ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई ने भारत में मुसलमानों की स्थिति को लेकर बयान दिया जिस पर भारत ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी. अब भारत में इजरायल के राजदूत रियुवेन अजार ने भी मुसलमानों पर टिप्पणी के लिए खामेनेई को आड़े हाथों लिया है. अजार ने कहा कि भारत में मुसलमानों के पास आजादी है जो कि ईरान में नहीं है.
इजरायली राजदूत ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर किए गए अपने एक पोस्ट में लिखा, 'आप अपने ही लोगों के हत्यारे और अत्याचारी हैं. इजरायल, भारत और सभी लोकतंत्रों में मुसलमानों के पास आजादी है, जो कि ईरान में नहीं है. मैं आशा करता हूं कि ईरान के लोग जल्द आजाद होंगे.'
दरअसल, सोमवार को पैगंबर मोहम्मद के जन्मदिन के अवसर पर खामेनेई ने कहा कि भारत, म्यांमार, गाजा में मुसलमान पीड़ित हैं.
उन्होंने एक्स पर लिखा था, 'इस्लाम के दुश्मनों ने हमेशा हमारी साझा पहचान को उदासीन बनाने की कोशिश की है. अगर हम म्यांमार, गाजा, भारत या किसी अन्य स्थान पर एक मुसलमान को होने वाली पीड़ा से अनजान हैं, तो हम खुद को मुसलमान नहीं मान सकते.'
खामेनेई के बयान पर भारत की तीखी प्रतिक्रिया
खामेनेई के इस बयान पर भारत ने तीखी प्रतिक्रिया दी. विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर खामेनेई के बयान को 'अस्वीकार्य' बताते हुए खारिज कर दिया. मंत्रालय ने कहा कि यह आरोप गलत जानकारी पर आधारित हैं.
विदेश मंत्रालय ने बयान में कहा, 'हम ईरान के सर्वोच्च नेता की भारत में अल्पसंख्यकों के बारे में की गई टिप्पणियों की कड़ी निंदा करते हैं. ये गलत सूचनाएं हैं और अस्वीकार्य हैं.'
मंत्रालय ने ईरान को आईना दिखाते हुए कहा कि भारत में अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार पर इस तरह की टिप्पणी करने वाले देशों को कोई भी निर्णय लेने से पहले अपने मानवाधिकार रिकॉर्ड भी देख लेने चाहिए.
बयान में कहा गया, 'अल्पसंख्यकों पर टिप्पणी करने वाले देशों को सलाह दी जाती है कि वे दूसरों के बारे में कोई भी टिप्पणी करने से पहले अपने रिकॉर्ड को देखें.'
ईरान में कैसे हैं अल्पसंख्यकों के हालात
शिया मुस्लिम बहुल ईरान में अल्पसंख्यक बेहद ही खराब हालत में जी रहे हैं. ईरान की कुल आबादी में सुन्नी मुसलमानों की हिस्सा 5-10 प्रतिशत है. आबादी में इतना हिस्सा होने के बावजूद, सुन्नी मुसलमानों को राजनीति में उतना प्रतिनिधित्व नहीं मिलता, जितने के वो हकदार हैं.
अमेरिका स्थित थिंक टैंक 'द वाशिंगटन इंस्टिट्यूट' के 'Fikra Forum' की नवंबर 2022 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1980 में ईरानी संसद मजलिस की स्थापना के बाद से ईरान के निर्वाचित सांसदों में से केवल छह प्रतिशत (1,996 में से 121) सुन्नी हैं. सुन्नी सांसदों की जीत महज उन जिलों में हुई जहां की आबादी सुन्नी बहुल थी जैसे सिस्तान-बलूचिस्तान और कुर्दिस्तान प्रांतों के जिले.
22 वर्षीय कुर्द सुन्नी महिला महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद ईरान में हिजाब विरोधी प्रदर्शन देखने को मिले. इन प्रदर्शनों के दौरान ईरानी सरकार ने बड़े पैमाने पर दमन की कार्रवाई की. सुन्नी बहुल सिस्तान-बलूचिस्तान की राजधानी जाहेदान में विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने गोलियां चला दीं जिसमें 80 से ज्यादा लोग मारे गए.
ईरान में बहाई समुदाय के लोगों के साथ भी खूब अत्याचार होता है. मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी 2023 की रिपोर्ट में बहाई समुदाय को लेकर कहा कि समुदाय को उच्च शिक्षा से रोका गया, उनके व्यवसायों को जबरन बंद करवाया गया और उनकी संपत्तियों को जब्त किया गया. उन्हें मनमाने ढंग से हिरासत में भी लिया गया.
एमनेस्टी की रिपोर्ट में लिखा गया, 'अधिकारियों ने तेहरान में दशकों से इस्तेमाल किए जा रहे एक कब्रिस्तान में बहाई लोगों को दफनाने से रोक दिया और कई मृतक बहाई लोगों को जबरन पास के खावरन सामूहिक कब्रगाह पर दफना दिया. इसकी जानकारी भी उनके परिवारों को नहीं दी गई और उन्हें दोबारा दफनाते हुए बहाई दफन प्रथाओं का उल्लंघन किया गया. माना जाता है कि तेहरान के कब्रगाह में 1988 के जेल नरसंहार के पीड़ितों के अवशेष थे, जिन्हें लगभग तबाह कर दिया गया.'