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'शाह अमर रहे...', जिस नारे को दबी जुबान में भी नहीं बोलते थे ईरानी, अब वही बना इंकलाब की आवाज!

ईरान में सत्ता में बदलाव को लेकर चल रहे प्रदर्शन का आज छठा दिन है. आर्थिक कारणों से शुरू हुआ ये प्रदर्शन अब राजनीतिक रंग ले चुका है और प्रदर्शनकारी 'डेथ टू डिक्टेटर'और 'मुल्ला देश छोड़ो' जैसे नारे लगा रहे हैं. ईरान में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई पुलिसिया कार्रवाई और फायरिंग में कुछ मौतों की भी खबर है

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ईरान में फिर विद्रोह की आवाज (Photo: AP)
ईरान में फिर विद्रोह की आवाज (Photo: AP)

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन अब देशभर में फैल चुके हैं. इसकी शुरुआत राजधानी तेहरान से हुई, जो देखते ही देखते शहर दर शहर पहुंच गई. हालात ऐसे हैं कि देश के 30 से अधिक शहरों में प्रोटेस्ट हो रहे हैं, जिनमें कोम शहर भी है, जिसे ईरान के शासक शिया मौलवी वर्ग का गढ़ माना जाता है. 

ईरान में यह प्रोटेस्ट 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद सबसे व्यापक प्रदर्शनों में से एक है. ईरान की सड़कों पर अब जो नारे लग रहे हैं, वो शाह शासन की याद दिला रहे हैं. इस दौरान प्रदर्शनकारी मुल्लाओं, ईरान छोड़ो जैसे नारों के साथ जाविद शाह यानी शाह अमर रहें के नारे भी लगा रहे हैं.

हालांकि, ईरान के इन मौजूदा प्रदर्शनों की शुरुआती वजह आर्थिक बदहाली है. ईरान की मुद्रा औंधे मुंह गिर गई है. ईरान की मुद्रा अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 42,000 रियाल पर है, जबकि महंगाई दर 42 फीसदी तक पहुंच चुकी है. लेकिन अब यह प्रदर्शन सिर्फ आर्थिक बदहाली तक सीमित नहीं है बल्कि अब लोग खुलकर ईरान की धार्मिक सत्ता यानी थियोक्रेटिक सिस्टम को हटाने की मांग कर रहे हैं.

ईरानी-अमेरिकी पत्रकार मसीह अलीनेजाद के अनुसार, प्रदर्शनकारी तानाशाही मुर्दाबाद के नारे लगा रहे हैं. लेकिन सवाल ये है कि अब शाह अमर रहें.. के जो नारे लग रहे हैं. तो वह शाह कौन है, जिसका नाम आज ईरानी लोग अयातुल्ला अली खामेनेई के शासन के विरोध में कर रहे हैं?

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लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इसी शाह के दौर में रूहोल्लाह खोमैनी के नेतृत्व में हुए जनआंदोलन ने 1979 में राजशाही को उखाड़ फेंका था. खोमैनी ही अयातुल्ला खामेनेई के पूर्ववर्ती थे. इसी क्रांति के बाद ईरान में शिया मौलवियों की सत्ता व्यवस्था स्थापित हुई, जिसमें अयातुल्ला यानी सर्वोच्च नेता का पद देश के शासन का केंद्र बन गया.

पहलवी वंश के अपदस्थ क्राउन प्रिंस रजा पहलवी, जो फिलहाल अमेरिका में निर्वासन में रह रहे हैं. उन्होंने इन प्रदर्शनों का समर्थन किया है. उन्होंने प्रदर्शनकारियों की सराहना करते हुए कहा कि वे दमनकारी शासन के खिलाफ डटकर खड़े हैं. जिस ‘शाह’ का नाम कभी ईरान में वर्जित माना जाता था, वही नाम अब सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के शासन के खिलाफ हुए आंदोलन की पहचान बन गया है.

‘जाविद शाह’: जो नारा कभी वर्जित था, वह आज सड़कों पर क्यों गूंज रहा है?

