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बॉर्डर पर ऑपरेशन सिंदूर और अमेरिका में भारत की साइलेंट डिप्लोमेसी... ट्रेड और टेरर पर दिखाई डबल स्ट्रैटजी

ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं था. यह एक ऐसा पल था जब भारत ने अमेरिका की सत्ता, सिस्टम और मीडिया... तीनों को एक साथ साधने की रणनीति पर काम किया. वॉशिंगटन में पर्दे के पीछे जो हुआ, वो अब दस्तावेज़ों से सामने आ रहा है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप. (फाइल फोटो)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप. (फाइल फोटो)

जब 7 मई 2025 को भारत ने ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत की, उसी वक्त नई दिल्ली ने वॉशिंगटन में एक समानांतर और बेहद सटीक कूटनीतिक अभियान भी लॉन्च कर दिया. यह अभियान सिर्फ सुरक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें ट्रेड, राजनीति और अमेरिकी मीडिया को भी एक साथ साधने की रणनीति शामिल थी. डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की सरकार के साथ यह संपर्क बेहद सोच-समझकर और चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया गया.

दरअसल, भारत ने जिस दिन काउंटर-टेरर ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया, उसी समय वॉशिंगटन में भारत ने ट्रंप प्रशासन के साथ एक व्यापक और योजनाबद्ध डिप्लोमैटिक आउटरीच एक्टिव कर दी थी. इंडिया टुडे द्वारा रिव्यू किए गए जेसन मिलर के FARA फाइलिंग दस्तावेज़ बताते हैं कि अप्रैल के आखिर से अक्टूबर 2025 तक भारतीय अधिकारियों ने अमेरिकी सरकार के शीर्ष स्तर पर लगातार कॉल्स, मीटिंग्स और ब्रीफिंग्स की मांग की. यह पूरा अभियान दो समानांतर ट्रैक्स पर चला. एक तरफ ऑपरेशन सिंदूर को लेकर वॉशिंगटन की समझ को मैनेज करना और दूसरी तरफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में संवेदनशील ट्रेड बातचीत की रफ्तार बनाए रखना.

यह आउटरीच दो हिस्सों में साफ बंटी हुई थी- ट्रेड और ऑपरेशन सिंदूर.

ट्रेड फ्रंट पहले एक्टिव

24 अप्रैल 2025 को भारत ने अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जैमिसन ग्रीर, कॉमर्स सेक्रेटरी हॉवर्ड लुटनिक और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के ऑफिस के साथ समन्वित कॉल्स की मांग की. इस टाइमिंग से साफ था कि भारत ट्रंप प्रशासन में ट्रेड पोजिशन सख्त होने से पहले बातचीत को ऊंचे स्तर पर ले जाना चाहता था, खासकर उस सरकार में जो ट्रेड को पूरी तरह ट्रांजैक्शनल नजरिए से देखती है.

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ऑपरेशन शुरू, लेकिन ट्रेड बातचीत जारी

मई की शुरुआत में जब ऑपरेशन सिंदूर शुरू हुआ, तब भी ट्रेड से जुड़ा संपर्क जारी रहा. 7 मई को, जिस दिन ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च हुआ, उसी दिन वॉशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास ने फॉक्स न्यूज के सीनियर एंकर ब्रेट बेयर के साथ टीवी इंटरव्यू पिच करने के लिए कॉल की मांग की. इसमें सीधे तौर पर ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र किया गया. फॉक्स न्यूज को राष्ट्रपति ट्रंप और उनके सीनियर एडवाइजर्स बारीकी से देखते हैं, और वॉशिंगटन में इसे व्हाइट हाउस के भीतर शुरुआती धारणा बनाने का अहम जरिया माना जाता है.

व्हाइट हाउस के भीतर मैसेजिंग कंट्रोल

10 मई को भारतीय अधिकारियों ने व्हाइट हाउस के कई सीनियर अधिकारियों के साथ कॉल्स का एक क्लस्टर मांगा. इसमें नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल, व्हाइट हाउस कम्युनिकेशन स्टाफ, चीफ ऑफ स्टाफ सूजी वाइल्स और यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव शामिल थे. खास तौर पर इन कॉल्स का मकसद ऑपरेशन सिंदूर को लेकर अमेरिकी मीडिया कवरेज पर चर्चा करना था.

इस आउटरीच की व्यापकता यह दिखाती है कि भारत उस वक्त नीति और पब्लिक मैसेजिंग- दोनों को एक लाइन में लाना चाहता था, जब शुरुआती नैरेटिव सेट हो रहे थे. ट्रेड अधिकारियों की मौजूदगी यह भी बताती है कि भारत नहीं चाहता था कि सुरक्षा घटनाएं आर्थिक बातचीत पर असर डालें.

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पेंटागन और सिक्योरिटी एस्टैब्लिशमेंट को ब्रीफिंग

मई के आखिर में भारत ने अमेरिकी नेशनल सिक्योरिटी सिस्टम में अपनी ब्रीफिंग और फैला दी. 27 मई को भारतीय अधिकारियों ने विदेश सचिव विक्रम मिसरी के लिए पेंटागन के शीर्ष नेतृत्व से मीटिंग्स मांगीं. इसमें वॉर सेक्रेटरी पीट हेगसेथ, डिप्टी सेक्रेटरी ऑफ डिफेंस, अंडरसेक्रेटरी ऑफ डिफेंस और नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के अधिकारी शामिल थे. उद्देश्य साफ था- ऑपरेशन सिंदूर पर सीधे ब्रीफिंग.

