक तैनात हैं. उत्तर कोरिया पर कई तरह के प्रतिबंध लगे हुए हैं जिस कारण वहां के लोगों का जीवन बेहाल है.

रूस-यूक्रेन विवाद

3. चेकोस्लोवाकिया की जंग

कोल्ड वॉर के दौरान कम्युनिस्ट रूस और पूंजीवादी अमेरिका के बीच असल जंग इस बात की थी कि दुनिया के कितने देश किसके गुट में शामिल हो जाएं. 1968 में जब चेकोस्लोवाकिया ने कम्युनिस्ट विचारधारा से अलग हटकर आर्थिक सुधारों की बात की तो फिर दोनों गुटों में तनाव बढ़ गया. वॉरसा पैक्ट से अलग होने और कम्युनिस्ट विचारधारा के खिलाफ साजिश का आरोप लगाकर 20 अगस्त 1968 को रूस ने सोवियत गुट के बाकी देशों के साथ मिलकर चेकोस्लोवाकिया पर हमला कर दिया. इस हमले के कारण 3 लाख से अधिक चेक और स्लोवाक लोग घर-बार छोड़कर भागने को मजबूर हुए. इस जंग ने पूर्वी यूरोप को अखाड़ा बना दिया रूस और अमेरिका के बीच शीत युद्ध का. इसके बाद यूगोस्लाविया, सर्बिया, क्रोएशिया जैसे कई देश एक-एक कर मैप में बंटते गए और इन सबका कारण था अमेरिका और रूस का तनाव.

4. क्यूबा मिसाइल क्राइसिस

अमेरिका के सबसे करीब बसे कम्युनिस्ट देश क्यूबा का संकट दुनिया कैसे भूल सकती है. 1960 के दशक की शुरुआत में जब रूस ने क्यूबा में मिसाइलें तैनात कर दीं तो अमेरिका ने इसे अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए बदले की कार्रवाई शुरू कर दी. तनाव बढ़ने के बाद रूस ने मिसाइलें भले ही हटा लीं लेकिन आज भी क्यूबा अमेरिका और रूस समर्थित ताकतों के बीच वर्चस्व कायम करने की जंग का अखाड़ा बना हुआ है. वहां रूस समर्थिक कम्युनिस्ट सरकार है और हजारों विपक्षी लोकतंत्र समर्थक नेता जिनका समर्थन अमेरिका करता है वे या तो देश से बाहर शरण लिए हुए हैं या जेलों में बंद हैं. खुफिया मिशनों को लेकर लगातार आरोप लगते ही रहते हैं. अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण यहां की इकोनॉमी का हाल बेहाल है.

5. बेहाल-बदहाल अफगानिस्तान

एशिया में अगर देखा जाए तो अफगानिस्तान अमेरिका और रूस के बीच दशकों से जारी कोल्ड वॉर का सबसे बड़ा शिकार है. 1970 के दशक में यहां रूसी समर्थन से सरकार चल रही थी तो उसे उखाड़ने के लिए और एशिया में अड्डा जमाने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को जरिया बनाया और वहां तालिबान जैसी ताकत को जन्म दिया गया. जिसके जरिए 1990 के दशक में अमेरिका रूस समर्थक सत्ता को उखाड़ फेंकने में कामयाब भी रहा.

लेकिन वही तालिबान बाद में अमेरिका के लिए संकट बन गया. 9/11 के हमले के बाद उसी अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया और तालिबान को उखाड़ फेका. 21 साल बाद फिर वही तालिबान रूस-चीन के सपोर्ट के साथ पलटवार करता है और पिछले साल यानी 2021 की 15 अगस्त से अफगानिस्तान फिर तालिबान के शासन की क्रूरता को झेल रहा है. हजारों-लाखों लोगों को तालिबान के खौफ से बचकर भागते हाल के महीनों में पूरी दुनिया ने देखा.

