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यूपी: रैनबसरों में क्यों नहीं सो रहे गरीब? आधार कार्ड न होना या बाहर फ्री कंबल का लालच?

उत्तर प्रदेश में कड़ाके की ठंड पड़ रही है. रात के वक्त राजधानी लखनऊ का तापमान 10 डिग्री से नीचे हो जाता है. ऐसे में गरीब लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. वो सर्द हवाएं, घना कोहरा और बढ़ती गलन के बीच सड़क पर सो रहे हैं. लखनऊ में रैनबसेरा होने की बाद भी क्यों फुटपाथ पर सोने को मजबूर हैं गरीब?

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फुटपाथ पर सोते लोग
फुटपाथ पर सोते लोग

उत्तर प्रदेश समेत देश के अलग-अलग राज्यों में कड़ाके की ठंड पड़ने लगी है. यूपी में कोहरा और शीतलहर परेशान करने लगा है. रात के वक्त तापमान नीचे लुढ़कता है तो ठंड बढ़ जाती है. ऐसे में गरीब लोगों को खासा परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. जिनके पास सोने के लिए घर नहीं हैं वो फुटपाथ पर सोने को मजबूर हैं. राजधानी लखनऊ में कंपकपाती ठंड के बीच देर रात पारा 10 डिग्री के नीचे लुढ़क जाता है. ऐसे में सरकार के आदेश के बाद नगर निगम और कुछ प्राइवेट संस्थाओं ने मिलकर शहर में जगह-जगह रैन बसेरे लगाए हैं. लेकिन फिर भी लोग गलन भरी ठंड में फुटपाथ पर सोने को मजबूर हैं. आइए जानते हैं क्यों. 

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रैन बसेरों का रियलटी चेक करने के लिए हम रात में 11:30 बजे हनुमान सेतु पहुंचे जहां एक अस्थाई रेनबसेरा बना हुआ है. जब हम यहां पहुंचे तो देखा कि बाहर अलाव जल रहा है. वहीं, अंदर कुछ लोग भी थे. लेकिन कई गद्दे खाली पड़े थे. खाली गद्दों के बारे में जब संचालक से बात की गई तो उसने बताया कि लोग कंबल के लालच में बाहर सोना पसंद करते हैं, इसलिए अंदर नहीं आ रहे. 

इसका पता लगाने हम रैन बसेरे से महज़ 15 कदम आगे बढ़े तो लाइन से सोते हुए 5 से 6 लोग दिखाई पड़े. जब इनसे बातचीत की गई तो उन लोगों ने बताया कि वह सब मजदूरी करने आए हैं, लेकिन आधार कार्ड गांव में ही भूल गए.अब बिना आधार कार्ड  रैन बसेरे में एंट्री नहीं मिल रही और वो बाहर ही ठंड में सोने को मजबूर हैं. कुछ लोगों ने अपनी बीमारी का हवाला भी दिया तो कुछ ने कहा की अंदर मच्छर बहुत काटते हैं इसलिए बाहर ही सोना बेहतर है.   

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Rain Basera

वहीं, रामसेतु से कुछ दूर हजरतगंज में भी यहीं मंजर देखने को मिला. यहां लोगों ने ठंड और ओस से बचने के लिए झाड़ियों का सहारा लिया हुआ था. इस तस्वीर के किरदारों से जब हमने बात की तो उन्होंने बताया कि ओस बहुत होती है और तेज ठंडी हवा चलती है जिसकी वजह से उन्होंने इन झाड़ियों का सहारा लिया है और फुटपाथ तले बनी झाड़ियों में पनाह लेकर सो रहे हैं. 

कई रिक्शेवाले यह मानते हैं कि अगर वह रैन बसेरे में सोएंगे तो उनका रिक्शा चोरी हो जायेगा तो कई लोगों ने सड़को पर ही गृहस्थी बनाई है. उनके लिए भी बसेरे में जाना टेढ़ी खीर है. लखनऊ में लगभग 25 स्थाई रैन बसेरे हैं और लगभग इतने ही अस्थाई रैन बसेरे. स्थाई की क्षमता 1143 है तो अस्थाई की लगभग 704 पर इसके बाद भी इनमें जाने वालों की संख्या आधी ही है. 

 

 

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