31 मई को फिर से वॉशिंगटन डीसी में भारतीय अधिकारियों ने उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो से मिलने की मांग की. ऐसे संपर्कों का मकसद अलग-अलग एजेंसियों में अलग-अलग व्याख्याओं को रोकना होता है, ताकि तेज़ी से बदलती सुरक्षा स्थिति में नीति प्रतिक्रियाएं उलझें नहीं.

जयशंकर स्तर तक पहुंची बातचीत

1 जून को भारत ने इस अभियान को और आगे बढ़ाया. विदेश मंत्री एस जयशंकर के लिए उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ मीटिंग्स की मांग की गई. यानी ब्रीफिंग अब सीधे ट्रंप प्रशासन के राजनीतिक और कूटनीतिक नेतृत्व तक पहुंच गई.

कांग्रेस हिल पर भी एक्टिवेशन

भारत ने सिर्फ एग्जीक्यूटिव ब्रांच तक खुद को सीमित नहीं रखा. जून की शुरुआत में हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी और रिपब्लिकन सीनेटर टॉम कॉटन के ऑफिस से संपर्क किया गया, जिन्हें नेशनल सिक्योरिटी मामलों में खास दिलचस्पी के लिए जाना जाता है. इसके साथ ही कैपिटल प्रोटोकॉल और लॉजिस्टिक्स से जुड़े मैसेज भी भेजे गए, जो लंबे समय तक चलने वाले कांग्रेसनल एंगेजमेंट की तैयारी की ओर इशारा करते हैं.

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बैकग्राउंड में चलता रहा ट्रेड ट्रैक

जब ऑपरेशन सिंदूर पर वॉशिंगटन में चर्चा हो रही थी, तब पर्दे के पीछे ट्रेड बातचीत लगातार चलती रही. रिकॉर्ड बताते हैं कि मई, जून और जुलाई 2025 के दौरान भारतीय अधिकारियों और यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जैमिसन ग्रीर, साथ ही कॉमर्स सेक्रेटरी हॉवर्ड लुटनिक के बीच बार-बार कॉल्स हुईं. डिप्लोमैट्स के मुताबिक, यह फ्रीक्वेंसी असामान्य थी और यह दिखाती है कि भारत जियोपॉलिटिकल घटनाओं के बावजूद बातचीत को पटरी से उतरने नहीं देना चाहता था.

18 जून को भारत ने एक बार फिर व्हाइट हाउस की चीफ ऑफ स्टाफ सूजी वाइल्स से कॉल की, जिसमें फिर से ऑपरेशन सिंदूर की मीडिया कवरेज पर फोकस किया गया. टाइमिंग बताती है कि भारत हफ्तों बाद भी इस ऑपरेशन की पब्लिक इमेज को लेकर सतर्क था.

अगस्त में ट्रेजरी भी शामिल

अगस्त आते-आते ट्रेड बातचीत और व्यापक हो गई. भारत ने ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट के साथ कॉल्स की मांग की. इससे साफ हुआ कि अब बातचीत में टैरिफ, करेंसी और कैपिटल फ्लो जैसे मैक्रो इकनॉमिक मुद्दे भी शामिल हो चुके थे.

भारत ने व्हाइट हाउस के राजनीतिक कोर से संपर्क बनाए रखा. सूजी वाइल्स और सीनियर एडवाइजर्स के साथ कॉल्स अगस्त और सितंबर तक चलती रहीं. ट्रंप के दौर में ट्रेड पॉलिसी को घरेलू राजनीति से जोड़कर देखने की आदत को देखते हुए यह संपर्क बेहद संवेदनशील माना जाता है.

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पर्दे के पीछे डिनर डिप्लोमेसी

सितंबर और अक्टूबर 2025 में भारतीय अधिकारियों ने राष्ट्रपति के करीबी माने जाने वाले कई कम्युनिकेशन एड्स और सीनियर पॉलिटिकल एडवाइजर्स से भी संपर्क किया. कुछ मामलों में प्रशासन से जुड़े लोगों के साथ प्राइवेट डिनर मीटिंग्स भी हुईं, जिनमें यूएस-इंडिया रिश्तों की लंबी तस्वीर पर चर्चा की गई. इस दौरान ट्रेड से जुड़े रूटीन कॉल्स भी जारी रहीं, जो दिखाता है कि बातचीत अब नाजुक दौर में पहुंच चुकी थी.

झटके फिर भी लगे

इतनी महीनों की कूटनीति के बावजूद भारत को ट्रंप प्रशासन से टैरिफ शॉक्स और सोशल मीडिया पर तीखे बयान झेलने पड़े. यह ट्रंप के पहले कार्यकाल से अलग था, जब ऐसे मतभेद शायद ही कभी खुले तौर पर सामने आते थे.

अंत में शांत हुआ वॉशिंगटन

अक्टूबर 2025 के आखिर तक, कामकाजी स्तर पर संपर्क जारी रहा. वहीं, ऑपरेशन सिंदूर वॉशिंगटन की सार्वजनिक बहस से धीरे-धीरे बाहर हो गया, बिना किसी कांग्रेसनल सुनवाई या ट्रंप प्रशासन के सीनियर अधिकारियों की स्थायी आलोचना के.

यह पूरा रिकॉर्ड बताता है कि 2025 में भारत ने एक जटिल कूटनीतिक चुनौती को कैसे संभाला. सुरक्षा और अर्थव्यवस्था दोनों को साथ लेकर व्यापक संपर्क के जरिए. प्रशासन में धारणा को मैनेज करते हुए, जहां नीति, राजनीति और मीडिया एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं.

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इस रिपोर्ट के लिए वॉशिंगटन डीसी स्थित भारतीय दूतावास से प्रतिक्रिया मांगी गई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

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