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लाहौर हाईकोर्ट ने राजद्रोह कानून को असंवैधानिक करार दिया

लाहौर हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कर राजद्रोह कानून को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि सरकार इसका इस्तेमाल अपने विरोधियों के खिलाफ करती है. अदालत ने कहा कि राजद्रोह की धारा 124-ए का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है इसलिए यह असंवैधानिक है.

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लाहौर हाईकोर्ट
लाहौर हाईकोर्ट

पाकिस्तान के लाहौर हाईकोर्ट ने गुरुवार को राजद्रोह कानून को असंवैधानिक करार दिया. अदालत ने इस कानून को मनमाना बताते हुए अमान्य घोषित किया है. 

लाहौर हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति शाहिद करीम ने राजद्रोह से संबंधित पाकिस्तान दंड संहिता (पीपीसी) की धारा 124ए को असंवैधानिक करार दिया. अदालत ने कुछ याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया. इन याचिकाओं में राजद्रोह कानून को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि सरकार इसका इस्तेमाल अपने विरोधियों के खिलाफ करती है. पाकिस्तान के राजद्रोह कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं में तर्क दिया गया है कि देश का संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है.

इस पर अदालत ने कहा कि राजद्रोह की धारा 124ए का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है इसलिए इसे अमान्य करार दिया जा रहा है. 

पाकिस्तान का राजद्रोह कानून?

पाकिस्तान के राजद्रोह कानून के मुताबिक जो कोई भी मौखिक, लिखित, संकेतों, तस्वीरों या किसी भी दूसरे तरीके से घृणा या अवमानना करता है या ऐसी कोशिश भी करता है. अंसतोष भड़काता है या कोशिश करता है तो राजद्रोह कानून के दायरे में आता है. इस कानून के तहत आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है. इसमें जुर्माना भी जोड़ा जा सकता है या तीन साल की जेल या जेल एवं जुर्माना दोनों का प्रावधान है.

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भारत में राजद्रोह कानून?

भारत में राजद्रोह कानून हमेशा से चर्चा में बना हुआ है. यहां भारत में सुप्रीम कोर्ट अक्सर इसके दुरुपयोग पर चिंता जाहिर करता रहा है. पिछले साल जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि आजादी के 75 साल बाद भी देश में इस कानून की जरूरत क्यों है? भारत में राजद्रोह का कानून अंग्रेजों से आया है. 1870 में आईपीसी में धारा 124A जोड़ी गई थी, जो राजद्रोह को अपराध बनाती है. भारत में राजद्रोह का कानून भले ही 150 साल पुराना हो, लेकिन इसकी जड़ें 850 साल से भी ज्यादा पुरानी हैं.

कैसे आया राजद्रोह का कानून?

- अंग्रेजी कानून में राजद्रोह करीब 850 साल पुराना है. 1275 में हुई वेस्टमिंस्टर की संविधि से इसका पता लगाया जा सकता है. ये वो समय था जब राजा ही सर्वेसर्वा हुआ करता था. तब राजद्रोह का पता लगाने के लिए न सिर्फ भाषण की सच्चाई बल्कि इरादे पर भी गौर किया जाता था. उस समय राजद्रोह का कानून सत्ता के सम्मान के खिलाफ बोलने वालों को रोकने के लिए बनाया गया था.

- 1606 में राजा के फैसले में 'राजद्रोह' को 'अपराध' माना गया था. इसमें तर्क दिया था कि 'सरकार की सच्ची आलोचना में सरकार को बदनाम करने और अस्थिर करने की ज्यादा क्षमता होती है. इसलिए इस पर रोक जरूरी है.' 1868 में यूके की एक अदालत ने राजद्रोह को अपराध के तौर पर परिभाषित किया था.

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- 1860 में भारत में जब इंडियन पीनल कोड (आईपीसी) आई, तब उसमें राजद्रोह का कानून नहीं था. मैकॉले के 1837 के पीनल कोड के ड्राफ्ट में धारा 113 का जिक्र था. यही बाद में धारा 124A बने. भारत में 1870 में संशोधन कर आईपीसी में धारा 124A को जोड़ा गया था.

- 2018 में लॉ कमिशन के एक दस्तावेज में बताया गया था कि 1870 में राजद्रोह कानून को आईपीसी में इसलिए जोड़ा गया था, ताकि सरकार के खिलाफ उठ रही असंतोष की आवाजों को दबाया जा सके. हालांकि, लोग सरकार के खिलाफ अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र थे, लेकिन तब तक ही जब तक वो कानून का पालन कर रहे हैं.

- इसके अलावा 1911 में सीडिशियस मीटिंग्स एक्ट भी लाया गया था जो ऐसी पब्लिक मीटिंग को करने से रोकता था, जिससे राजद्रोह या असंतोष को भड़काने या अशांति पैदा करने की संभावना हो. इस कानून को 2018 में सरकार ने निरस्त कर दिया था.

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