लंबे समय से चल रहे असंतोष और विरोध के बाद 1979 में पहलवी वंश को सत्ता से हटा दिया गया था. शाह का तेज पश्चिमीकरण और कठोर  आर्थिक असमानता और सांस्कृतिक अलगाव का कारण बना, जिसने समाज के लगभग हर वर्ग को खोमैनी के नेतृत्व वाले धार्मिक क्रांतिकारी आंदोलन के पीछे एकजुट कर दिया.

जाविद शाह यानी शाह अमर रहे का नारा ईरान में टैबू इसलिए बन गया था, क्योंकि यह नारा सीधे उस राजशाही व्यवस्था की याद दिलाता था, जिसे 1979 की इस्लामी क्रांति में जनता ने खुद उखाड़ फेंका था.

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इस क्रांति के बाद पहलवी वंश से व्यापक नफरत थी, जबकि नई इस्लामिक रिपब्लिक को जनता का समर्थन हासिल था. तो फिर पिछले 47 वर्षों में क्या बदल गया? ईरान की इस्लामिक रिपब्लिक उतनी ही, बल्कि कई मायनों में उससे भी अधिक दमनकारी साबित हुई, जितनी वह राजशाही थी जिसे उसने हटाया था. अयातुल्लाओं के शासन ने ईरान को दुनिया से अलग-थलग कर दिया, जिससे देश ऐसी आर्थिक गिरावट में चला गया, जिससे वह आज तक उबर नहीं पाया.

मध्य पूर्व में आतंकी और उग्रवादी संगठनों को समर्थन देने की नीति ने हालात और बिगाड़ दिए. अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों ने ईरान को वैश्विक अर्थव्यवस्था से लगभग काट दिया.

इस्लामी शासन को सख़्ती से थोपने और उससे जुड़ी तमाम नीतियों ने ईरान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को अपूरणीय नुकसान पहुंचाया और ईरानी जनता विरोध और प्रतिरोध से अनजान नहीं है.

आज ईरानी रियाल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 42,000 से भी नीचे फिसल चुका है और महंगाई 42 फीसदी से ऊपर पहुंच गई है. ऐसे में सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौलवी सरकार तीन साल में सबसे बड़े जनविद्रोह का सामना कर रही है.

ईरानी-अमेरिकी पत्रकार और लेखिका मसीह अलीनेजाद ने X पर लिखा, ईरान से लगातार ऐसे वीडियो आ रहे हैं, जिनमें लोग सड़कों पर एक स्वर में नारे लगा रहे हैं, ‘मुल्लाओं, ईरान छोड़ो’ और ‘तानाशाही मुर्दाबाद’. यह उस जनता की आवज है, जो इस्लामिक रिपब्लिक नहीं चाहती.

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ईरान ने इससे पहले भी कई बड़े जनआंदोलन देखे हैं. आज ईरानी शहरों की सड़कों पर गूंज रहा नारा जाविद शाह उस व्यवस्था की वापसी की पुकार है, जिसे दशकों पहले जनता ने खुद खारिज कर दिया था.

हालांकि, अयातुल्लाओं का शासन पहले भी कई आंदोलनों को बेरहमी से कुचल चुका है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस बार भी वह ऐसा कर पाएगा? एक बात साफ है- ईरान में धार्मिक तानाशाही के खिलाफ संघर्ष में अब पहलवी वंश एक चेहरा और एक ताकत बनकर उभर चुका है.

रजा पहलवी कौन हैं?

रजा पहलवी का जन्म 1960 में ईरान की राजधानी तेहरान में हुआ था. वह ईरान के आख़िरी शाह मोहम्मद रजा पहलवी के सबसे बड़े बेटे हैं, जिनकी सत्ता 1979 की ईरानी क्रांति में गिरा दी गई थी.

उदार लोकतंत्र के समर्थक रजा पहलवी निर्वासन में गठित विपक्षी संगठन नेशनल काउंसिल ऑफ ईरान के संस्थापक और नेता हैं.
वह ईरान के भविष्य की शासन व्यवस्था तय करने के लिए स्वतंत्र जनमत संग्रह की वकालत करते हैं. 1967 में अपने पिता के राज्याभिषेक के दौरान उन्हें औपचारिक रूप से क्राउन प्रिंस घोषित किया गया था.

