नेपाल की हालिया राजनीति में अगर किसी एक नाम ने पारंपरिक दलों की जड़ें हिला दी हैं, तो वह है बालेन शाह. इंजीनियर, रैपर और शहरी योजनाकार के रूप में पहचाने जाने वाले बालेन शाह ने कुछ ही वर्षों में खुद को युवाओं की उम्मीद और राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती देने वाले चेहरे के रूप में स्थापित कर लिया. उनकी राजनीतिक यात्रा विरोध से शुरू होकर सत्ता के शिखर तक प्रभाव डालने वाली कहानी बन चुकी है.
बालेन शाह के राजनीतिक सफर की शुरुआत
बालेन शाह का राजनीतिक सफर सीधे चुनावी मैदान से नहीं बल्कि व्यवस्था के खिलाफ असंतोष से शुरू हुआ. उन्होंने शुरुआत में सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया के जरिए यह सवाल उठाया कि नेपाल की पारंपरिक पार्टियां- विशेषकर केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली राजनीति- देश की समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रही हैं. इसी असंतोष के दौर में नेपाल में नया संविधान जारी होने के बाद 2017 में हुए स्थानीय चुनाव में उन्होंने अपने फेसबुक पर लिखा कि 'वही पुराने दल और पुराने नेताओं को वोट देने से कोई फायदा नहीं है.'
हालांकि जल्द ही बालेन शाह ने महसूस किया कि बदलाव के लिए व्यवस्था के भीतर जाकर लड़ना जरूरी है. इसी सोच के साथ उन्होंने घोषणा की कि वे खुद चुनाव लड़ेंगे और अपने आपको वोट देंगे. उनका तर्क था कि यदि वही पुराने चेहरे और वही राजनीतिक संस्कृति कायम रहेगी, तो केवल चुनाव कराने से व्यवस्था नहीं बदलेगी. यह निर्णय नेपाल की राजनीति में एक नए प्रयोग की शुरुआत था- एक गैर-पारंपरिक, स्वतंत्र और युवाओं द्वारा संचालित अभियान.
काठमांडू मेयर चुनाव: बड़े दलों को चौंकाने वाली जीत
बालेन शाह की पहली बड़ी परीक्षा थी काठमांडू का मेयर चुनाव. इस चुनाव में उनके सामने देश के बड़े दलों के उम्मीदवार थे, लेकिन बालेन शाह ने डिजिटल अभियान, युवाओं की लामबंदी और पारदर्शिता के एजेंडे के दम पर ऐतिहासिक जीत हासिल की. यह सिर्फ एक नगर चुनाव की जीत नहीं थी बल्कि इसने यह संदेश दिया कि नेपाल की राजनीति में नई पीढ़ी पारंपरिक दलों को चुनौती दे सकती है.
ओली सरकार के खिलाफ मुखर
मेयर बनने के बाद भी बालेन शाह लगातार नेपाल सरकार, खासकर केपी शर्मा ओली की नीतियों के खिलाफ बोलते रहे. वे अक्सर यह कहते थे कि सिंहदरबार में बैठी सत्ता जनता की समस्याओं से दूर हो चुकी है. इसी दौरान उनके एक बयान ने देश की राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया. उन्होंने कहा, 'जरूरत पड़ी तो सिंहदरबार जला देंगे.' समर्थकों के लिए यह व्यवस्था के खिलाफ गुस्से की अभिव्यक्ति थी, जबकि आलोचकों ने इसे उग्र राजनीति बताया.
'Gen-Z विद्रोह’ और बालेन शाह का रोल
नेपाल में उभरे Gen-Z आंदोलन में बालेन शाह को प्रेरक चेहरा माना गया. इस आंदोलन में युवा वर्ग भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और राजनीतिक परिवारवाद के खिलाफ सड़कों पर उतरा. हालांकि बालेन शाह ने खुद को औपचारिक नेता नहीं बताया, लेकिन उनके भाषण, सोशल मीडिया मैसेज और सक्रिय समर्थन ने आंदोलन को ऊर्जा दी. इस आंदोलन का नेतृत्व करने वाले सभी युवा बालेन से ही हर बार सुझाव लेकर कोई भी निर्णय करते थे.