6. वियतनाम भी बना कोल्ड वॉर का अखाड़ा

एशिया में अमेरिकी वर्चस्व कायम करने के लिए 1960 के दशक की शुरुआत से पश्चिमी देश लगातार सैनिकों की तैनाती बढ़ाते गए और एक समय तो ऐसा आ गया कि सिर्फ वियतनाम में ही 1 लाख 80 हजार से अधिक अमेरिकी सैनिक तैनात हो गए थे. रूस-चीन के प्रभाव वाले उत्तरी वियतनाम के इलाकों में अमेरिकी मौजूदगी के खिलाफ बगावत शुरू हुई और देखते-देखते इसने वियतनाम युद्ध का रूप ले लिया. अगले कई साल तक वियतनाम को अमेरिकी हमलों और बमबारी का सामना करना पड़ा. अगले कई साल तक वियतनाम दोनों गुटों की जंग का अखाड़ा बना रहा और आखिरकार अमेरिकी सैनिकों की वापसी के साथ ही ये जंग थमी. लाखों लोगों पर इस जंग की तबाही का असर हुआ. लेकिन आज भी ये देश उस तबाही को नहीं भूल पाया है.

रूस-यूक्रेन विवाद

7. हंगरी पर हमले ने लाखों लोगों को बेघर कर दिया था

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद कई देशों में रूसी तानाशाह स्टालिन के समर्थकों की सरकारें बनीं. इनके खिलाफ अमेरिकी गुट भी वर्चस्व की जंग में कूद पड़ा. इसका अखाड़ा 1950 के दशक में हंगरी बना. जहां रूस के वर्चस्व को कम होते देख सोवियत संघ रूस ने 1956 में हंगरी में सेना घुसा दी थी. समर्थकों की सरकार को हटाने के खिलाफ हुए रूसी एक्शन में दूसरे गुट के हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया, उन्हें जेलों में डाल दिया गया. सोवियत जेलों में हजारों लोगों को ले जाकर बंद कर दिया गया. 2 लाख से भी अधिक लोग इस जंग के कारण घर-बार छोड़कर भाग गए.

...और अब यूक्रेन का महासंकट

यूक्रेन के ताजा संकट को समझने के लिए जरूरी है ये जानना कि हमले की तैयारी के पीछे रूस आखिर चाहता क्या है? दरअसल रूस की ओर से यूक्रेन की घेराबंदी पिछले दो महीने से बढ़ गई है. रूसी राष्ट्रपति पुतिन लंबे समय से दावा करते आए हैं कि अमेरिका ने नब्बे के दशक में वादा किया था कि सुदूर पूर्व में NATO का विस्तार नहीं होगा, लेकिन अमेरिका ने अपना यह वादा तोड़ दिया है. चार ऐसे देश हैं जिनकी सीमाएं रूस से लगती हैं और वे पहले रूसी गुट का हिस्सा थे- पोलैंड, लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया. लेकिन ये देश अब NATO का हिस्सा हैं. रूस अपनी सीमा पर नैटो की मौजूदगी को इस हद तक बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है. रूस का आरोप है कि इन देशों के जरिए नैटो अपनी सैन्य ताकत और सैन्य उपकरण हमारी सीमा के पास जुटा रहा है.

यूक्रेन में रूस समर्थक सरकार अब नहीं है और वह किसी भी सूरत में नहीं चाहता कि यूक्रेन भी नैटो का सदस्य बन जाए. ताजा तनाव के पीछे ये सबसे बड़ा कारण बताया जा रहा है. यूक्रेन की सीमा पश्चिम में यूरोपीय देशों और पूर्व में रूस के साथ लगती है. नेटो देशों पर रूस का आरोप है कि वे यूक्रेन को लगातार हथियारों की आपूर्ति कर रहे हैं और अमेरिका दोनों देशों के बीच के तनाव को भड़का रहा है. रूस चाहता है कि नैटो की सेनाएं 1997 के पहले की तरह सीमाओं पर लौट जाए. अगर इस बात की सहमति बनती है तो नैटो को पोलैंड और बाल्टिक देशों एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया से अपनी सेनाएं वापस बुलानी होगी. साथ ही पोलैंड-रोमानिया जैसे देशों में भी वह अपनी मिसाइलें तैनात नहीं रख सकेगा. जंग टालने के लिए फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने हाल में रूस की यात्रा की थी और जंग टालने के लिए कई स्तर पर कोशिशें जारी हैं लेकिन रूस की इन मांगों पर अमेरिका समेत नैटो के देश सहमत होंगे इसकी संभावना कम ही है.

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