रजा पहलवी ईरान के लोकतंत्र आंदोलन में सक्रिय रहे हैं और अयातुल्ला के नेतृत्व वाले इस्लामिक रिपब्लिक के मुखर आलोचक हैं. वह बार-बार देशव्यापी विरोध-प्रदर्शनों और मौजूदा शासन को हटाने की अपील करते रहे हैं. मौजूदा प्रदर्शनों के दौरान भी उन्होंने एक बार फिर आंदोलन के समर्थन की घोषणा की है.

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सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर लिखते हुए उन्होंने ईरानियों से अपील की कि वे आने वाले दिनों में हर मौके, हर जुटान और हर कार्यक्रम का इस्तेमाल इस आंदोलन को फैलाने के लिए करें. उन्होंने प्रदर्शनकारियों से इस राष्ट्रीय विद्रोह के हर शहीद को सम्मान देने और ईरान के आज़ाद होने तक संघर्ष जारी रखने का आह्वान किया.

पहलवी वंश क्या था और उसका पतन क्यों हुआ?

पहलवी वंश ने 1925 से 1979 तक ईरान पर शासन किया. इस वंश की स्थापना रजा शाह पहलवी ने की थी, जो ब्रिटेन-प्रशिक्षित सैन्य अधिकारी थे. काजार वंश के कमजोर पड़ने के बाद 1925 में उसे औपचारिक रूप से अपदस्थ कर रजा शाह सत्ता में आए. उन्होंने 1941 तक शासन किया, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन और सोवियत संघ के संयुक्त आक्रमण के बाद उन्हें अपने बेटे मोहम्मद रज़ा पहलवी के पक्ष में गद्दी छोड़नी पड़ी.

युद्ध के बड़े हिस्से में ईरान मित्र देशों के कब्ज़े में रहा और 1946 में एक संवैधानिक राजशाही के रूप में उभरा. इस दौर में राजनीतिक गतिविधियां कुछ समय के लिए बढ़ीं. कम्युनिस्ट तुदेह पार्टी और मोहम्मद मोसद्देक के नेतृत्व वाला नेशनल फ़्रंट प्रमुख राजनीतिक ताक़तें बनीं. लेकिन ईरान का यह लोकतांत्रिक प्रयोग ज़्यादा समय तक नहीं चला. 1953 में प्रधानमंत्री बने मोसद्देक ने जब ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया, तो उन्हें CIA और MI6 समर्थित तख़्तापलट के ज़रिए सत्ता से हटा दिया गया. इसके बाद मोहम्मद रज़ा पहलवी फिर से सर्वशक्तिमान शासक बनकर उभरे.

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1953 से 1979 तक मोहम्मद रजा पहलवी का शासन धीरे-धीरे एक निरंकुश राजशाही में बदल गया. तेल से मिली आय से तेज आर्थिक विकास हुआ और अमेरिका व उसके सहयोगियों से क़रीबी रिश्ते बने. बड़े शहर तेज़ी से आधुनिक हुए, लेकिन विकास असमान रहा और राजनीतिक स्वतंत्रताएं बेहद सीमित थीं.

शाह के भूमि सुधार, पश्चिमीकरण की नीतियाँ और सवाक (SAVAK) गुप्त पुलिस के ज़रिए असहमति का दमन धार्मिक नेताओं, पारंपरिक वर्गों और समाज के बड़े हिस्से को उनसे दूर ले गया. 1971 में पर्सेपोलिस में आयोजित भव्य और अत्यधिक महंगे समारोहों ने भी जनता के गुस्से को और भड़काया.

तेल आय में गिरावट, बढ़ता सैन्य खर्च, सांस्कृतिक प्रतिक्रिया और निर्वासन में रह रहे मौलवी अयातुल्ला रूहोल्लाह ख़ोमैनी के नेतृत्व में बढ़ते विरोध ने 1978 से व्यापक जनआंदोलन का रूप ले लिया. 1979 में राजशाही का पतन हो गया और उसकी जगह इस्लामिक रिपब्लिक की स्थापना हुई.

शाह और उनका परिवार ईरान छोड़कर भाग गया. मोहम्मद रज़ा पहलवी की 1980 में मिस्र में निर्वासन के दौरान मृत्यु हो गई. उनके बेटे रज़ा पहलवी आज अमेरिका में निर्वासन में रहते हुए ईरान में अयातुल्ला विरोधी प्रदर्शनों का समर्थन कर रहे हैं.

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