ओली के अपदस्थ होने के बाद ठुकराया प्रधानमंत्री पद
जब गहरे राजनीतिक संकट के बीच केपी शर्मा ओली की सत्ता कमजोर हुई और उन्हें पद छोड़ना पड़ा, तब कुछ राजनीतिक समूहों और युवा नेताओं ने सबसे पहले बालेन शाह को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव भी दिया. लेकिन उन्होंने यह प्रस्ताव ठुकराते हुए कहा कि 'व्यवस्था को स्थिर करना पहले जरूरी है, पद लेना नहीं.' जिस डिस्कर्ड पर सुशीला कार्की को प्रधानमंत्री बनाने को लेकर वोटिंग की गई थी उसमें सबसे अधिक वोट बालेन को ही मिले थे. लेकिन बिना चुनाव जीते वो पद परिवर्तन नहीं चाहते थे.
सुशीला कार्की को प्रधानमंत्री बनाने का समर्थन
राजनीतिक संकट के समाधान के लिए बालेन शाह ने बातचीत और सहमति की राजनीति पर जोर दिया. इसी क्रम में उन्होंने पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को सर्वसम्मति से प्रधानमंत्री बनाने के प्रस्ताव का समर्थन किया. उनका मानना था कि एक तटस्थ और साख वाली शख्सियत ही इस समय देश को स्थिर कर सकती है.
मेयर पद से इस्तीफा और राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश
काठमांडू के मेयर के रूप में तीन साल पूरा होने से पहले ही बालेन शाह ने बड़ा फैसला लिया. उन्होंने पद से इस्तीफा देकर राष्ट्रीय राजनीति में उतरने की घोषणा की. इसके साथ ही उन्होंने देशव्यापी चुनाव अभियान शुरू किया और खुद को एक नए राजनीतिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया.
ओली को उनके गृह जिले में चुनौती
चुनाव अभियान का सबसे नाटकीय क्षण तब आया जब बालेन शाह ने सीधे केपी शर्मा ओली को उनके ही गृह जिले में चुनौती देने का फैसला किया. यह कदम प्रतीकात्मक रूप से पुरानी और नई राजनीति की सीधी टक्कर बन गया. इसका फायदा भी मिला. बालेन की हवा ने केपी ओली ही नहीं बल्कि उनकी पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं को हवा में उड़ा दिया.
युवाओं में क्रेज और नया चुनाव अभियान
बालेन शाह का चुनाव अभियान पारंपरिक रैलियों से अलग था. इसमें प्रमुख भूमिका थी- सोशल मीडिया कैंपेन, स्वयंसेवी युवा नेटवर्क, नीति आधारित भाषण, पारदर्शिता और जवाबदेही का वादा. देश भर के युवाओं में उनके प्रति एक क्रेज देखने को मिला. उन्होंने अपने चुनाव प्रचार का अभियान जनकपुर से किया और मैथिली में भाषण दिया ताकि मधेश में 32 सीटों पर ही नहीं बल्कि आसपास की अन्य 50 सीटों पर भी उसका असर पड़े. और उनका यह अभियान सफल हुआ.
मधेशी मूल का पहला प्रधानमंत्री
मधेशी मूल का एक युवा पहली बार देश का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है. इस भाषण ने जबरदस्त काम किया और बालेन को सभी 80 सीटों पर शानदार जीत हासिल हुई. सबसे अधिक निर्वाचन क्षेत्र वाले मधेश की सभी 32 सीटों पर राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को शानदार जीत मिली है. इन क्षेत्रों में मतदाताओं ने जात-पात और धर्म संप्रदाय से ऊपर उठकर सिर्फ बालेन के पक्ष में मतदान किया.
इस क्षेत्र में बहुत कम लोगों को अपने क्षेत्र के उम्मीदवार का नाम पता था. लोग बालेन को पीएम बनाने के लिए मतदान कर रहे थे. चुनाव परिणामों में बालेन शाह और उनकी राजनीतिक धारा को बड़ी सफलता मिली. कई स्थापित नेताओं की हार और नए चेहरों की जीत ने यह संकेत दिया कि नेपाल की राजनीति में एक नई पीढ़ी निर्णायक भूमिका निभाने लगी है.