अगस्त 2024 में बांग्लादेश की सड़कों पर जिस छात्र शक्ति ने शेख हसीना के 15 साल के शासन का अंत कर दिया था, आज वही 'क्रांतिकारी' चेहरे चुनावी मैदान में संघर्ष करते नजर आए. छात्र आंदोलन से उपजी नई पार्टी 'नेशनल सिटीजन पार्टी' (NCP) के लिए 13वें संसदीय चुनाव के नतीजे काफी चौंकाने वाले रहे हैं.
बांग्लादेश चुनाव के जो फाइनल नतीजे आए हैं उसमें एनसीपी चुनावी मैदान में बुरी तरह फ्लॉप होती दिख रही है. स्थानीय टीवी प्रोजेक्शनों के अनुसार, 30 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली NCP को महज 5 सीटों पर ही जीत मिली. यह उन हजारों युवाओं के लिए एक बड़ा झटका है, जिन्होंने इस उम्मीद में पार्टी का साथ दिया था कि वे बांग्लादेश की राजनीति में 'तीसरा विकल्प' बनेंगे.
दरअसल, जब एनसीपी ने इस चुनाव में जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन किया तो उसी समय पार्टी में दरार पड़ गई. कई महिला नेताओं ने पार्टी से यह कहकर इस्तीफा दे दिया कि उन्हें नजरअंदाज किया गया.
जमात का साथ: वरदान या अभिशाप?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि NCP की इस विफलता के पीछे 'जमात-ए-इस्लामी' के साथ उनका 11-दलीय गठबंधन एक बड़ी वजह हो सकता है. छात्र आंदोलन मुख्य रूप से समावेशी और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित था, लेकिन कट्टरपंथी जमात के साथ हाथ मिलाने से पार्टी का उदारवादी वोटर छिटक कर खालिदा जिया की पार्टी BNP की तरफ चला गया.
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हार के बाद NCP अब 'रिजल्ट टैम्परिंग' और प्रशासनिक हेरफेर के आरोप लगा रही है. पार्टी के प्रवक्ता आसिफ महमूद शोजीब भुइयां ने देर रात प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया कि ढाका-13, 15, 16 और 17 जैसी सीटों पर नतीजों के साथ छेड़छाड़ की गई है. उनका दावा है कि ढाका-15 में जहां जमात के अमीर 20 हजार वोटों से आगे थे, वहां अचानक बिना किसी तर्क के BNP उम्मीदवार को विजेता घोषित कर दिया गया.
पार्टी ने आधिकारिक तौर पर कई सीटों पर दोबारा मतगणना (Recounting) की मांग की है. हालांकि, हकीकत यह है कि सड़क पर क्रांति लाने वाले ये युवा नेता संसद की सीढ़ियों तक पहुंचने के लिए जरूरी चुनावी कूटनीति में मात खाते दिख रहे हैं.