पाकिस्तान को एक ऐसे शख्स की तलाश थी जो परमाणु बम बनाने में उसकी मदद कर सके और यह तलाश अब्दुल कादिर खान पर जाकर खत्म हुई. खान एम्सटरडैम से पाकिस्तान की हालत पर नजर बनाए हुए थे.
'शॉपिंग फॉर बॉम्ब्स: न्यूक्लियर प्रोलिफरेशन, ग्लोबल इन्सेक्योरिटी ऐंड द राइज ऐंड फॉल ऑफ द एक्यू खान नेटवर्क' के लेखक गॉर्डन कोरिया के मुताबिक, "यह सच बात है कि अब्दुल कादिर के मन में परमाणु बम बनाने के जज्बे के पीछे भारत ही सबसे बड़ी वजह था. जब अब्दुल ने 16 दिसंबर 1971 में ढाका में पाकिस्तानी सेना को भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण करते हुए देखा तो उसने ठान लिया कि वह अब दोबारा ऐसा नहीं होने देगा. वह उस वक्त यूरोप में थे और मेटालरजिस्ट के तौर पर प्रशिक्षित हो चुके थे. अब्दुल कादिर को लगा कि शायद वह पाकिस्तान की मदद कर सकते हैं और उन्होंने जुल्फिकार अली भुट्टो के सामने पेशकश रख दी."
भुट्टो ने अब्दुल खान की पेशकश स्वीकार कर ली और खान अपने मिशन में लग गए.